अरे भाई यह क्या हो रहा है ! दुनिया बिल्कुल बदलती जा रही है!
हम इस दुनिया के पुराने लोगों में से है पर हमको ऐसा नहीं लग रहा है कि हम उसी प्लेनेट में है जिस पर पैदा हुए थे ।
पहले पोस्ट ऑफिस जाकर अंतर्देशीय पत्र खरीदते थे फिर घर जाकर उस पर चिट्ठी लिखते थे पता लिखते थे और फिर लाल रंग के लेटर बॉक्स की तलाश में निकल पड़ते थे। अब तो 20 साल से कोई चिट्ठी ही नहीं लिखी है।
लेकिन इस समय मसला कुछ और है। कल मई की चिलचिलाती धूप में एक अधेड़ सब्जी वाले को जलती हुई सड़क पर ठेला ढकेलते हुए देखा तो सोच में पड़ गया। उसे ग्राहक ढूंढने पड़ रहे थे जबकि पहले ग्राहकों की भीड़ लग जाती थी। सब्जी बेचने ठेले वाले मजबूरी में आते हैं धूप में बारिश में घर घर जाकर अपना सामान बेचने । जब सब्जियां बिक जाती है तब जाकर दो टाइम की रोटी का जुगाड़ होता है।
अब नए ठेले वाले आ गए हैं। हां भाई जो ठेले वालों के साथ कंपटीशन करें वह ठेले वाला ही कहलाएगा। यह लोग हैं फ्लिपकार्ट अमेजॉन बिग बॉस्केट जिओ मार्ट वगैरा-वगैरा। इनका हिसाब किताब फर्क है यह सामान सीधे गांव वालों से उठाते हैं मंडी से नहीं। काफी सस्ते में सामान मिल जाता है। गरीब ठेले वाले तो मंडी से लेते हैं मतलब यह हुआ की गरीब ठेले वालों के पेट में लात मारने के लिए करोड़पति बिजनेस वाले आ गए हैं ।
बहुत ही शर्म की बात है।
पब्लिक तो यह देखी है की कम से कन दाम में ज्यादा से ज्यादा समान मिले तो अब लोग यह समझते हुए भी की यह सामान खरीदने का मतलब है गरीब ठेले वालों के पेट में लात मारना, मजबूरी में ऑनलाइन ही सब्जी खरीदते हैं।
सरकार को इसका कुछ उपाय ढूंढता होगा।कुछ इस तरह का सिस्टम होना चाहिए कि ठेले वाला भी कम दाम में सब्जी खरीद सके ताकि उसे भी कम दाम में बेचने से नुकसान ना हो। या फिर कुछ इस तरह की व्यवस्था हो की ऑनलाइन मार्केटिंग वाले बाकी सब सामान तो बेचे पर सब्जियां अगर बेचें तो उसमें उनको टैक्स देना पड़े। ऐसा करने से वह सब्जियों के दाम बहुत कम नहीं रख पाएंगे।
भैया मैं समझ रहा हूं की जो बात मैं कह रहा हूं उससे मेरा भी नुकसान हो सकता है क्योंकि सब्जियां तो मैं भी खरीदता हूं। पर ताजी सब्जियां सिर्फ ठेले वालों से ही मिल सकती है। ऑनलाइन वाले तो सस्ती सब्जियां खरीद कर कोल्ड स्टोरेज में रखते हैं जहां उनके स्वाद और गुण में फर्क आ जाता है।
बाहर एक सब्जी वाला आवाज लग रहा है।अब चलता हूं सब्जी खरीदने।
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