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Monday, 18 May 2026

शब्दों का हेर फेर

यह तो सभी जानते हैं कि आम एक फल है जिसका पेड़ काफी बड़ा होता है और सदाबहार होता है जिसमें गर्मियों के मौसम में फल लगते हैं जो पहले हरे होते हैं और बाद में मीठे और पीले हो जाते हैं। हरे आम की चटनी बनती है , हरे आम का पन्ना बनता है जो लू के दिनो में शरीर की रक्षा करता है। हरे आम का अचार भी बनता है । पका हुआ आम बहुत मीठा और स्वादिष्ट होता है। आम पूरे भारतवर्ष में होते हैं।

पर आम शब्द का प्रयोग फल के अलावा और भी तरह से होता है ,कई तरह से । कहावतों में पॉलीटिकल पार्टी में और आयुर्वेद में इत्यादि ।

बचपन में स्कूल के लिए पैदल जाते वक्त एक शॉर्टकट लेता था मैं क्योंकि सीधे सड़क से जाने में स्कूल बहुत दूर पड़ता था। शॉर्टकट एक पगडंडी थी जिसके दोनों तरफ एक बोर्ड लगा रहता था जिस पर लिखा था "आम रास्ता नहीं है". यह आम शब्द का दूसरा उपयोग देखा मतलब की रास्ता प्राइवेट है सब लोगों के इस्तेमाल का नहीं है. 

फिर स्कूल में ही एक कहावत पढ़ी कि "आम 
के आम गुठली के दाम" । यह आम शब्द का तीसरा प्रयोग था। मुहावरे के रूप में ।

करीब 10-12 साल पहले भारत में लोगों ने एक नई पार्टी बना दी आम शब्द के ऊपर "आम आदमी पार्टी"। यह आम खाने वाले मनुष्य की पार्टी नही थी बल्कि  एक पॉलीटिकल पार्टी थी।

आयुर्वेद में 'आम' (जिसका मूल संस्कृत शब्द 'अमा' है) का अर्थ कोई फल नहीं, बल्कि  "विषाक्त तत्व" (Toxins) होता है। आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में होने वाली अधिकांश बीमारियों की जड़ यही 'आम दोष' होता है।

हिंदी भाषा में कई ऐसे शब्द हैं जिनके एक से अधिक मतलब होते हैं। मिसाल के तौर पर कनक
का मतलब सोना भी होता है और गेहूं भी। कल का अर्थ बीता हुआ दिन भी होता है, आने वाला दिन भी होता है और मशीन भी होता है जैसे कल पुर्जे। इसी तरह तीर का मतलब भी एक तो तीर धनुष वाले तीर से होता है और दूसरा किनारे से, जैसे  "मेरा गांव गंगा के तीर है"। 

शब्दों का इस्तेमाल बहुत सोच कर करना चाहिए खास कर तब जब आप किसी दूसरे भाषाई क्षेत्र में हो जहां उस शब्द का कुछ और मतलब हो सकता है जो आपके लिए परेशानी कर सकता है। मिसाल के तौर पर हिंदी भाषिक क्षेत्र में वासना का अर्थ कामवासना से होता है पर मलयालम में इसका अर्थ खुशबू होता है।

 अब सोचिए कि अगर केरल का रहने वाला कोई मनुष्य उत्तर प्रदेश में आकर हिंदी बोलता है और एक युवा महिला से कहता है कि आपके शरीर से बहुत वासना आ रही है तो उसका क्या हाल होने वाला है। 

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रुपए की कहानी बचपन से बुढ़ापे तक

हम पैदा हो गए थे भारत के आजादी के थोड़े पहले तो आजादी के टाइम पर बच्चे थे। तब रुपया आना पैसा होता था। ₹1 के 16 आने  और एक आने का चार पैसा। दो तरह के पैसे के सिक्के दिखाई देते थे एक तो बड़े साइज का था आजकल के रुपए का दूने साइज का। और एक होता था आजकल के रुपए के साइज का गोल और बीच पर उसमें एक छेद होता था जिसमें एक पेंसिल जा सकती थी।  मतलब है कि वह एक छल्ला था। दोनों सिक्के शुद्ध तांबे के होते थे। आजकल तो ₹1 का सिक्का भी लोहे का होता है, सस्ते लोहे का। 

एक पैसे में तीन बीड़ी आती थी और दो पैसे है काफी हरी सब्जी।

हां तो एक आने में चार पैसे होते थे और एक आने का सिक्का पीतल मिली धातु का होता था। सुंदर चमकीला। उसके बाद दो आने का सिक्का होता था और फिर एक शुद्ध  चांदी की चवन्नी। अठन्नी और रुपया भी चांदी का ही होता था, अठन्नी थोड़ी बड़ी और रुपया काफी बड़ा और हुई वजनदार। आजकल तो उस ₹1 की कीमत तीन  हजार रुपए से ज्यादा है।

आजकल तो मिट्टी तेल मिलता ही नहीं है। वह तब कौड़ियों में मिलता था और गरीब आदमी के लालटेन और छोटी ढिबरी से ही उसके घर में रोशनी होती थी।  पेट्रोल आठ आना लीटर था मतलब 50 पैसे का 1 लीटर था।

इस तरह के दाम सुनकर लोग पगला जाते हैं। अक्सर फेसबुक में पढ़ता हूं की क्या बढ़िया जमाना था जब सब चीज इतनी सस्ती थी पर कोई बंदा यह नहीं सोचता की उस समय आपके पास कितना पैसा होता था। तो सच्ची बात तो यह है कि उस समय भी पैसे की तंगी होती थी आजकल की ही तरह। 

आपको एक उदाहरण देता हूं।

आजकल एक पुताई करने वाले मजदूर की एक दिन की कमाई ₹700 के करीब होती है। उस जमाने में एक दिहाड़ी मजदूर को मुश्किल से ₹3 रोज मिलता था। दफ्तर के एक चपरासी की मासिक आय तब ₹70 होती थी जो आजकल करीब 28000 है। कहने का मतलब है की दाम तो बहुत कम थे सब चीजों के पर आमदनी भी उसी हिसाब से बहुत कम थी तो हाथ सभी के तंग रहते थे। हां यह बात सही है कि वैश्विक बाजार में रुपए का भाव मजबूत था। भारत की आजादी के बाद $1 ₹5 के बराबर था जो आजकल 95 रुपए को पार कर चुका है। मतलब  यह हुआ कि अमेरिका का जो सामान पहले आप ₹500 में खरीद सकते थे वह अब आपको ₹10000 के लगभग पड़ेगा।

भारत की पहली नोटबंदी 12 जनवरी 1946 को हुई जब सरकार ने द्वितीय महायुद्ध के टाइम पर  मुनाफाखोरों के खिलाफ अभियान छेड़ा। 500 1000 और 10000 के नोटों की नोटबंदी हो गई।

इसका असर  भारत के जनसाधारण को कुछ भी नहीं पड़ा क्योंकि तब आम आदमी के पास कभी ₹100 का नोट भी नहीं आया। 

दूसरे नोटबंदी मोरारजी भाई देसाई ने 1978 में की। उस समय तक 1000, 5000 और 10000 के नोट वापस आ गए थे जिन्हें बंद करवा दिया गया। इसका भी असर जन साधारण पर बिल्कुल नहीं पड़ा क्योंकि 1000 के नोट को तो शायद ही किसी आम आदमी ने भी 1978 देखा होगा। 

तीसरी नोटबंदी 8 नवंबर 2016 को हुई  अचानक।  नोटबंदी हो गई 500 और 1000 के नोट की। इस समय तक रुपए का मूल्य इतना गिर चुका था की साधारण आदमी भी 500 के नोट का इस्तेमाल करता था इससे 80% से ज्यादा लोगों को इसका गंभीर प्रभाव पड़ा और बैंकों के बाहर बहुत ही लंबी कटारे लग गई पुराने नोटों को जमा करने की । समाज के ऊपर इसका बहुत असर पड़ा। 

तो मतलब यह निकला कि मेरे बचपन में रुपया मेंरी ही तरह स्वस्थ था और मेरे बुढ़ापे में रुपया मेरी तरह ही कमजोर हो गया है। मैं तो अपने स्वास्थ्य को स्थिर रखने की काफी कोशिश कर रहा हो पर रुपया ऐसी कोशिश करता हुआ नजर तो नहीं आ रहा है। 

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यह क्या हो रहा है भाई

अरे भाई यह क्या हो रहा है ! दुनिया बिल्कुल बदलती जा रही है!

 हम इस दुनिया के पुराने लोगों में से है पर हमको ऐसा नहीं लग रहा है कि हम उसी प्लेनेट में है जिस पर पैदा हुए थे । 

पहले पोस्ट ऑफिस जाकर अंतर्देशीय पत्र खरीदते थे फिर घर जाकर उस पर चिट्ठी लिखते थे पता लिखते थे और फिर लाल रंग के लेटर बॉक्स की तलाश में निकल पड़ते थे। अब तो 20 साल से कोई चिट्ठी ही नहीं लिखी है।

लेकिन इस समय मसला कुछ और है। कल मई की चिलचिलाती  धूप में एक अधेड़ सब्जी वाले को जलती हुई सड़क पर ठेला ढकेलते हुए देखा तो सोच में पड़ गया। उसे ग्राहक ढूंढने पड़ रहे थे जबकि पहले  ग्राहकों की भीड़ लग जाती थी। सब्जी बेचने  ठेले वाले मजबूरी में आते हैं धूप  में बारिश में घर  घर जाकर अपना सामान बेचने । जब सब्जियां बिक जाती है तब जाकर दो टाइम की रोटी का जुगाड़ होता है। 

अब नए ठेले वाले आ गए हैं। हां भाई जो ठेले वालों के साथ कंपटीशन करें वह ठेले वाला ही कहलाएगा। यह लोग हैं फ्लिपकार्ट अमेजॉन बिग बॉस्केट जिओ मार्ट  वगैरा-वगैरा। इनका हिसाब किताब फर्क है यह सामान सीधे गांव वालों से उठाते हैं मंडी से नहीं। काफी सस्ते में सामान मिल जाता है। गरीब ठेले वाले तो मंडी से लेते हैं मतलब यह हुआ की गरीब ठेले वालों के पेट में लात मारने के लिए करोड़पति बिजनेस वाले आ गए हैं ।

 बहुत ही शर्म की बात है। 

पब्लिक तो यह देखी है की कम से कन दाम में ज्यादा से ज्यादा समान मिले तो अब लोग यह समझते हुए भी की यह सामान खरीदने का मतलब है गरीब ठेले वालों के पेट में लात मारना, मजबूरी में ऑनलाइन ही सब्जी खरीदते हैं।

सरकार को इसका कुछ उपाय ढूंढता होगा।कुछ इस तरह का सिस्टम होना चाहिए कि ठेले वाला भी कम दाम में सब्जी खरीद सके ताकि उसे भी कम दाम में बेचने से नुकसान ना हो। या फिर कुछ इस तरह की व्यवस्था हो की ऑनलाइन मार्केटिंग वाले बाकी सब सामान तो बेचे पर सब्जियां अगर बेचें तो उसमें उनको  टैक्स देना पड़े। ऐसा करने से वह सब्जियों के दाम बहुत कम नहीं रख पाएंगे।

भैया मैं समझ रहा हूं की जो बात मैं कह रहा हूं उससे मेरा भी नुकसान हो सकता है क्योंकि सब्जियां तो मैं भी खरीदता हूं। पर ताजी सब्जियां सिर्फ ठेले वालों से ही मिल सकती है। ऑनलाइन वाले तो सस्ती सब्जियां खरीद कर कोल्ड स्टोरेज में रखते हैं जहां उनके स्वाद और गुण में फर्क आ जाता है। 

बाहर एक सब्जी वाला आवाज लग रहा है।अब चलता हूं सब्जी खरीदने।

रेलवे की बातें

महात्मा गांधी जब अफ्रीका से भारत आए तो उनका पूरा हिसाब किताब ही बदल गया। पहले तो वो सुटेड बूटेड रहते थे क्योंकि बड़े वकील थे पर यहां आकर उनका परिधान बदल गया। सिर्फ एक धोती और वह भी लंगोटी नुमा।  निकल पड़े ट्रेन की यात्रा करने के लिए। मुंबई से मद्रास। अफ्रीका में तो फर्स्ट क्लास के डिब्बे से बाहर फेंक दिए गए थे पर भारत आकर थर्ड क्लास  टिकट खरीद कर यात्रा की। ट्रेड ई ट्रेड आई और उधर रेट के डिब्बे में घुसने की कोशिश की। थर्ड क्लास के यात्री ज्यादा और डिब्बे कम। बड़ी मुश्किल से ट्रेन के अंदर घुस पाए। और फिर जो उन्होंने देखी थर्ड क्लास की हालत तो उन्होंने इस पर एक लंबा चौड़ा लिख लिख डाला देख समाचार पत्र में ।


एक बंगाली बाबू  थे। नाम था ओखिल चंद्र सेन । थर्ड क्लास में सफर कर रहे थे। अहमदनगर स्टेशन आते ही उदय बड़े जोर की पॉटी लगी उसे जमाने में ट्रेन के डिब्बे में कोई बाथरुम नहीं होता था। तो जैसे ही ट्रेन रुकी वह भेज पॉटी कर दे। और पॉटी करने के बाद जब वह अपनी धोती सवाल रहे थे तो ट्रेन चल पड़ी वह धोती लपेट लपेट ट्रेड के पीछे भागे और उनके धोते खुल गई। तो फिर गुस्से में आकर उधर है भारत सरकार को एक पत्र लिखा जिसकी वजह से सरकार दे फिर ट्रेड में पार्टी की व्यवस्था की । आप उनकी यह 9 जुलाई 1909 की चिट्ठी पढ़ सकते हैं दिल्ली के रेलवे म्यूजियम में जाकर।

