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Wednesday, 27 March 2024

नाम में क्या रखा है

नाम में क्या रखा है

बच्चे बहुत शरारती होते हैं बचपन में हम लोग बड़े लोगों के स्वभाव और पर्सनालिटी के आधार पर अक्सर उनके लिए कोईबनाम रख देते हैं। कभी-कभी उन दिनों के रखे हुए नाम की याद आती है तो बहुत हंसी आती है।

मेरे क्लास में एक लड़का पढ़ता था वह इतना काला और चमकीला था कि स्कूल में अलग दिखाई देता था। हमारी क्लास के लड़कों ने उसका नाम cobra boot polish dark tan रख दिया था। एक मास्टर जी थे गणित के, जो बहुत छोटे साइज के और गोल मटोल से थे और लुढ़कते हुए चलते थे,  तो उनका नाम डनलप मास्टर रख दिया था। 

हमारे घर के बाहर की तरफ का एक बड़ा कमरा मेहमानों का कमरा होता था। होता यह था कि हमारे दादाजी गांव से किसी को भी हमारे शहर में भेज देते थे नौकरी की तलाश में और जब तक उसकी नौकरी नहीं लग जाती थी और रहने के लिए जगह नहीं मिल जाती थी तब तक हमारे ही गैस्ट रूम में रहता था। तरह-तरह के लोग वहां जाकर रहे जिनमें से कुछ लोगों का नाम हम लोगों ने रख दिया था। एक बहुत लंबा दुबला पतला मेहमान था जिसका नाम लमपूछया पांडे पड़ गया था। एक दूसरा पांडे था जिसका मिजाज थोड़ा गर्म था तो उसका नाम गुर्री पांडे रख दिया गया था। इसी तरह एक और सज्जन थे जो इतने पतले लंबे और छड़ी की तरह सीधे थे कि उनका नाम खंबा रख दिया गया था। एक सज्जन साल भर तक रहे और बहुत रहस्यमई तरीके से इधर से उधर जाते दिखाई देते थे तो उनका नाम नेवला पड़ गया।

बात सिर्फ हमारे बचपन की या घर की नहीं है थोड़े बड़े होकर जब यूनिवर्सिटी में गए तो हॉस्टल में भी देखा कि लड़कों के नाम पड़ रहे हैं। मुझे पता नहीं है पर मेरा भी जरूर कोई नाम पड़ा होगा। एक लड़का था जिसके नाक के नथुने बहुत ही चौड़े थे और नाक भी बहुत बड़ी थी। उसका नाम रखा गया था भैंस। उसके बगल के कमरे में एक छोटे से कद और छोटी-छोटी आंखों वाला लड़का था जिसकी आंखें बहुत चंचल थी इधर से उधर घूमती रहती थी उसका नाम रखा गया था कबूतर। एक और सीनियर स्टूडेंट था जो ऊपर की मंजिल के कोने के कमरे में रहता था। उसकी शक्ल कुछ इस तरह की थी कि उसका नाम बुलडॉग पड़ गया। हॉस्टल में 2 साल रहने के बाद एक नया लड़का हॉस्टल में आया जिनका कद 6 फुट 4 इंच था दुबला पतला था। उसका नाम भाई लोगों ने ICBM रख दिया था।

ऐसे भी कई नाम है जो उनकी अपनी भाषा में तो सही है पर हिंदी में ऐसे नाम देखकर अगर आपको हंसी आ जाती है तो गलत नहीं है। आपकी भाषा में उसका कुछ और मतलब होता है। लोगों का नाम अपनी भाषा में अच्छा होता होगा पर उत्तरी भारत में इन डॉक्टर साहिब का बोर्ड बड़ा अटपटा लगता है।



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पानी रे पानी

पानी रे‌ पानी

पानी के बिना मानव जीवन असंभव है।

इसीलिये अधिकतर गांव और शहर नदी के किनारे  होते हैं। आसानी से पानी मिल जाता है।

पहले शहरों में पाइप से वाटर सप्लाई नहीं होती थी आजकल की तरह। ऐसे में शहर में नदी से दूर जगहों पर रह रहे लोगों को पुराने जमाने में हैंडपंप लगाने पड़तै थे। हमारे मकान में भी एक हैंडपंप लगा था।

