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Monday, 18 May 2026

रेलवे की बातें

महात्मा गांधी जब अफ्रीका से भारत आए तो उनका पूरा हिसाब किताब ही बदल गया। पहले तो वो सुटेड बूटेड रहते थे क्योंकि बड़े वकील थे पर यहां आकर उनका परिधान बदल गया। सिर्फ एक धोती और वह भी लंगोटी नुमा।  निकल पड़े ट्रेन की यात्रा करने के लिए। मुंबई से मद्रास। अफ्रीका में तो फर्स्ट क्लास के डिब्बे से बाहर फेंक दिए गए थे पर भारत आकर थर्ड क्लास  टिकट खरीद कर यात्रा की। ट्रेड ई ट्रेड आई और उधर रेट के डिब्बे में घुसने की कोशिश की। थर्ड क्लास के यात्री ज्यादा और डिब्बे कम। बड़ी मुश्किल से ट्रेन के अंदर घुस पाए। और फिर जो उन्होंने देखी थर्ड क्लास की हालत तो उन्होंने इस पर एक लंबा चौड़ा लिख लिख डाला देख समाचार पत्र में ।


एक बंगाली बाबू  थे। नाम था ओखिल चंद्र सेन । थर्ड क्लास में सफर कर रहे थे। अहमदनगर स्टेशन आते ही उदय बड़े जोर की पॉटी लगी उसे जमाने में ट्रेन के डिब्बे में कोई बाथरुम नहीं होता था। तो जैसे ही ट्रेन रुकी वह भेज पॉटी कर दे। और पॉटी करने के बाद जब वह अपनी धोती सवाल रहे थे तो ट्रेन चल पड़ी वह धोती लपेट लपेट ट्रेड के पीछे भागे और उनके धोते खुल गई। तो फिर गुस्से में आकर उधर है भारत सरकार को एक पत्र लिखा जिसकी वजह से सरकार दे फिर ट्रेड में पार्टी की व्यवस्था की । आप उनकी यह 9 जुलाई 1909 की चिट्ठी पढ़ सकते हैं दिल्ली के रेलवे म्यूजियम में जाकर।

तो आखिल बाबू की चिट्ठी की वजह से ट्रेन में पार्टी की व्यवस्था हो गई की व्यवस्था हो गई।  पर इस पर भी कभी-कभी परेशानी हो जाती है। मुझे भी एक बार दिल्ली जाते वक्त दिल्ली आने से करीब 1 घंटे पहले जोर की पॉटी लगी और मैं भाग बाथरूम की तरफ। कॉरिडोर में  काफी भीड़ थी क्योंकि कंपार्टमेंट में डेली पैसेंजर नाम के बंदे घुस गए थे। मुश्किल से जब पॉटी के दरवाजे पर पहुंच कर दरवाजा खोला तो अंदर 5 6 डेली पैसेंजर खड़े दिखाई दिए जिन्होंने बाहर निकलने से इनकार कर दिया। 

अब बताइए हुई तो परेशानी टॉयलेट की व्यवस्था होते हुए भी। यह तो अच्छी बात थी की तब में जवान था और मैंने पॉटी रोक ली । अगर मैं उस समय आज की हालत में होता तो पॉटी निकल गई होती बाहर दरवाजे पर ही। 

खैर अब बंद कर रहा हूं यह लेख क्योंकि सुबह हो गई है और पॉटी लग रही है। अगर देर करूंगा तो आपको पता ही है क्या होगा।

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