तो आखिल बाबू की चिट्ठी की वजह से ट्रेन में पार्टी की व्यवस्था हो गई की व्यवस्था हो गई।  पर इस पर भी कभी-कभी परेशानी हो जाती है। मुझे भी एक बार दिल्ली जाते वक्त दिल्ली आने से करीब 1 घंटे पहले जोर की पॉटी लगी और मैं भाग बाथरूम की तरफ। कॉरिडोर में  काफी भीड़ थी क्योंकि कंपार्टमेंट में डेली पैसेंजर नाम के बंदे घुस गए थे। मुश्किल से जब पॉटी के दरवाजे पर पहुंच कर दरवाजा खोला तो अंदर 5 6 डेली पैसेंजर खड़े दिखाई दिए जिन्होंने बाहर निकलने से इनकार कर दिया। 

अब बताइए हुई तो परेशानी टॉयलेट की व्यवस्था होते हुए भी। यह तो अच्छी बात थी की तब में जवान था और मैंने पॉटी रोक ली । अगर मैं उस समय आज की हालत में होता तो पॉटी निकल गई होती बाहर दरवाजे पर ही। 

खैर अब बंद कर रहा हूं यह लेख क्योंकि सुबह हो गई है और पॉटी लग रही है। अगर देर करूंगा तो आपको पता ही है क्या होगा।

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Saturday, 14 February 2026

बाजार का बदलता स्वरूप

बाजार का बदलता स्वरूप


होली के एक दिन पहले दूध और दही की इतनी ज्यादी मांग थी की 12:00 बजे तक पूरी मार्केट में दूध दही खत्म हो गया। मुझे दही की जरूरत थी। अब टाइम पर खरीद नहीं पाया तो सोच रहा था क्या किया जाए तो इसी बीच किसी ने सुझाव दिया की क्यों ना ऑनलाइन ऑर्डर कर दो । ट्राई करके देखो। तो मैंने अपना मोबाइल फोन उठाया,  एक ऑनलाइन मार्केटिंग साइट पर गया और दही दूध वगैरा का ऑर्डर दे दिया । 

ठीक 10 मिनट के बाद मेरा सामान मेरे यहां पहुंच गया ।

समय कितना बदल गया है यह सोचकर आश्चर्य होता है। आज से अनेक दशक पहले भारत की आजादी के आसपास के समय में खरीदारी करना आजकल के अनुभव से बिल्कुल फर्क था। 

हम एक छोटे शहर में रहते थे। घर से थोड़ी दूर पर एक छोटा सा बाजार था जहां पर खेलकूद का सामान मिलता था डबल रोटी मक्खन की दुकान थी और दारू की दो-तीन दुकान थी। वह सिविल लाइंस का इलाका था जहां एक जमाने में अंग्रेज रहते थे तो दारू की दुकान होना तो जरूरी था। बाकी कोई दुकान नहीं थी ना कपड़ों की, न गेहूं चावल वगैरह की ।सब्जी मंडी की भी कोई दुकान दूर-दूर तक नहीं थी और न ही कोई दुकान जनरल मर्चेंट की।

उसे जमाने में सर पर टोकरी रखकर सब्जी बेचने वाले कभी-कभी घर पर आते थे।  एक खूब चौड़ी टोकरी सर पर रखकर सब्जी वाली आवाज लगाती हुई आती और उस से सब्जी खरीदने थे हम लोग। बाकी सब्जियां हमारा रसोईया पता नहीं कहां से लाता था और किस भाव में। 

छोटे-छोटे कई फेरी वाले सामान बेचने के लिए ज्ञापन आते थे जैसे candyfloss जिसे बुढ़िया के बाल कहते थे, चना जोर गरम कटे हुए गन्ने के टुकड़े और मेवे बेचने वाला पठान। कभी कबार कपड़े बेचने वाले भी आ जाते थे।

उसे जमाने में घर से काफी दूर पर बाजार होता था  जहां सभी सामान मिलता था सब्जियां जूते कपड़े राशन का सामान इत्यादि। पर वहां जाने के कोई आसान साधन नहीं थे। न टेंपो था न ऑटो था और नहीं पैडिल वाली रिक्शा थी। तांगे एक्के के चलते थे थोड़े बहुत। ज्यादातर लोग अपनी साइकिल का इस्तेमाल करते थे।

कहने का मतलब है कि सामान की खरीद फरोख्त के लिए अलग से काफी टाइम निकालना पड़ता था और आने जाने के साधन ढूंढने पड़ते थे फिर मेहनत लगती थी और पैसे लगते थे।

1950 के दशक में सभी शहरों में आजादी के बाद पाकिस्तान से काफी शरणार्थी आ गए थे खासकर पंजाब से और वह सभी बहुत अच्छे किस्म के बिजनेसमैन थे । तो धड़ाधड़ कई तरह की दुकान खुलने लगी। कपड़ों की दुकाने, राशन की दुकाने, मेवे और मिठाइयों की दुकाने और जनरल समान की भी दुकाने। शहर के पुराने दुकानदारों में ग्राहकों से अच्छी तरह बात करने की आदत नहीं थी पर पंजाब से आए खासकर सिख समुदाय के लोग बहुत अच्छी तरह ग्राहकों से बात करते और धीरे-धीरे उन्होंने पूरी मार्केट पर कब्जा कर दिया।

धीरे-धीरे यातायात के साधन अच्छे हो गए ऑटो रिक्शा चलाते हैं लगे दूर  दूर से सामान लाना आसान हो गया लोगों के पास अपने स्कूटर होने लगे। और कुछ दुकानदारों ने तो घर पर खुद ही सबर पहुंचना शुरू कर दिया।

इसके बाद एक समय आया जब  शहरों में mall खोलने लगे एक ही बहुत बड़ी जगह पर एक परिवार की जरूरत का सभी सामान मिल जाता था वहीं पर सब्जी लिए वहीं पर राशन लिया वहीं पर प्रधान के सामान दिए वहीं पर जरूर की अन्य चीजों का सामान भी लिया और फिर काउंटर पर आकर बिल बनवाकर पैसा दिया और घर को चल दिए। mall के आ जाने के बाद छोटी दुकानों की आमदनी कुछ घट गई क्योंकि बोल में समान थोड़ा सस्ता मिलता था।

लेकिन सबसे बड़ा चमत्कार इंटरनेट के आने के बाद हुआ जब कुछ बड़ी-बड़ी कंपनियों ने सीधे सस्ते दामों पर घर पर सामान पहुचाना शुरू कर दिया। अब तो आपके घर से बाहर निकाल दे की भी आवश्यकता नहीं थी मोबाइल उठाया अमेजॉन फ्लिपकार्ट ब्लैंकेट जिओ मार्ट बिगबास्केट वगैरह बहुत से मार्केटिंग साइट्स है जहां पर आप जाकर हर तरह का समान चाट सकते हैं और आर्डर कर सकते हैं और बहुत जल्दी ही आपके घर के अंदर वह सामान पहुंचा दिया जाता है दुकानों से थोड़े कम दाम में।

विज्ञान की प्रगति के साथ इतनी तेजी से विकास हो रहा है कि ईश्वर ही जानता है कि आज से 10 साल बाद हम सामान किस तरह खरीदेंगे।

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Tuesday, 23 December 2025

जाड़ों में स्वास्थ्य रहने के नियम

WINTER RULES

1. keep cold out. अपनी कंफर्ट लेवल तक एक के ऊपर एक ढीले ढीले स्वेटर पहलिए। एक के ऊपर एक socks पहनिए। एक के ऊपर एक टोपी पहनिए। विशेष रूप से कानऔर गले भी अच्छी तरह ढके होने चाहिए। एक के ऊपर एक leggings पहनिए।

2. aapki winter diet में कॉफी लिक्विड होनी चाहिए ताकि blood गाढ़ा न हो। कम से कम 8 से दस गिलास liquid शरीर में जानी चाहिए । पानी गुनगुना पीजिए। पानी के अलावा सौंफ का पानी, हल्दी धनिया जीरा का पानी। काली मिर्च अदरक दालचीनी की चाय भी पीनी चाहिए। हल्दी और दालचीनी कम मात्रा में लीजिए क्योंकि अधिक मात्रा में लीवर पर असर पड़ता है। लहसुन और अदरक खून  को पतला करते हैं। इन्हें रोज खाईये। इसके अलावा काफी
 लिक्विड दाल, रसेदार सब्जियां, काला नमक डाल के गुनगुना मट्ठा भी पीजिए। जाड़ों में dehydration से बचिए।

3. सर्दियों के मौसम में विटामिन डी बहुत कम हो जाता है  (रोज  kareeb 800 iu की मात्रा की आवश्यकता होती है)। खाने के बाद कम पावर वाली विटामिन बी12 और d3 रोज एक गोली खाएं दिसंबर जनवरी के महीने में। अगर कम पावर वाली d3 न मिले तो ज्यादा पावर वाली 
60000iu की आधी tablet हर 10 दिन में दिसंबर जनवरी में लीजिए। आपको यह टैबलेट जनऔषधि ब्रांड में जन औषधि की दुकान में मिल जाएगी (four tablets for Rs 16).
(डॉक्टर लोग इसे हर हफ्ते एक गोली खाने को कहते हैं 6 हफ्ते तक,  पर USA के FDA के अनुसार यह dose बहुत ज्यादा है).

4. सिर्फ heater पर ही depend मत कीजिए। हीटर वाले कमरे से दूसरे कमरे में जाने पर अचानक ठंड लग सकती है इसलिए गर्म कपड़ों पर ज्यादा भरोसा कीजिए टोपी से लेकर मोजे तक।

5.  No white sugar / no deep fried food / no refined oil / less salt / no over eating. No ready to eat food from the market.

6. keep checking your blood pressure 
twice a week. जाड़ों में ठंड से arteries काफी सिकुड़ जाती है और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है . साथ में blood गाढ़ा होने से blood clotting का भी खतरा रहता है। अगर ब्लड प्रेशर काफी बड़ा हुआ है तो डॉक्टर की सलाह पर ब्लड प्रेशर की दवा खाना अक्लमंदी का काम है। 

6. घर के अंदर ही ही थोड़ी बहुत एक्सरसाइज कीजिए। यह बहुत जरूरी है। कड़ाके की ठंड में सुबह-सुबह,  चाहे आपने कितने ही कपड़े पहने हो, morning walk करना सही नहीं है। पर यह जरूरी है की आप एक्सरसाइज जरूर कीजिए ब्लड सरकुलेशन को ठीक रखने के लिए। तो घर के अंदर
ही एक्सरसाइज कीजिए। 

अगर आप इन नियमों का पालन करते रहेंगे तो आपके जाड़े आराम से कट जाएंगे।

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Tuesday, 25 November 2025

मटका को मटका क्यों कहते हैं ?

नाम कैसे पड़ा  ?

मिठाई को मिठाई क्यों कहते हैं ? मटके को मटका क्यों कहते हैं ? रसगुल्ला को रसगुल्ला क्यों कहते हैं ? तवे वाली रोटी को  क्यों कहते हैं फुल्का ? चारपाई को चारपाई क्यों कहते हैं ?

चलिए इसी बात पर आज कुछ सोचा जाय।

मिठाई शब्द मीठा से बना है, जितने भी पकवान मीठे होते हैं उन्हें मिठाई कहते हैं। 

 मटका मिट्टी का होता है। शुरू शुरू में शायद कहते थे "मिट्टी का" और धीरे-धीरे शब्द मटका प्रयोग में आने लगगु।

रसगुल्ला गोल होता है और रस में डूबा होता है, तो शायद शुरू शुरू में रस का गोल रहते होंगे और बाद में यही शब्द रसगुल्ला बन गया होगा।

 तवे की रोटी को तवे में से चिमटे से पड़कर आज मेंडला जाता है और वह फूल जाता है शायद इसीलिए उसका नाम फुल्का पड़ गया ।
चारपाई के चार पैर होते हैं

यहां तक तो ठीक है पर सभी शब्द समझ में नहीं आते । संगमरमर को संगमरमर क्यों कहते हैं ? सब्जी को सब्जी क्यों कहते हैं ? नाखून को नाखून क्यों कहते हैं ?

संगमरमर शब्द फारसी से लिया गया है संग का मतलब पत्थर होता है और मरमर का मतलब होता है बहुत ही चिकना।

 ऐसे ही नाखून शरीर का वह हिस्सा  है जिसमें खून नहीं होता है। तो नाखून कहने लगे।

फारसी में सब्ज का मतलब हरा होता है और ज्यादातर ताज़ी सब्जियां  हरे रंग की होती है।

ऐसे ही बहुत से शब्द मुगलकालीन शासन में फारसी से और अरबी से भारत में आए और बहुत लोकप्रिया हो गए।

हिंदी की ही बात नहीं है अन्य भाषाओं में भी बहुत से शब्द दूसरी भाषाओं से किए हुए होते हैं ।अंग्रेजी में भी बहुत से शब्द हैं जो हिंदी से दिए हुए हैं जैसे caravan, bungalow avatar chutney thug bandobast इत्यादि .

अक्सर एक ही स्रोत से अंग्रेजी ,जर्मन, फ्रांसीसी, फारसी, संस्कृत, बंगाली इत्यादि भाषाओं के शब्द होते हैं । थोड़े फर्क हो जाते हैं। 

हिंदी में निशा , night (English)
 nicht (Scots), Nacht (German), nacht (Dutch, Frisian),  nishi (Bengali), nakts (Latvian), nyx (Ancient Greek), , nakt- (Sanskrit), nocte (Latin), nuit (French).