लोहे का पंप होता था इसके हैंडल को ऊपर नीचे करने से उसके मुंह से पानी निकलता था मोटी धार में। उसी के पानी को बाल्टी में भर के बाथरूम में रखा जाता नहाने के लिए । उसी से कपड़े धोने होते थे। उसी पानी से खाना बनाया जाता था।

कुछ मकानो में कुंए हुआ करते थे । ज्यादातर कुए कच्चे होते थे पर कुछ बहुत सुंदर पक्के होते थे । सीमेंट की छोटी सी दीवार वाले। बाल्टी को रस्सी से बांधकर डुबोकर पानी खींच कर निकाला जाता था। हमारे यहां भी एक बार कुछ सब्जियां पौधे की खेती करने के बारे में सोचा गया तो एक कुआं खोदा गया और एक दो साल तक उसका इस्तेमाल भी किया गया । उसके बाद जब जमीन के खराब होने की वजह से कोई ज्यादा सब्जियां नहीं हुई तो कुंए को पाट दिया गया।

पहाड़ों में बड़ी-बड़ी चौड़ी नदी तो होती ही नहीं है । वहां पर हैंडपंप भी लगाना  संभव नहीं है।  कुआं होने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन प्रकृति का कमाल देखिए वहां पर झरने हुआ करते हैं जिससे निरंतर पानी गिरता रहता है और कुछ जगह चट्टान के बीच से पानी की धार निरंतर गिरती रहती है जिसे पहाड़ की भाषा में नौला कहते हैं। उसके चारों तरफ एक कमरा और सीमेंट का फर्श बना दिया जाता है ताकि लोग वहां जाकर आराम से  बाल्टी में पानी भरकर घर ले जा सके ।

अल्मोड़ा शहर में भी ऐसे ही कई नौले है जिसमें एक नौले का नाम सुनेरी नौला है जिसका पानी बहुत मीठा होता है।

 पहाड़ों में  पेड़ों की कटाई होने की वजह से झरने और नौले के पानी सूखते जा रहे हैं जिससे कि पहाड़ में पानी की समस्या पैदा हो रही है। लोगों को डर लगता है की अल्मोड़ा के नौले भी कुछ दिन बाद सूख जाएंगे।

पुराने जमाने में बहुत सी जगह जहां पानी का भीषण संकट होता था वहां पर उस जमाने के राजा महाराजाओं ने जमीन की सतह से बहुत नीचे जाकर पानी ढूंढ निकाला और वहां पर नीचे जाने के लिए बढ़िया सीढ़िया बना दी और उसके ऊपर एक भव्य इमारत  बना दी। ऐसे स्थानों को बावली कहते हैं और बुंदेलखंड और गुजरात में कुछ बहुत प्रसिद्ध बावली है। इस तरह के चमत्कारी तरीके से पानी की खोज निकालने वाले राजा महाराजा तो अब हैं नहीं कहीं।

विज्ञान की प्रगति के साथ बिजली के पंप द्वारा कई दशकों से पानी निकाला जा रहा है ।  इसका इतना ज्यादा उपयोग हो रहा है कि वह दुरुपयोग की तरह सामने आ रहा है क्योंकि जमीन के नीचे पानी का स्तर गिरता चला जा रहा है जिसकी वजह से पेड़ों की जड़ों को जो पानी मिलता था वह गायब होता जा रहा है। पेड़ सूखता जा रहे हैं ताल सूखते जा रहे हैं और कई जगह अकाल की स्थिति पैदा हो गई है। कई बार जमीन के नीचे से बहुत ही ज्यादा पानी निकालने की वजह से वह स्थान खाली हो जाता है और धीरे-धीरे जमीन नीचे को धसते रखती है जिसे सब्सिडेंस कहते हैं । अमेरिका में कई जगह जमीन 10 या 20 फीट नीचे तक चली गई है।