भाषा विज्ञान एक रोचक विषय है. मैं तो ऐसे ही चर्चा कर रहा हूं शायद आप लोगों में से किसी को इसका गहरा ज्ञान होगा। प्रकाश डालिएगा ।

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Thursday, 20 November 2025

चला जाऊंगा मैं यह जग छोड़ के

एक गाना है फिल्म "कटी पतंग" में ।
बोल इस प्रकार हैं:
"जिस गली में तेरा घर ना हो बालमा, उस गली से हमें तो गुजरना  नहीं, जो डगर तेरे द्वार को जाती न हो उस डगर पर हमें पाव रखना नहीं "

आ ये रसमें ये कसमें सभी तोड़ के
तू चली आ चुनर प्यार की ओढ़ के
या चला जाऊंगा मैं ये जग छोड़ के।

इस गाने की analysis करना बहुत जरूरी है।
इस गाने से यह साफ पता चलता है कि यह उस लड़की को परेशान कर रहा है। अगर वाकई दोनों का प्रेम होता तो सड़क पर खड़े होकर चिल्ला कर गाना नहीं गाता।

चलिए शुरू करते हैं analysis। 

पहला पॉइंट तो यह है कि वह कह रहा है कि इस गली के अलावा कहीं नहीं जाएगा यानी परमानेंटली इसी गली में डेरा डालने के चक्कर में है। गली काफी लंबी है
यहां पर कई सवाल उठते हैं ।
पहला सवाल है वह रहेगा कहां दूसरा सवाल है वह खाएगा क्या और कहां और  तीसरा सवाल है की खाने और रहने के लिए  पैसा कहां से आएगा। 

यह तो निश्चित  है कि उसे इस गली में अच्छी नौकरी मिलने से तो रही। इसे नौकरी मिलनी नहीं सिवाय इसके कि वह झाड़ू पोछा फ़टका मारने का काम करें या फिर खाना बनाने का क्योंकि अन्य किसी जॉब जैसे मिस्त्री मजदूर इत्यादि में रोज काम तो मिलने मुश्किल है । किस्मत अच्छी हो तो  पैसे का बंदोबस्त हो जाएगा इस तरह।

आगे बढ़ते हैं.  
वह रहेगा कहां ? अगर वहां पर कोई छोटा-मोटा  क्वार्टर हो तो एक कमरा किराए पर ले लेगा।
जहां तक खाने का सवाल है उस गली में कोई तो ढाबा तो होगा ही। हर मोहल्ले में होता है। और अगर ढाबा नहीं हुआ तो घर में खाना पकाएगा।

 चलिए अब आ गया मकान में अपने एक कमरे के। नौकरी ढूंढेगा महल्ले में,
 पर फिलहाल उसके पास कुछ पैसे है कुछ दिन काम चलाने के लिए।

पर सवाल यह है कि इस तरह के आदमी से शादी तो कोई लड़की करने से रही,  खासकर वह लड़की जिसके लिए गाना गा रहा है जो की अपने मध्यवर्गीय माता पिता के सथ  रहती है। इसी गली में उसका अपना मकान है। 
अब अगली लाइन सुनिए । अगली लाइन में वह क्या कहता है :

"तू  ये रस्मे वादे सभी छोड़ के, तू चली आ यहां चुनर ओढ़ के या चला जाऊंगा मैं ये जग छोड़ के।

 अब पोजीशन बिल्कुल साफ हो रही है । बात पुलिस में रिपोर्ट करने की बनती है क्योंकि यह आदमी  आत्महत्या करने की धमकी दे रहा है और आत्महत्या करना एक अपराध है ।(भारतीय दंड संहिता अध्याय XVI सेक्शन 309)

इस आदमी का फ्यूचर कुछ नहीं है ।  झाड़ू पोछा फ़टका का काम,  रूपए पैसे और खाने पीने की किल्लत और एक कमरे में गुजारिश।  वह लड़की तो इससे शादी करने से रही। 

अब देखते हैं कि होता क्या है।

होता यह है कि लड़की के पिता परेशान होकर लड़की की फौरन शादी कर देते हैं एक अच्छे घर में । बातचीत पहले से चल रही थी।

शाम को बारात आती है रात में शादी होती है और अगले दिन सुबह लड़की विदा हो जाती है।

उस दिन पूरे दिन भर यह आदमी अपने घर से बाहर नहीं निकला । कहीं दिखाई नहीं दिया।

अगले दिन भी नहीं दिखाई दिया तो लोगों ने सोचा की इसने आत्महत्या कर ली है क्योंकि गाना गा रहा था "या चला जाऊंगा मैं यह जग छोड़ के। "

तीसरे दिन मोहल्ले के लोगों ने पुलिस में रिपोर्ट कर दी।

तो पुलिस आती है और इसके  घर के अंदर प्रवेश करने के लिए दरवाजे को खटखटाती है । कोई जवाब नहीं मिलता है। फिर हल्का सा धक्का देने से दरवाजा खुल जाता है।

मोहल्ले के कुछ लोग पुलिस के साथ अंदर जाते हैं। अन्दर कोई नहीं है। एक कमरे का क्वार्टर था और साथ में बाथरूम। कमरा बिल्कुल खाली मिलता है उसका बिस्तर बक्सा चारपाई कुछ भी नहीं है।

पुलिस इंस्पेक्टर ने चारों तरफ नजर घूमाई है तो एक कोने में प्लास्टिक का हरे रंग का जग रखा मिला और उसके नीचे एक पर्ची रखी हुई थी जिसमें कुछ लिखा हुआ था।

पुलिस इंस्पेक्टर ने पर्ची निकाल कर पढ़ी।

पर्ची में लिखा हुआ था " मैंने कहा था कि अगर मेरी तुमसे शादी नहीं हुई तो मैं जग छोड़  कर चला जाऊंगा इसलिए इस पुराने जग को यहीं पर छोड़कर मैं जा रहा हूं"

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Sunday, 16 November 2025

ch2so4

CH2SO4

यह केमेस्ट्री भी अजीब ही सब्जेक्ट है । इसमें हर चीज का एक फार्मूला होता है और एक केमिकल होती है। मसलन आप केला नहीं खा रहे हैं।   आप  पोटेशियम खा रहे हैं। आप आंवला नहीं खा रहे हैं।  आप कैल्शियम  आयरन  और विटामिन सी खा रहे हैं ।आप नमक नहीं खा रहे हैं  आप सोडियम क्लोराइड खा रहे हैं। और तो और आप पानी भी नहीं पीते हैं आप H2O पीते हैं ।

अरे ब्रदर  ठंडे पानी  बेचने वाले के पास जाओ  और कहो मुझे H2O दे दो  तो बेचारा क्या समझेगा। सीधे-सीधे पानी क्यों नहीं कह सकते। पर नहीं  हम तो H2O ही कहेंगे । सीधी सीधी बात कहना तो साइंस डिपार्टमेंट वालों को पसंद भी नहीं। याद है आपको कि सीधी सीधी बात  कहने पर बेचारे आमिर खान को कैसे फिल्म 3 ईडियट्स में क्लास से बाहर निकाल दिया  प्रोफेसर साहब ने।

मैंने भी थोड़े समय तक केमिस्ट्री पढ़ी -- के कुमार की किताब हुआ करती थी हमारी केमिस्ट्री की , काफी रोचक किताब थी। लेकिन  केमिस्ट्री की लेबोरेटरी ने मेरी पैंट का कबाड़ा कर रखा था जगह-जगह छेद हो जाते थे ।  वहां पता नहीं क्या-क्या चीज थीं जो एक दूसरे में मिलानी पड़ती है और पेंट पर अगर छीटे गिर गए तो छेद हो जाते थे। और बरामदे में एक गैस प्लांट भी था जिससे मैं बहुत ही परेशान रहता था । उसमें हर समय एक गैस बनती रहती थी। उसे गैस की भयंकर बदबू थी।

 खैर अपने पैंटों को बचाने के लिए केमिस्ट्री तो मैंने छोड़ दी लेकिन केमिस्ट्री लेबोरेटरी की महक मेरे दिमाग में और नाक में इस बुरी तरह घुस चुकी थी की जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में  पहले ही दिन अपने मित्र के साथ (जो  मेरे साथ बीए में थे) जा रहा था क्रिकेट के मैदान की तरफ तो अचानक मैंने कहा क्या यह यह दाहिने तरफ  केमिस्ट्री डिपार्टमेंट है । 

उसने कहा, है तो सही   पर तुम्हें कैसे पता चल गया ?  मैंने कहा भैया तुमको महक नहीं आ रही है क्या ? वह बोला अरे कोई चीज सड़ रही होगी उसी के महक है । पर मैं तो जानता था। मैं H2S गैस भुगत चुका था।

केमेस्ट्री तो बहुत पहले छोड़ दी लेकिन अभी कुछ ऐसे लोग हैं जिनकी मौजूदगी में कभी-कभी केमिस्ट्री डिपार्टमेंट  की याद आ ही जाती है जब वह अनाप-शनाप खा कर पूरे कमरे को केमिस्ट्री डिपार्टमेंट की लैब बना देते हैं।

केमिस्ट्री में एक ऐसा नायाब फार्मूला है जिसे उत्तरी भारत के केमिस्ट्री के विद्वानों के अलावा पूरे विश्व में कोई नहीं जानता है। 

 वह फार्मूला है ch2 so4। 

अब यहृ मत पूछियेगा  कि यह किस चीज का फार्मूला है।

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Sunday, 9 November 2025

हमारे बचपन के जमाने में (3)

वह जमाना आजकल से बहुत फर्क था।

उसे जमाने में जिंदगी की रफ्तार बहुत धीमी थी और आजकल की तरह जिंदगी में आपाधापी नहीं थी। शहर छोटे होते थे । शहर में लोगों के मकान बड़े होते थे । शहर का काफी हिस्सा खुले मैदान का होता था। ‌ सड़कें आजकल की तरह मोटर गाड़ियों से भरी नहीं होती थीं। आसमान गहरा नीला दिखता था रात में तारे और आकाशगंगा बहुत चमकीले नजर आते थे। घर के आंगन में गौरैया चिड़िया का झुंड हमेशा रहता था। अक्सर नीलकंठ तोता और कठफोड़वा टाइप की चिड़िया भी दिखाई दे जाती थी। तरह-तरह की तितलियां फूलों के ऊपर दिखाई देती थी।

उस जमाने में चीजों की क्वालिटी बहुत बेहतरीन होती थी। मैंने एक बिजली का टेबल फैन 1955 में खरीदा था और वह कभी खराब ही नहीं हुआ अभी तक। इधर  दो टेबल फैन खरीदे पिछले पांच  साल में। करीब पूरे के पूरे प्लास्टिक के बने हुए हैं और उनमें से एक खराब हो चुका है। दूसरे का भगवान ही मालिक है।

उसे जमाने में आजकल की तरह ना तो मोबाइल फोन होते थे ना टेलिविजन होते थे। इधर कुछ सालों से देख रहा हूं की क्या बच्चे और क्या बुड्ढे सभी दिनभर अपने खाली समय में मोबाइल फोन में चिपके रहते हैं। उस जमाने में लोगों के पास समय काफी रहता था आपस में गपशप करने का। बच्चे  बाहर खुली हवा में तरह तरह के खेल खेला करते थे जो आजकल के बच्चों को पता भी नहीं है।  7 टाइल्स, आइ स्पाइस, चोर सिपाही , गुल्ली डंडा और भी कई तरह के खेल होते थे। 

वह जमाना दर्जियों का जमाना था क्योंकि रेडीमेड कपड़े होते नहीं थे तब। कपड़े सब कॉटन के होते थे क्योंकि तब पॉलिएस्टर चला ही नहीं था। और कपड़ों को धोने के लिए धोबी होता था घर पर बहुत कम कपड़े धुलते थे । उसे जमाने में डिटर्जेंट पाउडर नहीं था। वाशिंग मशीन का तो सवाल ही नहीं होता।

 हर शहर में कपड़े धोने क्या काम धोबी करता था। धोबी घर पर आता था गधे के ऊपर कपड़ों के गट्ठर लाद के। हमारे पिछली बार के कपड़े धोकर और इस्त्री करके हमें दे जाता था । माताजी कॉपी में चेक करके कपड़े ले लेती थी और फिर गंदे कपड़े उसे देती थी। कपड़े ले जाकर वह नदी के किनारे पटक पटक कर धोता था जिससे पैंट और कमीज के बटन अक्सर टूट जाते थे। 

उसे जमाने में पॉलिएस्टर के कपड़े तो होते ही नहीं थे। कपड़े कॉटन के होते थे और धोबी के हाथ मार खाते थे इसलिए कमीज की कॉलर पहनते पहनते खराब हो जाती थी तो दर्जी की दुकान में जाकर उसको पलट कर सिल दिया जाता था। उसे जमाने में दर्जी की दुकान बहुत ज्यादा थी हर सड़क पर दर्जी की  दुकान दिखाई दे जाती थी। सवा रुपए में कमीज सिलता था सवा तीन रुपया में में पेंट सिलता था और 50 पैसे में पैजामा।

  उसे जमाने में प्लास्टिक के पैकेट में देसी शराब नहीं मिलती थी। गरीब लोग ताड़ी पीते थे जो कि ताड़ के पेड़ से निकलती थी। हमारे घर के पीछे भी एक ताड़ी का पेड़ था जिसमें रोज सुबह सूर्योदय से पहले एक आदमी खसकता खसकता ऊपर जाता था और ताड़ी से भरी हुई मटकी को नीचे ले आता था।

यही ताड़ी गरीबों की शराब थी। दिनभर नदी के किनारे कपड़ों को पीट-पीट के धोने के बाद थका हुआ धोबी घर आता था। खूब ताड़ी पीता था और फिर अपने बीवी बच्चों की जबरदस्त पिटाई करता था। यह रोज का किस्सा था।

आजकल किसी के घर में ताश की गड्डी नहीं दिखाई देती है। उस जमाने में ताश खेलने का बड़ा रिवाज था। हर घर में ताश की गा्ड्डी होती थी और लोग खाली समय में ताश खेला करते थे। ताश के बहुत से खेल होते थे जैसे रमी, कोट पीस, तीन दो पांच, गुलाम चोर इत्यादि

और उस जमाने के बच्चे खाली समय में अक्सर पुराने ताश की गड्डियां से मकान बनाया करते थे। टाइम पास करने के लिए बच्चा के पास बहुत से आइडिया होते थे। दियासिलाई के दो डिब्बे और एक लंबा 30 40 फीट लंबा धागे से  बच्चे टेलीफोन बनाया करते थे और एक दूसरे से बहुत दूर खड़े होकर बात करते थे जो एक दूसरे को साफ सुनाई देती थी। टाइम पास करने के लिए मैग्नीफाइंग लेंस से घास के ढेर में आग लगाना, जूते के खाली डिब्बे में सुराग करके और खुले हिस्से को तेल लगाए हुए ट्रांसलूसेंट कागज से बंद करके पिनहोल कैमरा बनाते थे। और हां पुराने अखबार के कागज की नाव  एरोप्लेन  पिस्टल वगैरह  बनते थे और बरसात में अपनी बनाई  हुई नाव को पानी में तराते थे। 

उसे जमाने में कैलेडिस्कोप बहुत बिकते थे।  आंख से अंदर झांक कर उसको  घुमा घुमा कर कांच की चूड़ियों के टुकड़ों के लाजवाब डिजाइन देखने को मिलते थे। 

उस जमाने में आजकल की तरह मैगी पिज्जा चाऊमीन वगैरा लोकप्रिय नहीं थे। मठरी शकरपाले, अच्छा तले हुए चूड़ा मूंगफली, भुने हुए चने और मुरमुरे सभी घरों में रहते थे। सर पर टोकरी रख के घूमने वाले फेरी वाले गन्ने के गोल-गोल टुकड़े करके उसमें गुलाब जल छिड़क कर घर घर जाकर बेचते थे। यूपी और बिहार में कमल के कच्चे कमलगट्टे खूब बिकते थे। इन्ही कमल गट्टों को आग में भून कर तालमखाना बनाया जाता है।

और भी बहुत कुछ फर्क था उसे बाद में उसकी चर्चा अगले एपिसोड में करेंगे। 

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Tuesday, 4 November 2025

THE MAKING OF KHAL KHAL JI ( DDP gets a new name !! )

I think I was in sixth class when a lanky young man from our ancestral town came to live with us.He had travelled a good distance by  road in the hills of Himalayas and  he arrived at the railway terminus at the foothills to catch a train to our place. There he came across a huge noisy railway steam engine for the first time in his life. There is a story that he was terribly frightened when the big black canadian engine arrived towards him puffing and fuming at the platform !

He travelled a further long distance by train and arrived at our place one fine morning. He was looking for a job and had not passed the tenth class examination (known as High school exam.). Father got him a comfortable job and advised him to clear High School exam. for continued job security and better prospects which he eventually passed after some years. I do not remember if he was married at that time. I remember that for quite sometime he lived a bachelor's life.

I will prefer to refer to this young man here as DDP. This DDP was a very simple, sensible and honest man. He was carefree and happy. children liked him and his light hearted banter. He had a disarming radiant smile and a deep scar under his chin. He had got this scar when he fell down from a kaafal tree in his early teens.

The very day he arrived he teased my little sister thus : "  khale khale jaungi (it means "I will prefer to walk"). And then he kept repeating this whenever he saw her. This continued for a long time and DDP enjoyed the amusement he caused by saying this in his characteristic way.

Now, there is a story behind this "khale khale" banter. It so happened that sometime before DDP's arrival we had visited our ancestral town in the cool hills in the raging summers. This sister was then having massive prickly heat in her legs and hands. So one day when we were walking on our way to visit someone quite a distance away, DDP lifted up the little sister to carry her so that she would not get tired. But the prickly heat spots got rubbed and caused her pain and she cried and said, "khale khale jaungi" (that is, "I will prefer to walk").  The prickly heat persisted and during our entire stay in the ancestral hometown and she said "khale khale jaungi" whenever anyone tried  to carry her in his arms during long walks.

So now DDP mimicked the replay of that "khale khale" and this continued for such a long time that eventually DDP came to be associated with these words. So one day when Katwaroo, our cook, was conveying a message from DDP to my father, who had just come back from office, it went on like this :

katwaroo, " that babu has left  a message for you"

father, " which babu?"

Katwaroo,"That khale khale ji "

The nick name stuck ! As time rolled on, people started calling him khal khal ji ! In due course every one called him thus and never by his real name. Some people never even knew his real name ! And he also started identifying himself with this name ! DDP was transformed into KHAL KHAL JI !

Khal khal ji was a simple man of a friendly, helping nature. He loved eating lots of green chillies with each meal.He loved the company of good natured people. He loved to eat potato cutlets at the sher-e-punjab dhaba (food joint) adjascent to the new Venus cinema complex. He loved long walks in the evening with his friends and I sometimes accompanied him. He loved to wear trousers in Devanand style (Devanand was then a big filmstar of Bombay-Mumbai). And he  loved Suraiya, the famous film actress of his time ! He loved to see all her films ! I remember a friend of my father once suggesting in my presence that money should be contributed by all of them to finance his trip to Bombay to meet Suraiya ! ofcourse it was never done!

How time flies !! That was a long time back . It is quite some time since khal khal ji left this world but I still remember him fondly. He was an essential, happy part of my carefree childhood. In a way he was a friend, philosopher and guide.

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Friday, 31 October 2025

कटी पतंग

@@ कटी पतंग 31 oct 2025

यहां राजेश खन्ना और आशा पारेख की फिल्म की बात नहीं हो रही है । मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर के उस गाने के भी यहां कोई बात नहीं हो रही है जो 1957 की फिल्म भाभी में बहुत लोकप्रिय था (कटी कटी रे पतंग मेरी कट्टी रे)
बात हो रही है पतंग बाजी की क्योंकि अभी हाल में ही जमघट का त्यौहार हुआ था लखनऊ में ।

 यहां सैकड़ो सालों से दिवाली के दूसरे दिन पूरा आसमान रंग बिरंगी पतंग से भर जाता है। यह त्यौहार सिर्फ लखनऊ में ही मनाया जाता है और हर साल दिवाली के ठीक एक दिन बाद। यहां पतंग को कनकौआ भी कहते हैं। 
कभी-कभी यह सोचता हूं कि मनुष्य का दिमाग भी खूब है। एक कागज के टुकड़े को बांस की तीलियों से बांध के एक डोर से हवा में छोड़ दिया जाता है और वह आसमान की गहराइयों तक ऊपर चली जाती है। अच्छे खासे दिमाग वाला आदमी रहा होगा जिसका पहली बार यह कारनामा कर कर दिखाया।
इतिहासकार बताते हैं की पतंग का आविष्कार ईसा पूर्व 500 साल पहले प्राचीन चीन में हुआ था। तब रेशम के कपड़े को बांस की तीलियों से मजबूती देकर रेशम  की मजबूत डोर से उड़ाया जाता था। कागज से बनी पतंग तो कई सौ साल बाद आई।
पुरानी बात है। तब मैं शायद सात साल का था। हमारे घर में एक आदमी काम करने आया करता था। नाम था मलहू। अधेड़ उम्र का था। एक आंख चेचक में बचपन में ही छीन ली थी उसकी। पर पतंग उड़ाने में उस्ताद था। एक बार मैं आसमान में उड़ती हुई पतंग को देख रहा था तो उसने कहा भैया जी आप भी पतंग उड़ा सकते हैं आप पैसे दें तो मैं पतंग धागा मंझा चरखी वगैरा ला सकता हूं। और आपको पतंग उड़ाना सिखा दूंगा। मैंने घर में जिद्द की तो पैसे मिल गए और पतंग उड़ाने का सिलसिला शुरू हो गया।
अब अक्सर काम के बाद मलहू मेरे साथ पतंग उड़ाने लगा। वह पतंग को ऊपर पहुंचा कर और झटका देकर और ढील देकर आसमान में पहुंचा देता और फिर डोर और चरखी (जिसमें पतंग की डोर लपेटी जाती है) मुझे दे देता पकड़ने के लिए।

 तो एक दिन ऐसा हुआ कि उसने मुझे चरखी और डोर पकड़ा दी और किसी के बुलाने पर अंदर चला गया । मैने पतंग को ढील देना शुरू किया और पतंग ऊपर पहुंचने लही। हवा तेज थी तो वह बहुत ही ऊपर चली गई। चरखी खुलती चली गईvऔर पतंग छोटी होती चली गई आसमान में। और अंत में, क्योंकि डोर का आखिरी हिस्सा चरखी में बंधा हुआ नहीं था तो आखिरी डोर भी चली गई आसमान में और मैं खाली चरखी पकड़े हुए कटी पतंग का तमाशा देखता रहा। 
लोगों की पतंग तो दूसरी पतंग वाले काटते हैं मैंने तो अपनी पतंग खुद ही काट दी !!

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Friday, 17 October 2025

हर शाख में उल्लू बैठा है

एक ज़माना था जब नदी के ऊपर पुल बनते थे और सौ साल बाद भी मजबूती से अपना काम करते रहते थे । उस जमाने की बनी सड़कें कई दशक तक खराब नहीं होती थी। आजकल सड़क बनती है और  कुछ महीने बाद गड्ढों से भर जाती है।  पुल बनते हैं और कुछ ही समय बाद टूट जा रहा है। पैसा तो बर्बाद होता है । जान माल का भी नुकसान काफी होता है। आज से पचास साल पहले बने स्कूटर, फ्रिज, पंखे वगैरह आज भी सही चल रहे है। आजकल की बनी चीजें जल्दी खराब हो रहीं हैं।

संसार में बेईमान लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। हर आदमी पैसा कमाने में लगा हुआ है। कुछ सही तरीके से  पैसा कमा रहे हैं और ज्यादातर लोग भ्रष्ट्र तरीका से। बीमारी तेजी से फैल रही है।

कल यू ट्यूब में एक वीडियो देखा। एक आदमी एक छोटी सी आधी भरी बाल्टी में कच्चे हरे केले डालता है। पांच मिनट बाद जब वह उन्हें निकलता है तो वे पीले पके केले हो जाते हैं। यही साफ सुथरे दिखने वाले केले जिनमे कोई काले चित्ती वाले दाग नहीं होते, बाजार में खूब बिकते हैं। इन्हे पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल किया जाता है जो स्वास्थ के लिए बहुत ही हानिकारक है।
ज्यादा साफ चमकीले होने की वजह से इनकी बिक्री भी ज्यादा होती है। ऐसा ज्यादातर फलों और सब्जियों में हो रहा है। 

अभी खबर आई थी की मध्य प्रदेश और राजस्थान में कफ सिरप पीने से बहुत से बच्चों की मौत हो गई है। इस सिरप में कुछ ऐसे केमिकल मिला रखे हैं जो की मशीन की सफाई के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं और जिनको खाने से मनुष्य  के ऊपर घातक प्रभाव होता है। 

ऐसा क्यों है  जब कि फैक्ट्री की जांच करने के बाद ही लाइसेंस दिया जाता है और चेकिंग करने के लिए इंस्पेक्टर भी होते हैं। इस सब के बावजूद भी दवाइयां में जहर मिलाया जा रहा है तो कहीं न कहीं तो  सिस्टम में गड़बड़ अवश्य है , या तो लापरवाही की वजह से या फिर भ्रष्टाचार की वजह से। जांच करने वाली एजेंसी भी सोई हुई सी लगती हैं । 

ऐसा भी होता है कि जब कोई दवाई बेचने वाली कंपनी बहुत ही प्रसिद्ध हो जाती है और उसकी दवाइयां पर जनता का 100% विश्वास हो जाता है तो उसी कंपनी की इस तरह की पैकिंग में नकली दवाइयां बनने लगती है इसी ब्रांड नाम की और इसे उन केमिस्टों के द्वारा बेचा जाता है जो ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए लोगों की जान खतरे में डाल रहे हैं । इनकी भी पकड़ धकड़ की आवश्यकता है। 

एक समस्या यह भी है की अगर किसी को पकड़ा भी गया तो वह न्यायालय में चला जाता है और बेल पर बाहर निकाल जाता  है वकील की मदद से। फिर सालों साल तक मुकदमा चलता रहता है  और वह बाहर अपना काम करता रहता है। इस तरह के मुकद्दमों के लिए तो fast track courts होने चाहिए जो बहुत जल्दी रोजाना इस पर सुनवाई करें और अपराध सिद्ध होने पर दोषी व्यक्तियों को homicide ke अपराध की कड़ी सज़ा दें।

और भी बहत कुछ हो रहा है। ग्वाले गाय भैंस को ऑक्सीटॉसिन नाम के केमिकल के इंजेक्शन लगाते रहते है रोजाना और फिर यह केमिकल हमारे पीने वाले दूध में आ जाता है जिससे स्वस्थ को नुकसान होता है। खाने पीने के सामान में केमिकल्स मिलाए जा रहे हैं मुनाफे के लिए।
घरों में मीटर लगे हैं पर कुछ लाइनमैन सीधे खंबे से बिना मीटर के लाइन देकर लोगों को मुफ्त की बिजली बांटते हैं और पैसे कमाते हैं। दफ्तरों में कुछ भ्रष्ट लोग फाइलें दबा कर बैठ जाया करते हैं  जब तक उनकी चाय पानी का इंतजाम न हो जाए। ऐसा भी सुनने मैं आता है कि सरकार जो पैसे गरीबों की मदद के लिए देती है उसका बड़ा हिस्सा पैसे बाटने के टाइम पर हड़प कर लेते हैं बिचौलिए।

उदाहरण देते रहने का अंत आसानी से नहीं होगा इतना व्यापक होता जा रहा है भ्रष्टाचार । यही देश की प्रगति मैं बाधा बनता जा रहा है। ऐसा ही चलता रहा तो देश का क्या होगा?

किसी ने कहा भी है की

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है, हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा ?