 फरीदाबाद के पास का सुंदर प्राकृतिक ताल था जिसे बदखल ताल कहते थे।  वह भी सूख चुका है क्योंकि फरीदाबाद अब एक विशाल शहर बन गया है और वहां नदी नहीं होने के कारण बहुत ही अधिक मात्रा में कई दशक से जमीन के नीचे से पानी निकाला जा रहा है।

 पंजाब  में भी गेहूं की जगह चावल की खेती करने के लिए किसानों ने अत्यधिक मात्रा में पानी निकलना शुरू किया जमीन के नीचे से जिसकी वजह से  वहां पर पानी की सतह काफी नीचे चली गई है। 

 ऐसे ही 2024 में बेंगलुरु शहर जो कभी एक बहुत सुंदर  और बहुत ही अच्छे मौसम वाला शहर हुआ करता था आजकल पानी की भयंकर समस्या से जूझ रहा है। पुराने जमाने में शहर में तालाब हुआ करते थे, खुले मैदान हुआ करते थे सड़के भी कच्ची हुआ करती थी फुटपाथ कच्चे होते  थे । तब जब बरसात होती थी और सब जगह पानी भर जाता था तो धीरे-धीरे जमीन पानी को सोख लेती थी और पानी नीचे जाकर जमा हो जाता था। पर आधुनिक करण के चक्कर में मनुष्य ने  पूरे शहर को कंक्रीट और कोलतार से ढक दिया और तालाब गायब करके उनकी जगह मल्टी स्टोरी बिल्डिंग  खड़ी कर दीं। इस वजह से शहर में जो पानी बरसता है वह जमीन पर नहीं जाता है।

पानी के दुरुपयोग की वजह से  आगे भविष्य निराशाजनक दिखाई देता है।

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Tuesday, 26 March 2024

जब मैं छोटा बच्चा था

मेरा पहला स्कूल

मेरे ख्याल से मेरी उमर 4 साल रही होगी जब मेरा एडमिशन सेंट मेरी कौन्वेट स्कूल में लोअर केजी क्लास में हो गया । लोअर केजी क्लास में कुछ पढ़ाते नहीं है । बच्चों को खिलौने दे के खेलने के लिए कहते हैं या फिर एबीसीडी वाली किताब में एबीसीडी सिखाते हैं । कोई इम्तिहान भी नहीं होता है।

  मैं और मेरी दीदी ,जो मुझे दो साल बड़ी है,   घर में काम करने वाले मलहू नाम के एक  आदमी के साथ स्कूल जाते थे । छोटा शहर था स्कूल कोई आधे मील दूर था। आधा रास्ता सीमेंट वाली पक्की सड़क का था और उसके बाद आधा रास्ता कच्ची सड़क थी जिससे बरसात में पानी के गड्ढे होते थे। बरसात के दिनों में अक्सर उस पर अगर कोई मोटर गाड़ी आती थी तो गड्ढों में से पानी और कीचड़ उछालती थी । 

अक्सर सामने से आती गाड़ी को देखकर भी मैं अपने को कीचड़ से बचने की कोई कोशिश नहीं करता था और चलता जाता था पर मेरी दीदी जो काफी होशियार थी तेजी से मलहू के पीछे चली जाती थी तो पानी की पूरी कीचड़ मेरे और मलहू के ऊपर गिरती थी और दीदी को कुछ नहीं होता था। कुछ लोग बचपन म बहुत होशियार होते हैं और कुछ लोग बचपन में बुद्धू होते हैं। 

सेंट मैरीस स्कूल में बहुत से छोटे-छोटे बच्चे थे  पर किसी का नाम याद नहीं है। हां एक लड़के का नाम याद है जिसे बाबा कहते थे और याद इसलिए है कि वह अक्सर क्लास के बाहर बरामदे में टट्टी कर देता था।