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मिठाइयों का देश भारत

 देश मिठाइयों का

भारत में एक रिवाज है कि जब भी कोई खुशी का मौका होता है तो मिठाई खाई जाती है। आपने सुना होगा अगर किसी का लड़का कोई बढ़िया नौकरी में लग गया या घर में शुभ कार्य हुआ,  शादी  का रिश्ता तय हुआ हो वगैरह  लोग कहते हैं "भाई साहब मुंह तो मीठा कराइए"।

सभी त्योहारों में ढेर सारी मिठाइयां खाई जाती है। होली की गुजिया तो पूरे देश में प्रसिद्ध है।

भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों की अपनी खास मिठाइयां  है। इनमें से बहुत सी तो पूरे देश में लोकप्रिय हो चुकी है जैसे बंगाल का रसगुल्ला और राजस्थान की सोन पापड़ी या फिर लखनऊ की गजक।

पहले बात करें बंगाल  की। यहां ज्यादातर मिठाइयां पनीर (छेना) की होती है। शायद यह इसलिए होता होगा कि यहां पर ठंड बहुत कम होती थी जाड़ों में भी और गर्मियों में तो मौसम काफी गर्मी का रहता था । तो हो सकता था कि अक्सर दूध बच जाया करता हो और फिर किसी ने बचे हुए दूध को फाड़ कर इससे छेने की मिठाइयां बनाने का कार्यक्रम शुरू किया हो। जो भी हो यहां की मिठाइयां तो जगत प्रसिद्ध है। ताजे पनीर की दो मिठाइयां बहुत मशहूर है बंगाल की । एक है संदेश और दूसरा है रसगुल्ला।
  रसगुल्ला तो पूरे भारत में लोकप्रिय हो गया। एक जमाने में केसी दास का कोलकाता का रसगुल्ला बहुत प्रसिद्ध था और यह नीले रंग के टीन के बन्द डिब्बे में पूरे भारत में बेचा जाता था। जब मैं छोटा बच्चा था तो अक्सर हमारे पिताजी जब भी कोलकाता जाते थे  दफ्तर के काम से तो वहां से के सी दास के रसगुल्ले के एक, दो टीन  जरूर लेकर आते थे।

अब आते है उत्तर प्रदेश । 1950 के दशक में बनारस का केसर वाला पीला पेड़ा बहुत मशहूर था जो बिल्कुल सूखा होता है और खोआ और केसर का बनता था। उन दिनों बनारसी मिठाई बहुत प्रसिद्ध हुआ करती थी । इनको ताड़ के पेड़ के पत्तों से बने सुंदर डिब्बे मैं रखकर बेचा जाता था।
 छेने की रस में डूबी मिठाइयां भी बनारस मे बनाई जाती थी जैसे चमचम। बनारस की मिठाइयों की लोकप्रियता तब कम पड़ गई जब लखनऊ में पहली बार 50 के दशक के शुरू में चौधरी स्वीट हाउस का आगमन हुआ।

 चौधरी स्वीट हाउस की मिठाइयां बहुत जल्दी ही पूरे उत्तरी भारत में लोकप्रिय हो गई । चौधरी स्वीट हाउस की ज्यादा बिकने वाली मिठाई थीं मूंग का हलवा, मलाई गिलोरी, कलाकंद, काजू की कतली वगैरह।  चौधरी स्वीट हाउस ने पैकेट बंद दालमोंठ बेचना भी शुरू कर दिया जो आसानी से  दूर दराज ले जाया सकता था। उत्तर प्रदेश में  मिठाइयां बहुत प्रकार की हैं जैसे बालूशाही , काजू की बर्फी , गुलाब जामुन , रस मलाई, मलाई पान गिलोरी , पेड़ा , बालूशाही, बूंदी के लड्डू, रबड़ी वगैरह।

अल्मोड़ा जो पहले उत्तर प्रदेश का पहाड़ी हिस्सा था और जो अब उत्तराखंड राज्य में है वहां की दो मिठाइयां बहुत लोकप्रिय हैं, खासकर पहाड़ के लोगों में और पहाड़ के जो लोग भारत के अन्य भागों में रहते हैं। यह हैं  बाल मिठाई और सिंगोड़ी। सिंगोड़ी बनती है नारियल और खोआ से । उसे मालू की पत्ती में लपेट कर रखा जाता है जिसकी खुशबू इसकी खासियत है। बाल मिठाई भुने वह चॉकलेटी रंग के खोए की बनती है, चीनी की छोटी-छोटी गोलियां में लिपटी हुई। 

एक समय में  दिल्ली का घंटाघर का सोहन हलवा बहुत मशहूर था। तब यह शुद्ध देसी घी  से बनता था और उसमें मेवे भरे होते थे । उसकी बिक्री बहुत होती थी। बाद में वनस्पति घी से यह बनने लगा और  स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने लगा।

दक्षिण में चले तो वहां की मिठाइयों की बहुत ज्यादा वैरायटी उत्तरी भारत में लोकप्रिय नहीं है। हां दक्षिण भारत का मैसूर पाक काफी मशहूर है जो दाल और शुद्ध देसी घी से बनता है और काफी स्वादिष्ट होता है।

अब रही बात मिठाई खाने की। बचपन में तो मिठाइयां खाना  ठीक है पर युवा अवस्था में मिठाई पर कंट्रोल करना जरूरी है क्योंकि बचपन बीतने के बाद हम उतनी उछल कूद नहीं कर पता है जितना बच्चे करते हैं खेलकूद में। और 40 की उम्र के बाद तो मिठाइयों पर काफी कंट्रोल हो जाना चाहिए नहीं तो ब्लड शुगर बढ़ने लगती है और डायबिटीज की बीमारी की समस्या आ सकती है । कुछ लोग इस गलतफहमी में रहते हैं की शुगर फ्री मिठाइयां खाने से कोई नुकसान नहीं होता पर इनमें जो केमिकल्स होते है वह शरीर के लिए बहुत ही हानिकारक है और उससे कई बीमारियां हो सकती है। 

एक बात और है। मिठाई बनाते वक्त यदि खंडसारी चीनी या गुड का उपयोग किया जाए तो ज्यादा अच्छा होगा क्योंकि सफेद रिफाइंड चीनी तो एक उम्र के बाद शरीर के लिए जहर का काम करती है। इस हिसाब से सबसे सुरक्षित मिठाई शायद लखनऊ की गजक है जो पुरानी अच्छी दुकानों में अभी भी शुद्ध गुड़ और शुद्ध  सफेद तिल से बनती है। 

दिवाली आ रही है और घर में कुछ मिठाइयां आने लगी है। सुबह रेफ्रिजरेटर खोला तो सामने काजू की कतली रखी हुई है। अपने को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा हूं देखता हूं कब तक सफल रहता हूं।

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Tuesday, 16 September 2025

इतिहास का वह दिन, वह स्थान

 इतिहास का वह दिन, वह स्थान।

*   स्थान था नैनीताल । दिन था 18 सितंबर 1880 । समय था दिन के करीब ढाई बजे। 

पिछले दो दिनों से नैनीताल में लगातार मूसलाधार पानी बरस रहा था।  16 सितंबर से 18 सितंबर 1880 के बीच 900 मिलीमीटर से भी ज्यादा पानी बरस चुका था। अचानक  नैनीताल के उत्तरी पूर्वी भाग में अल्मा पहाड़ी का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूट गया और भरभरा के नीचे आ गिरा।  जब पहाड़ का हिस्सा खसक कर नीचे आया तो वह पूरी जगह पहाड़ी के नीचे दब गई और एक भयानक दुर्घटना घट गई जिसमें उस समय के रिकॉर्ड्स के हिसाब से 43 अंग्रेज और  108 हिंदुस्तानी दबाकर मर गए।
इस भयानक दुर्घटना मे नैनीताल का प्रसिद्ध नैना देवी मंदिर भी नष्ट हो गया। 1880 तक यह मंदिर वहां हुआ करता था जहां आजकल बोट हाउस क्लब है । इस दुर्घटना के बाद नैना देवी के मंदिर को पुनः निर्मित किया गया और वह नैनीताल झील उस ओर चला गया जहां वह आज है।

इस दुर्घटना का मलबा हटाने के बाद वहां एक बड़ी समतल मैदान बन गई जहां पहले  पहाड़ी ढलान पर कुछ बंगले थे।वही आजकल का फ्लैट्स का बड़ा मैदान है ।


*   स्थान था अलाबामा स्टेट का मोंटगुमरी शहर। दिन था 1 दिसंबर 1955। समय था शाम के पांच बजे। 

रोज पार्क नाम की एक लड़की , जो अश्वेत थी (यानि यूरोपियन नस्ल की नहीं थी) अपने घर जानें के लिए एक बस में अश्वेत लोगों वाली एक सीट पर जा बैठी । 

उस दौरान अमेरिका में रंगभेद नीति का कानून था और आगे की सीटों पर अंग्रेज लोग ही बैठ सकते थे। बस के कुछ दूर चलने के बाद कुछ और अंग्रेज बस पर चढ़े और क्योंकि उनके बैठने की सभी सीटे भर गई थी तो ड्राइवर ने अश्वेत लोगों से कहा कि अपनी एक पूरी पंक्ति खाली करके पीछे खड़े हो जाए ताकि वहां पर गोरी चमड़ी वाले अंग्रेज बैठ सके।  वहां से सभी काले लोग उठकर पीछे चले गए पर रोजा पार्क वहां बैठी रही और उसने अपनी सीट खाली करने से इनकार कर दिया। इसके बाद ड्राइवर ने फोन कर के पुलिस को सूचना दी और फिर रोजा पार्क गिरफ्तार हो गई और यहां से शुरू हुआ अश्वेत लोगों का रंगभेद नीति के खिलाफ अभियान और रोजा पार्क "द मदर ऑफ़ द फ्रीडम मूवमंट" के नाम से मशहूर हो गई।

इस तरह से इस  दिन एक नए आंदोलन की शुरुआत हुई अश्वेत लोगों के लिए बनाए गए कानूनों के खिलाफ।


*   स्थान था ऑस्ट्रेलिया का पूर्वी तट जहां आजकल सिडनी शहर है। दिन था 19 अप्रैल 1770 ।

 जेम्स कुक अपनी समुद्री खोज यात्रा में ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर आने वाला पहला यूरोपीय बन गया। और उसमें इसे ब्रिटेन के साम्राज्य का एक उपनिवेश घोषित किया।  


18 वीं सदी में ब्रिटेन में अपराधियों की बढ़ती संख्या और गंभीर अपराध के दोषी पाए जाने वाले लोगों के लिए एक नई व्यवस्था शुरू की गई। यह निर्णय लिया गया कि एक जहाजी बेड़े द्वारा उन्हें ब्रिटेन से बहुत दूर ऑस्ट्रेलिया  महाद्वीप में भेज दिया जाय जहां अपनी सजा काटने के बाद वे स्वतंत्र हो जाए और वही बस जाएं हमेशा के लिए।

1788 में प्रथम समुद्री बेड़े ने ऑस्ट्रेलिया में  पोर्ट जैक्सन (वर्तमान सिडनी) में एक बस्ती स्थापित की, जिसमें ब्रिटेन से भेजे गए लगभग 778 अपराधी शामिल थे. यह ब्रिटेन से गंभीर अपराधियों को निकालने की एक शुरुआत थी जिसकी तहत 1788 से 1868 के बीच, ब्रिटेन से लगभग 162,000 से अधिक दोषियों को ऑस्ट्रेलिया भेजा गया था, जो ब्रिटेन और आयरलैंड में किए गए अपराधों के दोषी थे।

ब्रिटेन के इन अपराधियों ने सजा पूरी होने के बाद ऑस्ट्रेलिया में ही अपना व्यवसाय और अपनी खेती शुरू की और और जब पता चला की ऑस्ट्रेलिया में सोने की बहुत सी खान है तो ब्रिटिश से और भी नागरिक ऑस्ट्रेलिया पहुंचने लगे और धीरे-धीरे पूरे ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटेन का आधिपत्य हो गया।


* दिन 9 जनवरी 1915 । स्थान बम्बई (आजकल का मुंबई) का अपोलो बंदरगाह।  एक समुद्री जहाज  दक्षिणी अफ्रीका से भारत पहुंचा। उस जहाज से उतर कर धोती में लिपटे एक आदमी ने भारत में कदम रखा । इस आदमी का नाम था मोहन दास करमचंद गांधी

मोहन दास करमचंद गांधी   ने  एक नए हथियार से ब्रिटिश साम्राज्य की नीतियों का मुकाबला किया । वह हाथियार  था "सविनय अवज्ञा" (civil disobedience) यानी किसी ऐसे अन्यायपूर्ण कानून या आदेश का अहिंसक विरोध करना जो व्यक्ति की न्याय की भावना के साथ मेल नहीं खाता, और इसके लिए दंड स्वीकार करने के लिए तैयार रहना.।

इसके साथ ही भारत के इतिहास पर एक नए युग का प्रारंभ हुआ जिसका अंत भारत की आजादी के साथ हुआ। 
मोहन दास करमचंद गांधी आगे चल कर महात्मा गांधी के नाम से जगत विख्यात हो गये , भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सुपरस्टार बनकर।

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Sunday, 14 September 2025

हरचरण की शादी

हरचरण की शादी 

हर चरण का बचपन काफी नीरस सा बीता था क्योंकि उसके पिता साधन संपन्न नहीं थे। फिर जब उसकी अपनी नौकरी लग गई एक कॉलेज में और उसे हर महीने एक अच्छी तनख्वाह मिलने लगी तो उसके मन में शादी का विचार आया। पर शादी के लिए कहीं से कोई भी संदेश न उसके पास आया और न उसके पिता के पास। 

इस बीच उसका ट्रांसफर नैनीताल के एक कॉलेज में हो गया।

वह बड़ा कॉलेज था और उसमें विभिन्न विभागों के बहुत से शिक्षक भी काम करते थे। महिलाएं भी और पुरुष भी।

कॉलेज की एक टीचर महिला का नाम सुधा था । वह उसी की तरह लखनऊ की ही थी और हरचरण की जाति बिरादरी की भी।  इन दोनों में धीरे-धीरे एक दूसरे के प्रति थोड़ा लगाव सा हो गया । सुधा के मन में यह विचार कभी नहीं आया कि वह हरचरण से शादी करेगी। पर हरचरण के मन में उससे शादी करने के लिए विचार आ गया । सुधा उसकी अपनी बिरादरी की ही थी और लखनऊ की भी। साथ ही वह भी टीचर थी और इस तरह  खुद अच्छे पैसे भी कमाती थी। उसके लिए सुधा से अच्छी कोई लड़की नहीं हो सकती थीं। उसने कई बार शादी का प्रस्ताव रक्खा पर सुधा ने हर बार यही कहा की हम सिर्फ एक अच्छे दोस्त हैं। 

और फिर अचानक एक दिन सुधा का ट्रांसफर नैनीताल से लखनऊ हो गया। 

जब वह तल्लीताल से काठगोदाम जाने के लिए बस में बैठी थीं  तभी अचानक दौड़ता हांफता हरचरण वहां पहुंच गया और उसके हाथ में एक लिफाफा पकड़ा गया। वह कुछ कहने ही वाला था  कि ड्राइवर अपनी सीट पर आकर बैठ गया और उसके ब्रेक हटाकर गाड़ी को चलाना शुरु कर दिया।

धीरे-धीरे बस पोस्ट ऑफिस के पास दाहिने मुड़ने के बाद तल्लीताल के नीचे वाली बाजार से होती हुई चीलचक्कर की तरफ बढ़ती गई। चीलचक्कर के पास बाईं  ओर दूर-दूर तक एक लाइन के पीछे दूसरी लाइन में अनेकों पहाड़ दिखाई देती थीं और नीचे घाटी में तेज हवाएं चल रही थी । सुधा को  हरचरण का दिया हुआ लिफाफा याद आ गया। उसने लिफाफा खोला। उसके अंदर गुलाब के फूल की पंखुड़ियां थी और एक कागज में लाल इंक  से लिखा हुआ था," सुधा मैं तुमसे प्यार करता हूं और करता ही रहूंगा। तुम मुझे विवाह के लिए राजी हो जाओ।"

 झुझला कर सुधा ने उस कागज और लिफाफे को बस की खिड़की से बाहर फेंक दिया और कागज और गुलाब की पंखुड़ियां हवा में तैरती हुई नीचे घाटी में विलीन हो गई।

इधर सुधा के माता-पिता भी उससे शादी के लिए दबाव डाल रहे थे और उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि किसी अजनबी से वह कैसे शादी कर सकती है जबकि उसे अपने करियर में ज्यादा रुचि थी। फिर बहुत सोच समझने के बाद उसे महसूस हुआ कि हर चरण जैसे सीधे-साधे इंसान के साथ शादी कर लेना ही सही होगा। 

जब हरचरण को यह पता चला तो उसने ईश्वर को   धन्यवाद दिया और शादी की तैयारी शुरू कर दी । उसके पिताजी, जो कचहरी के एक रिटायर्ड बाबू थे,  इस रिश्ते से बहुत प्रसन्न थे।

हरचरण के माता-पिता लखनऊ की लाल कुआं कॉलोनी के पास रहते थे। उनके मकान के आगे एक बहुत बड़ा मैदान था जिसके बीच में से एक सड़क उनके मकान को आती थी। लड़की के माता-पिता महानगर कॉलोनी में रहते थे।

क्योंकि मैं हरचरण को बहुत दिनों से जानता था तो स्वाभाविक था की हरचरण अपनी शादी में सम्मिलित होने का और शादी के काम में मदद करने का निमंत्रण देता और वही हुआ। एक दिन हरचरन मेरे पास आया और शरमाते हुए बोला "भाई जी मैं शादी कर रहा हूं " मैंने कहा "किससे शादी कर रहे हो " तो बोला एक लड़की से । मुझे बड़ी हंसी आई और मैंने कहा "भाई कौन है जो तुम्हारी पत्नी बनने वाली है।" तब उसके बताया कि उसकी शादी सुधा से होने वाली है जो महानगर के बद्री प्रसाद जी की पुत्री है।  

मैं बद्री प्रसाद जी को तो मैं अच्छी तरह जानता था। वह लखनऊ के सेक्रेटेरिएट के एक पुराने बाबू थे । वह मेरे पिताजी के परिचित भी थे और उनका हमारे यहां आना भी जाना रहता था।

जब हरचरण ने मुझसे कहा की आपको भी कुछ काम करना होगा शादी का इंतजाम मैं तो मैंने उसे बता दिया की कुछ दिन पहले ही बद्री प्रसाद जी ने शादी के दौरान  शादी का  कुछ इंतजाम संभालने को मुझसे कह दिया था।

खैर जो भी हो शादी की तैयारी शुरू हो गई। हरचरण ने महानगर कॉलोनी तक बारात में जाने के लिए एक चटक लाल रंग की छोटी सी और खुली मोटर कार किराए पर ले ली और बैंड बाजे वालों का भी इंतजार कर लिया था। 

और फिर लाल कुआं कॉलोनी से हरचरण की बारात बैंड बाजे वालों के साथ चल पड़ी। आगे  एक बड़ी बस में बाराती भरे हुए थे , बैंड बाजे वाले भी लाल रंग की ड्रेस में साथ थे। पीछे लाल रंग की मोटर में हरचरन ।

इधर महानगर में बद्री प्रसाद जी के मकान में सभी लोगों के साथ मैं भी बारात  का इंतजार कर रहा था। 

शादी का मुहूर्त नजदीक आ रहा था पर बारात का कहीं अता-पता नहीं दिखाई दे रहा था । बैंड बाजे वालों की आवाज भी नही सुनाई दे रही थी। बद्री प्रसाद जी ने मुझसे कहा बेटा जरा जाकर देखो तो बारात कहां  है। 

फिर मैं अपने स्कूटर में रवाना हुआ लाल कुआं की तरफ।
निशातगंज के जरा आगे गोमती के पुल के पास बारातियों से भरी बस खडी थी। मैने जब पता किया तो मालूम हुआ कि हरचरण की लाल मोटर न जाने कहां पीछे रह गई है।

मैं स्कूटर से फिर आगे बढ़ा, लापता दूल्हे की तलाश में।
नरही के पास ही इनकम टॅक्स ऑफिस बिल्डिंग के सामने सड़क पर हरचरण की लाल मोटर खड़ी थी। आगे का बोनेट खुला हुआ था और ड्राइवर उसके अंदर घुसा हुआ था।
मैने स्कूटर रोक कर पूछा कि क्या हुआ तो हरचरण बौखला कर बोला की इस ड्राइवर के बच्चे ने सारे प्रोग्राम का कबाड़ा कर दिया है। ड्राइवर बहुत परेशान लग रहा था और अपने काम में जुटा हुआ था। हरचरण गुस्से मैं था और ड्राइवर को जली कटी सुना रहा था।

खैर कोई पंद्रह बीस मिनट बाद हरचरण की लाल मोटर ठीक हो गईं और मोटर के पीछे मै भी वापस महानगर की ओर चल पड़ा। अब आगे आगे लाल मोटर और पीछे बस चल पड़ी। निशात गंज की बाजार पार करने के बाद बस में से बैंड बाजे और पेट्रोमैक्स रोशनी वाले नीचे उतरे बारातियों के साथ और फिर धूम धड़ाके के साथ बारात का काफिला चल पड़ा।

मैने स्कूटर स्टार्ट किया और आगे जाकर लड़की वालो को बारात की सूचना दे दी।

खैर, विवाह संपन्न हुआ । सब लोगों ने खाना खाया। लाल मोटर के ड्राइवर ने भी खाना खाया पर वह बहुत परेशान लग रहा था। 

फिर रात बीती और सुबह हुई। दुल्हन की विदाई का समय आ गया तो लाल मोटर और उसके ड्राइवर की याद आई।

पर लाल मोटर और ड्राइवर गायब थे। दूर दूर तक तलाश करने के बाद लाल मोटर के गैरेज में फोन किया। दुकान के मुंशी ने बताया कि ड्राइवर का कोई पता नहीं है। वह मोटर लौटा कर चला गया था रात में।

अब समस्या थी दुल्हन को वापस ले जाने की। कई टैक्सी वालों से पूछा पर कोई भी तैयार नहीं हुआ। हरचरण के रिटायर्ड पिता काफी समय बाद एक काले पीले पुराने जमाने के टेंपो को कहीं से ले आए जो पीछे से ढेर सारा काला धुआं छोड़ रहा था।

पहले तो हरचरण उस टेंपो में जाने के लिए राजी ही नहीं हुआ। पर सब लोगों के समझाने पर अपनी दुल्हन समेत टेंपो के अंदर जा बैठा। काला धुंआ छोड़ते हुए टेंपो चल पड़ा। 

मेरा स्कूटर भी उसके पीछे चल पड़ा।

क्योंकि टेंपो अपनी मस्तानी चाल चल रहा था धुंए के गुब्बार में इसलिए  मैं काफी पहले तेज स्पीड में लालकुआ के पास हरचरण के मकान में पहुंच गया। दुल्हन का स्वागत करने के लिए सभी बाहर आकर सामने मैदान से आती हुई सड़क की तरफ देखने लगे।

अचानक एक बड़े misfire धमाके के साथ वह काला भद्दा टेंपो मैदान के दूसरे छोर से दाखिल हुआ। थोड़ा आगे बढ़ने पर एक और misfire धमाका हुआ और फिर टेंपो के आगे का पहिया टूट गर गिर पड़ा और टेंपो के चारों तरफ काला धुंआ फैल गया।

पर उस धुंए के बादल को चीर कर हरचरण नई दुल्हन के साथ निकला।

स्वागत की रस्में पूरी हुईं । फिर जलपान का दौर चला। मैं भी एक कोने मैं खड़ा होकर छोले भटूरे खा रहा था कि अचानक हरचरण मेरे पास आ गया। उसकी आंखों में आंसू थे। भर्राई हुई आवाज में बोला, " भाई जी, शादी मैं कुछ मजा नही आया।

मैने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, " मेरे भाई दुखी मत हो। बड़ी बात यह है कि तुम्हारी शादी हो गई है अपनी पसंद की लड़की के साथ। "

बगल मैं मेरे परिचित सरदार जसवंत सिंह जी भी छोले भटूरे चबा रहे थे। उन्होंने मेरी बात सुनी तो भटूरे भरे मुंह से बोल पड़े , " त्वाडी गल चंगी है। हरचरण दी शादी सुधा नाल हुई है, टेंपो नाल नही।" फिर अपने ही जोक पर हंसते हुए भटूरा चबाने लगे।

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रेलगाड़ी रेलगाड़ी छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक

रेल गाड़ी रेलगाड़ी छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक 


हो सकता है कि यह गाना आपने सुना हो। इस गाने को 1968 की फिल्म आशीर्वाद में अशोक कुमार के ऊपर फिल्माया गया है। इस दृश्य में अशोक कुमार रेल के इंजन है और पीछे-पीछे छोटे-छोटे बच्चों की एक लंबी कतार रेल के डिब्बे हैं।

रेलगाड़ी हमेशा से ही बच्चों के लिए एक अद्भुत चीज रही है एक आगे काला इंजन खूब धुंवा छोड़ता हुआ और बड़े बड़े पहिए घुमाता हुआ पीछे लगे डेढ़ दर्जन डिब्बा को खींचता हुआ जिस तरह आगे बढ़ता है वह देखने में बहुत दिलचस्प लगता है।

लंबी दूरी की यात्राओं के लिए रेलगाड़ी का बहुत महत्व है जिससे काफी तेजी से सफर करना संभव हो सका। पर एक समय ऐसा भी था जब रेलगाड़ी नहीं होती थी और उस समय लंबी दूरी की यात्रा करने में कितनी परेशानी होती थी यह आजकल के लोगों की कल्पना के बाहर है।

 19वी सदी में लिखी गई पुस्तकों से पता चलता है कि  साधन संपन्न अंग्रेज किस तरह से कोलकाता से दिल्ली या शिमला की यात्रा  करते थे। घोड़े पर बैलगाड़ी पर या फिर पालकी पर यात्रा होती थी। पालकी को चलाने वाले चार मजदूर या फिर घोड़े की यात्रा करने पर एक घोड़ा या फिर बैलगाड़ी की यात्रा करने पर दो बैलों को कुछ कुछ मील की दूरी पर बदलाना जरूरी हो जाता था ताकि  थके हुए प्राणियों की जगह तरो ताज प्राणी आ जाएं और आगे का सफर संभव हो। इसके लिए बहुत इंतजाम करना पड़ता था । आम आदमी को कोई भी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। एक शहर से नजदीकी दूसरे शहर जाने में कई दिन लग जाते थे और कोलकाता से दिल्ली की यात्रा में तो कई सप्ताह लगते थे।

फिर रेलगाड़ी आ गई ।

रेलवे इंजन का आविष्कार करने का श्रेय आम तौर पर जेम्स वाट को जाता है जिन्होंने लंबे समय तक चलने वाले भाप के इंजन का आविष्कार किया। पर इसका रेलगाड़ी में इस्तेमाल करने का श्रेय जाता है रिचर्ड थ्रेवेथिक को जब  21 फरवरी 1804 में  व्यवहारिक रेलवे इंजन से पहली रेलगाड़ी ब्रिटेन में  कुछ दूरी तक चली।

भारत में पहली रेलगाड़ी बॉम्बे (मुंबई) से थाणे तक 16 अप्रैल सन 1853 को चली और इसके साथ ही भारत में रेलवे का इतिहास शुरू होता है। 1857 की क्रांति के बाद 
ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से सत्ता का परिवर्तन ब्रिटिश सरकार को हो गया । इसके बाद तो पूरे देश पर रेलवे लाइन का जाल बिछने लगा और भारत की आजादी तक देश के काफी हिस्सों को रेलवे लाइन से जोड़ दिया गया। रेलगाड़ी के चलने के लिए तीन तरह के  ट्रैक यदि रेल की पटरी का इस्तेमाल किया गया जिनको नैरो गेज , मीटर गेज और ब्रॉड गेज कहा जाता है। सबसे चौड़ी रेलवे पटरी ब्रॉड गेज में होती है और सबसे कम चौड़ी नैरो गेज मेंआजकल आम तौर  पर ब्रॉड गेज पटरी ही होती हैं।