स्कूल के दरवाजे पर एक बहुत विशालकाय चिलबिल का पेड़ था और उसमें से चिलबिल नीचे गिरती रहती थी। सभी बच्चे खाली समय में पेड़ के नीचे से चिलबिल बीन कर खाया करते थे। मैंने भी सेंट मैरीस स्कूल में काफी चिलबिल खाई ।

एलजी से मेरा प्रमोशन यूकेजी में हो गया और यहां आकर कुछ किताबें घर ले जाने को भी मिलती थीं जिनमें खूब सी तस्वीर हुआ करती थी रंग-बिरंगी। साल में एक या दो बार एक मेला भी लगता था स्कूल में बच्चों का , जिसे फैंसी फैयर कहते थे ।अभी तक याद है कि उसमें एक खेल होता था जिसमें दो आने का एक टिकट लेकर लकी डिप किया करते थे। एक मछली के कांटा जैसा हुक एक बंद मटके के अंदर डाला जाता था और उस पर फंसकर जो भी खिलौना आ जाता था वह हमारा हो जाता था।

स्कूल के बगल में पिताजी का ऑफिस था जहां के वह सबसे बड़े औफिसर थे । तो हम लोग अक्सर पापा के  दफ्तर चले जाया करते थे क्लास के बाद और वहां समर हाउस के अंदर जाकर खेलकूद क्या करते थे। अभी तक याद है कि दफ्तर में बोटल ब्रश के कई पेड़ थे जिनमे लाल बोटल ब्रश की शक्ल के फूल भरे रहते थे पेड़ में। उसमें से इलायची की महक आती थी।

 उसी साल शहर में हूफिंग कफ  बच्चों में फैलने लगा और मुझे भी हो गया। खांसते-खांसते बुरा हाल हो जाता था । इसके बाद मुझे स्कूल से निकाल दिया गया। 

स्कूल से निकाल देने के बाद दो-तीन साल तक मेरी शिक्षा घर पर ही हुई और उसके बाद सीधे छठी क्लास पर मेरा एडमिशन करा दिया गया।
उस दौरान घर पर पढ़ाने के लिए राजबली सिंह नाम के एक मास्टर आया करते थे जो हमें सभी विषय पढ़ाया करते थे और जो बहुत से विषय खेलकूद की तरह मजेदार स्टाइल में पढ़ाते थे। गणित के सवाल करने के लिए वह हमारे लौन के (जो काफी बड़ा था)  एक छोर पर दो मेज पर जोड़ घटाने के सवाल रख देते थे। फिर दूसरे छोर पर मैं और दीदी खड़े होते थे और जब सिटी बजती थी तो दौड़ के दूसरे छोर पर जाकर सवाल करते थे और वापस अपने पहले वाले स्थान पर आ जाते थे। जो पहले आ जाता था वह जीत जाता था।

उसे जमाने में  बच्चे स्कूल में कभी-कभी  जाड़े के मौसम में पेड़ के नीचे भी पढ़ते थे गर्मियों में काफी लोग बाहर सोते थे।अब तो सब कुछ बदल गया है । बच्चों के आउटडोर क्या खेल होते हैं ज्यादातर बच्चों को तो यह भी पता नहीं है। सब मोबाइल में गेम खेलते रहते हैं।

उस कॉन्वेंट स्कूल में और बाद में लड़कों के स्कूल में जो अंतर मैंने देखा वह मुख्य रूप से सफाई का था । कॉन्वेंट स्कूल बहुत साफ सुथरा था और सभी टीचर बहुत ही सभ्य और समझदार मालूम होते थे । बाद में स्कूल में क‌ई तरह के नमूने देखे और स्कूल में  गंदगी भी। लड़कों के स्कूल में पिटाई बहुत होती थी पर क्योंकि मेरे पिताजी को उसे छोटे शहर में काफी लोग जानते थे इसलिए वहटी से बचा रहता था।