अभी भी भारत के कुछ  महत्वपूर्ण शहरों में रेलगाड़िया नहीं पहुंच पाई है खासकर पहाड़ी क्षेत्र में । पर रेलवे मंत्रालय इस बारे में बहुत प्रयास कर रहा है। कुछ ही समय पहले (सितंबर 2025 में) उत्तर पूर्व पहाड़ियों में मिजोरम की राजधानी आइजॉल के बिल्कुल नजदीक के शहर तक रेल की पटरिया पहुंच गई है। कई दशक पहले तक अगर आपको कोलकाता से मिजोरमजदा होहाड़ी तो पहले कोलकाता स  असम के सिलचर शहर पर हवाई जहाज से ज्यादा होता था फिरबहार सेक्षे सड़क यात्राहोतीथी। अब रेलगाड़ी तो भेजो रामक राजधानीमें के बिल्कुल टिकट तक पहुंच चुकी है वहां पर हवाई अड्डा भरे बहुत ही नजदीक के शहर में बज गया है।

रेलवे लाइन बिछानेम काफी मुश्किल आती है । बड़ा मुश्किल होता है बड़े-बड़े पुल बनाने । और सुरंग भी बनानी पड़ती है पहाड़ों के अंदर।

जहां तक छुक छुक छुक छुक का सवाल है अब समय बदल चुका है। अब भाप से चलने वाले वह बड़े-बड़े रेलवे इंजन जा चुके हैं जो छुक छुक छुक छुक वाली रेलगाड़ियां चलाते थे। अब रेलवे की प्रगति के साथ डीजल के इंजन और बिजली के इंजन प्रयोग में करीब करीब सभी जगह इस्तेमाल हो रहे हैं और रेलगाड़ी का पुराना छुक छुक वाला समय बीत चुका है। 

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Saturday, 13 September 2025

मनुष्य के अस्तित्व पर संकट

21वीं सदी के आते-आते बहुत कुछ ऐसा होने लगा है जिससे लगता है की विश्व का भविष्य खतरे में है। 

प्राचीन काल मैं उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के मध्य में, जहां आजकल ग्वाटेमाला और मेक्सिको इत्यादि है , एक समय में माया नाम की सभ्यता हुआ करती थी जिसे यूरोप के स्पेन के  आक्रमण  ने नष्ट कर दिया था।

 माया एक बहुत ही विकसित पुरानी सभ्यता थी जो 2000 ईसवी पूर्व के समय से ही चली आ रही थी।

स्पेन के आक्रमण के बाद माया सभ्यता लुप्त हो गई। 

इस माया सभ्यता ने यह बहुत सदियों पहले ही भविष्यवाणी की थी कि सन 2012 में पृथ्वी की मानव सभ्यता का अंत हो जाएगा । इस भविष्यवाणी से 2021 की सदी के प्रारंभ में  इस बात की घबराहट होने लगी कि कहीं यह बात सच तो नहीं हो जाएगी।

जब वर्ष 2012 आया और आकर चला गया तो लोगो ने चैन की सांस की ।

पर अब ऐसा लगने लगा है कि जिस तरह से पूरे विश्व में हालात बदल रहे हैं उसे देखते हुए मनुष्य का भविष्य निश्चित रूप से संकट में है। क्योंकि मनुष्य की वर्तमान सभ्यता पर 21वीं सदी में कई ओर से हमला हो रहा है।

पहला हमला है क्लाइमेट चेंज से होने वाली समस्याओं का। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में विशाल बर्फ की चट्टानें पिघल रही हैं और समुद्र का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे समुद्र तट पर स्थापित कई बड़े शहरों के समुद्र में डूबने का समय नजदीक आता जा रहा है। मिसाल के तौर पर इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता शहर का एक हिस्सा समुद्र में चला गया है और बाकी शहर भी कुछ ही वर्षों में समुद्र के अंदर चला जाएगा।

पढ़िए इस विषय में विकिपीडिया क्या कहता है :

"यह सच है कि इंडोनेशिया का जकार्ता शहर समुद्र में डूब रहा है क्योंकि यह तेजी से ज़मीन में धंस रहा है और बढ़ते समुद्री स्तर के कारण बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। इस समस्या के कारण 2050 तक उत्तरी जकार्ता का बड़ा हिस्सा जलमग्न हो सकता है। "

 दूसरी तरफ ठंडी जलवायु वाले पृथ्वी के देशों में अचानक बहुत गर्मी पड़ने लगी है, खासकर यूरोप में। और इधर कुछ सालों से इस तरह की बारिश भी हो रही है जैसा पहले शायद ही कभी हुईं हो और इसके कारण बहुत तबाही हो रही है । बहुत से गांव बाढ़ में बहकर गायब हो जा रहे हैं और बहुत से बड़े-बड़े पहाड़ टूटकर विनाश के कारण साबित हो रहे हैं।

एक और परेशानी सामने आ रही है। यह तो पता है सबको कि पृथ्वी में जमीन की सतह से कुछ नीच पानी का विशाल भंडार है। जब पानी के हैंड पंप का आविष्कार हुआ तो एक पाइप जमीन के नीचे डालकर पंप से पानी खींचकर ऊपर निकलना शुरू हो गया। जब शहरों का विकास हुआ तब जो शहर नदी के किनारे नहीं थे वहां पर इसी तरह के हेड पंप लगाकर पानी निकाला जाता था रोज-रोज की आवश्यकताओं के लिए। 

फिर बिजली के बड़े-बड़े पंप आ गए विज्ञान की प्रगति के साथ। अब यह संभव हो गया की बहुत ही अधिक मात्रा में बहुत ही कम समय में पानी बाहर निकाला जा सकता था और मनुष्य ने यह काम शुरू कर दिया जोर-जोर से। फिर तो खेतों में भी पानी देने के लिए बड़ी मात्रा में जमीन के नीचे से पानी निकालने का कब शुरू हुआ। नतीजा यह हुआ की धीरे-धीरे जमीन के नीचे के इस पानी की सतह का नीचे जाना शुरू हो गया। पृथ्वी का ऊपरी जमीनी भाग क्योंकि इसी पानी पर टिका हुआ है तो इससे जमीन भी नीचे को धसते लगी जिसे अंग्रेजी में subsidence of land कहते हैं। इसे और ज्यादा गति इस बात से मिली कि बड़े-बड़े शहरों में जमीन के ऊपर बहुत ऊंची ऊंची इमारत का निर्माण होना शुरू हो गया जिससे पृथ्वी की सतह पर बहुत ही अधिक भार होने लगा। इससे पृथ्वी के नीचे को धसाने का काम तेजी से बढ़ने लगा। इसका असर न केवल जकार्ता शहर पर पड़ा बल्कि और  बड़े-बड़े शहरों पर भी पड़ा जो समुद्र के किनारे स्थित है जैसे कैलिफोर्निया का सैन फ्रांसिस्को शहर और भारत का मुंबई शहर। 

यह अकेली मुसीबत नहीं है। अब सभी देशों में चाहे वह देश की जनता हो, चाहे वह देश का नेतृत्व करने वाले नेता हो, मनःस्थिति खराब हो चली है। रूस के पुतिन हो या अमेरिका के ट्रंप हो या कोरिया और इजरायल के नेता हों या और कोई देशों के नेता हो , सभी संयम से काम लेने के बजाय इस तरह के काम कर रहे हैं जिससे विश्व युद्ध का खतरा  बढ़त जा रहा है। और जनता के  आक्रोश को देखें तो श्रीलंका में कुछ साल पहले हुई बर्बादी और विद्रोह के बाद यही बात बांग्लादेश में भी हुई पिछले साल और अभी-अभी कुछ दिन पहले नेपाल को जलाकर वहां की जनता ने अपना विद्रोह प्रकट किया है। 

बात यहीं खत्म नहीं हो जाती है। मनुष्य का शरीर  भी विज्ञान की प्रगति के  संकट में है । फूल पौधों के, अनाज के, जानवरों के और यहां तक की मनुष्यों के भी ऊपर भी जेनेटिक एक्सपेरिमेंट किये जा रहे हैं। उनके जींस बदले जा रहे हैं।  इससे कारण सब्जियों के प्राकृतिक गुण खत्म होते जा रहे हैं। दूध को ऑक्सीटोसिन से प्रदूषित किया जा रहा है, साग सब्जियों को, फलों को, कार्बाइड गैस और तरह-तरह के रसायन से पकाया और बड़ा किया जा रहा है। खाने की वस्तुओं को पैकेट बंद बेचने के लिए उनमें पेस्टिसाइड्स, प्रिजर्वेटिव्स ,रंग, खुशबू वगैरह मिलाए जा रहे हैं। इन सभी से नई-नई बीमारियां पैदा हो रही है और मनुष्य के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। 

और भी बहुत कुछ हो रहा है ।

धर्म के नाम पर आतंक फैलाया जा रहा है। मनुष्य की चमड़ी के रंग और जाति आधार पर भी   आतंक हो रहा है। देखा जाए तो मनुष्य का मस्तिष्क भ्रमित होता जा रहा है। उसके अंदर आक्रोश और क्रोध भरा हुआ है और वह अपने आक्रोश की वजह से अपना मानसिक संतुलंत होता जा रहा है जिसका अंत विनाश में ही होना है। 

भगवत गीता में भी यही कहा गया है . . . 

 "क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।
(भगवद् गीता के अध्याय 2, श्लोक 63)

अर्थात क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति भ्रमित होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है, और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य का पतन हो जाता है क्योंकि यह सही निर्णय लेने की क्षमता  को खत्म कर देता है, जिससे मनुष्य गलतियाँ करता है और अंततः अपना ही विनाश कर बैठता है। 

विश्व एक बहुत बड़ी त्रासदी की तरफ बढ़ता प्रतीत हो रहा है।


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Friday, 12 September 2025

क्या विज्ञान ही अंतिम सत्य है ?

क्या विज्ञान ही अंतिम सत्य है ?

आप एक किताब को पढ़ते हुए अपने कमरे में टहल रहे हैं। अचानक किताब आपके हाथ से छूट जाती है और नीचे जाकर जमीन पर गिर जाती है। किताब आपके हाथ से छूटकर ऊपर  नहीं गईं, दाहिने तरफ नहीं गई, बाय तरफ भी नहीं गई। वह नीचे चली गई । 

ऐसा क्यों होता है ? 

ऐसा होता है पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण। पृथ्वी हर चीज को अपनी तरफ खींचती है । इसी को गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहते हैं। पेड़ से फल गिरकर नीचे जमीन पर आ जाते हैं । झरने  से पाली गिरता रहता है और नीचे आता रहता है। 

ऐसा कहा जाता है की एक दिन न्यूटन नाम का एक वैज्ञानिक एक सेब के पेड़ के नीचे बैठा हुआ था। अचानक पेड़ से एक पका हुआ सेब टूटता है और नीचे आकर उसके पास गिर जाता है। न्यूटन इसके बारे में काफी सोचता है और फिर गुरुत्वाकर्षण शक्ति नाम के एक सिद्धांत का जन्म होता है। 

इस तरह यूरोप की सभ्यता ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति का पता लगाने का श्रेय न्यूटन को दे दिया 16वीं सदी में।

पर यह बात सही नहीं है क्योंकि इससे पहले भी गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बारे में काफी मालूम था विश्व की पुरानी सभ्यताओं को। इस गुरुत्वाकर्षण शक्ति का विस्तृत वर्णन सूर्य सिद्धार्थ नाम की एक प्राचीन भारतीय पुस्तक में  भी मिलता है जो सैंकड़ों  साल पहले लिखी गई थी ।

'सूर्य सिद्धांत' में गुरुत्वाकर्षण शक्ति का विस्तृत वर्णन है, विशेष रूप से भास्कराचार्य द्वारा लिखित संस्करण में, जो पृथ्वी और अन्य खगोलीय पिंडों के आकर्षण बल का उल्लेख करता है।  यह न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से कई शताब्दियों पहले ही इस बात की जानकारी देता है कि गुरुत्वाकर्षण के कारण ही सभी चीजों को पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ही आकर्षित करती है और ब्रह्मांड में पृथ्वी तथा अन्य ग्रह इसी कारण से अपनी कक्षा में बने रहते हैं। 

पर आधुनिक विज्ञान को इसका कोई ज्ञान नहीं था। ऐसे ही विज्ञान को इस बात का भी ज्ञान नहीं था कि मनुष्य के तथा अन्य जीवों के शरीर में एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्र होता है। जब इस बात का वर्णन हमारे पुराने ग्रंथों में आता था और खासकर पिछले दो सौ साल में लिखी हुई कुछ भारतीय पुस्तकों में तो वैज्ञानिक इस बात का मजाक उड़ाते थे। इसे बे सिर पैर की बात कहते थे। फिर 1954 में वैज्ञानिकों को इस बात का पता चला कि यह तो सच है कि वास्तव में ऐसा एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड होता है। 

मतलब यह हुआ कि जब तक विज्ञान को पता नहीं चल जाएगा तब तक वह बात गलत है। और जब विज्ञान को उसका पता चल जाएगा तो उसके आविष्कारक को इतिहास में जगह मिल जाएगी इस बात के लिए कि इसी वैज्ञानिक ने इस बात का पता लगाया। दूसरे शब्दों में कहे तो यह दिखाई देता है कि विज्ञान को सब चीजों के बारे में ज्ञान नहीं होता । जैसे-जैसे विज्ञान की प्रगति होती है वैसे-वैसे नई चीजों के बारे में विज्ञान को पता चलता रहता है। एक वाक्य में कहें तो विज्ञान का ज्ञान आखिरी सत्य नहीं है। 