 मैं और दीदी मलहू के साथ शाम को क्लब जाया करते थे खेलने के लिए । वहां बच्चों का पार्क था। इस क्लब में रोज शाम को मैं और दीदी अक्सर पार्क में खेलने के बाद अंदर जाकर शरबत पिया करते थे और अगर पापा बिलियर्ड खेल रहे होते थे तो वहां जाकर चिप्स खाने को भी मिल जाते थे। 

इलाहाबाद शहर की बातें

अन्य शहरों की तरह ही इलाहाबाद भी आज बहुमंजिली इमारत का  जंगल और सैकड़ो वाहनो वाला भीड़भाड़ का शहर बन चुका है।

इलाहाबाद  बहुत ही पुराना शहर है और इसका सैकड़ो सालों का इतिहास है। पहले यह सिर्फ एक तीर्थ स्थान था गंगा यमुना और सरस्वती नदी का संगम। फिर जसे-जैसे विदेशी आक्रमणकारियों का आगमन हुआ तो शहर का नक्शा बदलता चला गया। अंत में यहां ब्रिटिश साम्राज्यवादी आए और इलाहाबाद का एक नए सिरे से विका किया गया।

इसका नाम प्रयाग था जो भारत के सबसे प्रसिद्ध तीर्थ में से एक था। मुगलों ने इसका नाम बदल कर इलाहाबाद रख दिया और अंग्रेजों ने स्पेलिंग की हेरा फेरी करके इसे Allahabad कर दिया। तभी से यह इसी नाम से जाना जाता था 21सदी में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने से पहले ।

अब पुराना नाम वापस आ गया है , प्रयागराज।

वैसे तो 18 वीं सदी में अंग्रेजों की नजर इलाहाबाद पर पड़ चुकी थी और 19वीं सदी के शुरू  में यहां पर अंग्रेजों ने अपने पैर जमाने शुरू कर दिए थे पर 1857 के बाद ही अंग्रेजों का इलाहाबाद पर पूरा कब्जा हुआ जब ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटेन के महारानी विक्टोरिया ने भारत का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।

 उत्तर प्रदेश को पहले यूनाइटेड प्रोविंसेस औफ आगरा एंड अवध के नाम से जाना जाता था और इसकी राजधानी अंग्रेजों ने इलाहाबाद में स्थापित की। फिर बहुत तेजी से विकास हुआ इलाहाबाद का। 

कोलकाता से दिल्ली को जाने वाली रेलवे लाइन के एक तरफ पुराने जमाने का पूरा इलाहाबाद शहर बसा हुआ था पुराने जमाने का और इसकी दूसरी तरफ के गांवों को अंग्रेजों ने खाली करवा कर यहां पर आधुनिक इलाहाबाद का निर्माण करना शुरू किया । अंग्रेजों के बनाए इस नए इलाहाबाद को सफेद इलाहाबाद भी कहते थे और यहां सिर्फ सफेद चमड़े वाले अंग्रेजी बसते थे।
बहुत ही अच्छी प्लानिंग वाला नया इलाहाबाद शहर था। अंग्रेजों ने यहां पर बहुत ही चौड़ी सड़क बनाई और सड़क के दोनों और आधुनिक इमारतें खड़ी की। सिविल लाइंस का इलाका भारत की स्वतंत्रता के कई साल बाद भी एक स्वच्छ और अच्छी नगर प्लानिंग का उदाहरण पेश करता था।

अंग्रेजों के इलाहाबाद शहर को देखकर लगता है कि अंग्रेजों ने बहुत सोच समझ कर इसका विकास किया। सिविल लाइंस में एक खूबसूरत मार्केट का निर्माण किया , उसके पीछे दूर-दूर तक बड़े-बड़े सुंदर बंगले और चौड़ी सड़कों के दोनों तरफ हरियाली से भरे पेड़ लगाए। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का निर्माण हुआ। 


एक विशाल पार्क बनाया जिसका नाम अल्फ्रेड पार्क रखा।
अल्फ्रेड पार्क को अब चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है क्योंकि यही पर स्वतंत्रता संग्राम  सेनानी शहीद चंद्रशेखर आजाद को साम्राज्यवादी ताकतों ने  गोलियों से भून डाला था।
कई दशक पहले मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का छात्र रह चुका हूं और वहां के एक हॉस्टल में रहता था। उस जमाने में इलाहाबाद शहर काफी हद तक अंग्रेजों के समय जैसा ही था यानी ताबड़तोड़ बिल्डिंग निर्माण, सड़कों पर दुकानों का कब्जा, शहर में बढ़ती गंदगी और इलाहाबाद शहर की आबादी का बढ़ना नहीं हुआ था। तब यूनिवर्सिटी से सिविल लाइंस तक का इलाका बहुत ही सुंदर और शांत हुआ करता था। सिविल लाइंस की मार्केट जो बाद में बिल्डिंगों का जंगल बन गई थी साफ सुथरी एक मंजिल मार्केट वाली  साफ सुथरी बाजार थी। सिविल लाइंस मार्केट के मुख्य चौराहे की खूबसूरती उसके खुलेपन में थी

बड़े चौराहे के पास ही प्लाजा सिनेमा हुआ करता था जहां हिंदी फिल्में दिखाई जाती थी।

उसे गोल चक्कर से एक ओर एक सीधा रास्ता एक बहुत ही सुंदर चर्च की तरफ जाता था

उस सड़क के बांई ओर पैलेस‌ सिनेमा हुआ करता था जहां सिर्फ अंग्रेजी पिक्चर ही दिखाई जाती थी। दाहिने तरफ इसी सड़क पर मुख्य बाजार थी एक मंजिली जिसमें तरह-तरह की दुकान थी जैसे कोहली फोटोग्राफर,  जनरल मर्चेंट की दुकान किंग एंड कंपनी, लकी स्वीट मार्ट, मैस्टन टेलर्स और जूते की दो-तीन दुकान। प्लाजा सिनेमा के ठीक सामने का हिस्सा खाली प्लॉट था जिस पर बाद में बिल्डिगों का जंगल हो गया।

जहां तक सिनेमा घरों की बात है तो हम लोग अक्सर चौक की तरफ भी जाते थे सिनेमा देखने चौक में बहुत पुराने जमाने के सिनेमाघर थे ।
एक का नाम याद है,  विशंम्भर टॉकीज।
उससे काफी पहले रेलवे के ब्रिज से चौक इलाके में दाखिल होते ही उसे जमाने का सबसे आधुनिक सिनेमाघर निरंजन था जब शायद बंद हो चुका है। हम लोग अक्सर रविवार के दिन शाम को पिक्चर देखने चले जाते थे निरंजन में और निरंजन के ठीक नीचे ही एक रेस्टोरेंट है रात का भोजन कर लेते थे क्योंकि उसे दिन हॉस्टल में रात का भोजन नहीं मिलता था।

भारत में आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है और गांव से शहरों की ओर काफी आबादी का पलायन हुआ है इसलिए हर शहर की आबादी चौगुनी हो चुकी है। यही हाल है इलाहाबाद का भी है पर हमारी याददाश्त में तो अभी भी वही पुराना सुंदर खुला हुआ साफ सुथरा पुराना वाला इलाहाबाद ही है। वही पुराना पैलेस सिनेमा हॉल, वही पुराना कॉफी हउस, वही पुरानी साइकिल रिक्शा जिस पर बैठकर हम 25 पैसे में अपने हॉस्टल से सिविल लाइंस आते खाली खुली साफ सड़कों पर।

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आज का मनुष्य

एक विज्ञापन बहुत पहले आया था । शायद वाशिंग पाउडर का था जिसमें एक आदमी कहता है उसकी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद क्यों। 

सारी दुनिया इसी मानसिकता पर जी रही है ।अगर दूसरे के पास मुझसे ज्यादा है तो जिंदगी भर मैं कुढ़ता रहूंगा चाहे मेरे पास कितने ही सुख सुविधा हो।