बहुत ही प्राचीन काल में मनुष्य ने कितनी प्रगति की थी इसके बारे में हमें कुछ भी पता नहीं है पर विज्ञान बड़े विश्वास के साथ कहता है कि आदमी के पूर्वज बंदर हुआ करते थे और बंदर से ही आदमी का जन्म हुआ है। सोचा जाए तो यह एक तरह का बकवास हो सकता है जो डार्विन नाम के एक आदमी  थ्योरी है और जिसे विज्ञान ने मान्यता दी है।

पृथ्वी कई अरब साल पुरानी है और हमें अपने इतिहास में सिर्फ पिछले पांच छह हजार सालों का वर्णन मिलता है। पर इससे पहले भी मनुष्य संसार में था और उसके बारे में हमें कुछ पता नहीं है। प्राचीन ग्रंथो से ऐसा आभास होता है कि हजारों साल पहले भी कई सभ्यताएं रह चुकी है जिनका नामोनिशान अब पूरी तरह से मिट चुका है। उस बीते हुऐ कल को जिसे हम  जानते ही  नहीं हैं और जिसे हमारा इतिहास जाने में असफल है विज्ञान पूरी तरह से नकार देता है।

 यह तो निश्चित है कि विज्ञान को सब चीजों के बारे में ज्ञान नहीं होता । जैसे-जैसे विज्ञान की प्रगति होती है वैसे-वैसे नई चीजों के बारे में विज्ञान को पता चलता रहता है। 

एक वाक्य में कहें तो विज्ञान का ज्ञान आखिरी सत्य नहीं है।

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अलाउद्दीन का चिराग

 अलाउद्दीन का चिराग 

बाजार जाकर सामान खरीदना युवा अवस्था में तो बहुत अच्छा लगता है पर जब उम्र बढ़ जाती है और शहर बहुत भीड़भाड़ वाला हो जाता है तब बाजार में सामान खरीदने जाने में आलस आता है।

अब लखनऊ की अमीनाबाद बाजार को ही ले लीजिए । कई दशक पहले अमीनाबाद बहुत साफ सुथरा था, भीड कम थी और सामान खरीदने में शरीर और दिमाग की थकावट नहीं होती थी। अब यह हाल है कि  घर से अमीनाबाद तक जाने में रास्ते में कई जगह जैम होते रहते हैं क्योंकी लखनऊ में चार दशक पहले जितनी साइकिल थी , अब उससे ज्यादा कार स्कूटर ऑटो रिक्शा हो गई है।
और बाजार के अंदर तो और भी बुरा हाल है। 

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में हमारे पास अलाउद्दीन का चिराग आ गया। इस अलाउद्दीन के चिराग को  मोबाइल फोन कहते है । स्मार्टफोन भी कहते हैं। अब आपको बाजार जाने की जरूरत नहीं है। सामान खरीदने के बहुत से ऐप है जैसे अमेजन, फ्लिपकार्ट, जियो, स्नैपचैट,1mg, ब्लिनकेट इत्यादि और आप किसी भी ऐप पर जाकर सभी तरह के सामान  के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं कि कौन सा  कितने रुपए में मिलता है, किस तरह का सामान है , देखने में कैसा है इत्यादि इत्यादि। जो भी सामान खरीदना हो उसे  बास्केट में डालते जाइए और जब आप का काम खत्म हो जाए तो एक बटन दबाया और 15 मिनट के बाद आपके दरवाजे पर एक आदमी वह सामान लेकर आ जाएगा। 

पहले ऐसा सिर्फ अलाउद्दीन के चिराग में होता था। अगर आपने अपने बचपन में अलाउद्दीन के चिराग की कहानी नहीं पढ़ी है तो आपको बता देता हूं।

कहानी कुछ इस तरह है कि एक आदमी को एक चिराग मिल जाता है जो रास्ते में कहीं पड़ा हुआ था। वह उसे अपने घर ले आता है क्योंकि उसे अपने घर में रोशनी के लिए एक चिराग की जरूरत थी। क्योंकि चिरागvथोड़ा गंदा था तो वह चिराग को साफ करने लगता है। जब वह आदमी उस चिराग को रगड़ रगड़ कर साफ कर रहा है तब एक  धमाका होता है और धुएं में से एक जिन्न प्रकट हो जाता है ।  जिन्न उससे कहता है "आका, हुकूमत दीजिए क्या लाना है"। फिर वह आदमी हुक्म देता है और थोड़ी ही देर में उसे 
सामान लाकर जिन्न दे देता है।

यही काम हमारा स्मार्टफोन करता है। बस फर्क यह है कि सामान मुफ्त में नहीं मिलता।

ज्यादातर ऑनलाइन खरीदारी के संस्थान उसी दिन डिलीवर हो जाता है पर कुछ सामान ऐसे होते हैं जो बाहर से मांगने  होते हैं। ऐसे सामान दो-तीन दिन के अंदर आ जाता है। ज्यादातर कपड़े ,फर्नीचर का सामान ,रसोई के बड़े बर्तन इत्यादि बाहर से  आते हैं जिसके लिए एक-दो दिन का समय लगता है।आप अपने स्मार्टफोन में देख सकते हैं कि सामान कब वहां से चला, कहां-कहां होकर आया और कब आपके घर पर पहुंचा देने के लिए ऑनलाइन स्टोर से चल पड़ा है।

स्मार्टफोन का एक और उपयोग है। आप अपने घर पर ही कोई टैक्सी या ऑटो रिक्शा बुला सकते हैं मोबाइल फोन पर बुक करके और वह भी 10 मिनट के अंदर आ जाता है। आपको फोन पर अपना पता, जहां जाना है वह जगह टाइप करनी होती है और आपको यह सूचना मिल जाती है किस नंबर की गाड़ी आएगी , ड्राइवर का नाम क्या होगा और आपके कितने पैसे देने होंगे। अब वह पुराना झंझट 
खत्म है जब आप बाहर सड़क पर खड़े होकर देखते थे कि इस रास्ते कोई टैक्सी या ऑटो रिक्शा निकल जाए तो  हाथ रोक कर उससे पता करें कि वह उस जगह जाएगा या नहीं। कभी-कभी टैक्सी ड्राइवर मना भी कर देते थे। 

इस स्मार्टफोन से आपको और भी कई चीज मिल जाती है। 
आप इस स्मार्टफोन से दुनिया के किसी भी हिस्से में रहने वाले किसी व्यक्ति से बातचीत कर सकते हैं उसे फोटो या वीडियो भी भेज सकते हैं। आप इसे कैलकुलेटर के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें आप मौसम का हाल पता कर सकते हैं। इसमें विकिपीडिया AI या अन्य किसी स्थान से आप दुनिया की कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं जिसके लिए आपको लाइब्रेरी जाने की अब कोई जरूरत नहीं है। इसमें आप अपने मनपसंद की कोई भी पुस्तक फॉरेन पढ़ सकते हैं कभी पैसा देकर कभी  मुफ्त में। संसार के किसी भी देश के अखबार भी आप किसी भी भाषा में अपने स्मार्टफोन पर पढ़ सकते हैं। 

बचपन मैं तिलस्म की कहानियां पढ़ कर बहुत रोमांच हो जाता था और सोचते थे कि काश ऐसा होता, हमें भी अलाउद्दीन का चिराग मिल जाता तो कितना अच्छा होता। कभी सोचा न था की एक समय ऐसा आएगा जब वह चिराग हमारे हाथ में होगा। 

कोई भी चीज असंभव नहीं है।



Wednesday, 10 September 2025

जिम कॉर्बेट की कहानी

जब मैं दसवी क्लास में पढ़ता था तो एक दिन मेरे पिताजी के एक दोस्त के यहां मैने हार्ड कवर में खूबसूरत पेपर जैकेट में एक किताब देखी जिसमे एक शेर (टाइगर) जंगल में घूम रहा था।  किताब को देखना शुरू किया तो मन किया की पूरी कहानी पढ़ी जाए। मेरे पिताजी के दोस्त ने वह किताब मुझे पढ़ने के लिए दे दी और अगले दिन पूरे दिन उस किताब को ही पढ़ता रहा और किताब पूरी पढ़ लेने के बाद मैं उस किताब के लेखक जिम कॉर्बेट का फैन बन गया। 

जिम कॉर्बेट ने साठ साल की उम्र के बाद ही अपने अनुभव लिखने शुरू किये । उनके लिखने का स्टाइल इस तरह का था कि लगता था कि मैं खुद जंगल में पेड़ के ऊपर बैठा हूं और नीचे खड़े शेर को देख रहा हूं।  बहुत आकर्षक और रोमांचकारी। जंगल के बारे में पढ़ कर  लगता था मैं खुद जिम कॉर्बेट के साथ हूं और अभी शेर मेरे ऊपर उछलने वाला है ।  फिर गोली चलती है। सुबह  वह शेर आसपास की गांव के सभी लोगों के घेरे के अंदर जमीन में पड़ा होता है और उस शेर को मारने वाले हीरो की जय जयकार होती है। जिम कॉर्बेट वाकई जय जयकार के हकदार थे क्योंकि उन्होंने ऐसे शेर मारे थे जो गांव से बच्चों को और बड़ों को उठा ले जाते थे और अगले दिन उनकी लाश जंगल से गांव के लोगों की एक टोली लेकर आती थी।

जिम कॉर्बेट के दादा जी और दादी जी सन 1815 पर आयरलैंड से भारत आ कर यहीं बस गए। इनके पिताजी  क्या जन्म में भारत में ही हुआ था और वह भारतीय सेना में थे और  रिटायरमेंट के बाद  नैनीताल में बस गए थे जहां वह पोस्ट मास्टर के रूप में कुछ समय तक काम करते रहे। उनके नौ बच्चे थे एक ने जिम कॉर्बेट आठवीं संतान थी। इनकी माता जी ने  काफी समय तक नैनीताल में एक रियल स्टेट एजेंट के रूप में भी काम किया। 


सन 1880 में नैनीताल में एक विशाल लैंड स्लाइड हुआ स्नो व्यू वाली पहाड़ी की तरफ और इसमें जिम कॉर्बेट के परिवार की कई प्रॉपर्टी नष्ट हो गई । इसके बाद इनकी माता जी ने उस पहाड़ की दूसरी तरफ वाले पहाड़ पर एक  मकान बताया जिसका नाम गुरने हाउस रक्खा। जिम कॉर्बेट ने अपने जीवन का अधिकार भाग इसी मकान मे गुजारा।

गुरने हाउस घने जंगलों के बीच में था क्योंकि उस समय नैनीताल में  बहुत कम मकान थे और मकान के चारों तरफ घने जंगल थे। बचपन से ही जिम कॉर्बेट को जंगलों में घूमने की आदत थी और वह अपनी गुलेल से अक्सर छोटे-छोटे जीवो का शिकार किया करता था। 8 साल की छोटी उम्र में ही जिम कॉर्बेट को एक छोटी सी शॉटगन बंदूक मिल गई और वह धीरे-धीरे बहुत बढ़िया निशानेबाज बन गये। कुछ समय बाद जिम कॉर्बेट की निशानेबाजी से प्रभावित होकर फौज के एक बड़े ऑफिसर ने उन्हें एक बहुत बढ़िया राइफल भेंट की। इसी राइफल से जिम कॉर्बेट ने अपना पहला आदमखोर तेंदुआ मारा।

जिम कॉर्बेट (जिनका पूरा नाम एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट था,) का जन्म नैनीताल में  25 जुलाई सन 1875 को हुआ था । नैनीताल उसे समय ब्रिटिश राज के एक मशहूर हिल स्टेशन के रूप में  विकसित हो रहा था। 

जिम कॉर्बेट ने काफी समय तक  बिहार में  मोकामा घाट में नौकरी की । उसके बाद कुछ समय तक वह भारतीय सेवा में भी रहे  और प्रथम विश्व युद्ध में भी योगदान दिया। 

बाद में जिम कॉर्बेट नैनीताल वापस आ गए और वहां कुछ समय तक नैनीताल के पोस्ट मास्टर के रूप में काम भी काम किया। सन 1915 में जिम कॉर्बेट ने हल्द्वानी के पास छोटी हल्द्वानी नाम का एक उजड़ा हुआ गांव खरीद लिया कालाढूंगी के पास और उसे एक अच्छे गांव की तरह विकसित किया। उन्होंने गांव के चारों तरफ एक ऊंची दीवाल भी  बनवाई गांव की सुरक्षा के लिए और धीरे-धीरे गांव आबाद हो गया। उन्होंने खुद भी अपने और अपनी पत्नी के लिए एक अच्छा सा मकान बनाया और खेती करनी भी शुरू कर दी। आज वह मकान कालाढूंगी में उनके स्मारक के रूप में जाना जाता है जिसके आहाते में उनकी एक मूर्ति भी है।

1944 में उनकी पहली पुस्तक "मैन ईटर्सआफ कुमाऊँ" प्रकाशित हुई और उसने उनको जगत प्रसिद्ध कर दिया क्योंकि उस किताब की कॉपियां पूरे अंग्रेजी पढ़ने वाले विश्व में काफी संख्या में खरीदी गई। इसके बाद तो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस  ने उनसे और किताबें लिखने का अनुरोध किया और उन्होंने "मैन ईटिंग लेपर्ड ऑफ रुद्रप्रयाग" और "टेंपल टाइगर" नाम की किताब लिखी जो बहुत ही लोकप्रिय हुई ।  उन्होंने दो तीन किताब और भी लिखी।

भारत की आजादी के बाद हुए दंगों से प्रभावित होकर उन्होंने भारत से  जाने का निर्णय लिया। भारत की आजादी के तीन-चार महीने बाद ही वह अफ्रीका में केन्या चले गए जहां पर उन्होंने कुछ समय पहले एक फार्म  खरीदा था।

19 अप्रैल 1955 में  जिम कॉर्बेट सदा के लिए इस दुनिया से विदा हो गए। उन्हें सेंट पीटर्स एंग्लिकन चर्च मैं दफनाया गया जहां आज भी उनका स्मारक पत्थर लगा हुआ है। 

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