अंग्रेजी में कहावत है count your blessings। मतलब यह है कि ऊपर वाले ने जो आपको दिया है उसको देखिए । यह मत देखिए कि दूसरे को क्या दिया है। अपने से गरीब आदमी को देखिए जिसको खाना नसीब नहीं हो रहा है और आपके पास तो एक स्कूटर भी है फिर भी आप अपने किस्मत को रो रहे हैं

कभी आपने  यह सोचा है कि आप कितने किस्मत वाले हैं ॽ 

मानव सभ्यता के शुरू में मनुष्य जंगल में रहता था। चारों तरफ जंगल ही जंगल थे । खतरनाक जानवर पूरे जंगल में घूमते रहते थे शिकार की तलाश में। आजकल की तरह मनुष्य मकान मे नहीं रहता था। उसके पास कपड़े भी नहीं थे । नंगा घूमता था। सुबह से शाम तक खाने की तलाश में रहता था। अपने को जंगली जंगली जानवरों से दिन भर बचाता रहता था। उसे रात में सोने के लिए स्थान ढूंढना पड़ता था सुरक्षित किसी गुफा में या पेड़ के ऊपर। 

भोजन की बड़ी समस्या होती थी। सुबह से शाम तक भोजन ढूंढना पड़ता था। किसी पेड़ का फल तोड़कर खा लिया किसी पौधे की जड़ को खा लिया। या फिर अपने से कमजोर जानवर को मार कर खा लिया। आजकल की तरह किसी रेस्टोरेंट में जाकर दाल चावल रोटी का आर्डर नही दे सकता था । बंद कमरे में सुरक्षित होकर चारपाई पर कंबल ओढ़ के सो नहीं सकता था। बीमार होने के बाद उसके पास कोई दवाई नहीं थी कि एक गोली खाई और पानी पी लिया और फायदा हो गया। इस बात पर  मनन कीजिए और समझने की कोशिश कीजिए। 21वीं सदी में आप जितने भाग्यवान है उतना मानव जाति में पहले कभी कोई नहीं हुआ था।

एक जमाने में तिलस्मी कहानियां होती थी। खुल जा सिम सिम कहते ही दरवाजा खुल जाता था ।
ताली बजाने से बहुत से कम हो जाते थे। आज यथार्थ में यह सब हो रहा है। और आगे क्या होना है इसकी तो कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बहुत तेजी से विकसित हो रही है। 21वीं सदी के शुरू में ही इंटरनेट ने पूरी दुनिया को पूरी तरह से बदल दिया है।  आप मोबाइल का बटन दबाकर कोई भी फोटो एक सेकंड में दुनिया के किसी कोने में भी भेज सकते हैं । आप दुनिया के दूसरे छोर में रहने वालों से बातचीत कर सकते हैं। आप घर में ही बैठकर मोबाइल के बटन दबाकर बाजार से बहुत कुछ खरीद सकते हैं और बटन दबाकर अपने बैक के अकाउंट से पैसे निकाल कर payment  सकते हैं ।

तो जरा सोचिए कि हम आदि मानव से कितने आगे आ चुके हैं और जीवन के सब सुख सुविधा दुनिया के करीब करीब सभी लोगों को उपलब्ध है।

 समस्या यह है कि मनुष्य ने विज्ञान में अपनी सुख सुविधाओं के लिए तो बहुत ही अधिक प्रगति कर ली है पर उसके मानसिक विकास के बारे में विज्ञान ने कुछ नहीं किया है। आज से हजारों साल पहले जो मानसिकता थी वही मानसिकता आज भी है। शायद  मानसिक रूप से और भी ज्यादा गिर गया है। 

यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि इतनी अधिक सुख सुविधा होने के बावजूद भी आज भी वह सोचता है कि दूसरे की कमीज उसकी कमीज से ज्यादा सफेद क्यों है।
विज्ञान की प्रगति तो हुई है पर मनुष्य अच्छा कैसे हो सकता है इस पर कोई प्रगति नहीं हुई है।
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