हम पैदा हो गए थे भारत के आजादी के थोड़े पहले तो आजादी के टाइम पर बच्चे थे। तब रुपया आना पैसा होता था। ₹1 के 16 आने और एक आने का चार पैसा। दो तरह के पैसे के सिक्के दिखाई देते थे एक तो बड़े साइज का था आजकल के रुपए का दूने साइज का। और एक होता था आजकल के रुपए के साइज का गोल और बीच पर उसमें एक छेद होता था जिसमें एक पेंसिल जा सकती थी। मतलब है कि वह एक छल्ला था। दोनों सिक्के शुद्ध तांबे के होते थे। आजकल तो ₹1 का सिक्का भी लोहे का होता है, सस्ते लोहे का।
एक पैसे में तीन बीड़ी आती थी और दो पैसे है काफी हरी सब्जी।
हां तो एक आने में चार पैसे होते थे और एक आने का सिक्का पीतल मिली धातु का होता था। सुंदर चमकीला। उसके बाद दो आने का सिक्का होता था और फिर एक शुद्ध चांदी की चवन्नी। अठन्नी और रुपया भी चांदी का ही होता था, अठन्नी थोड़ी बड़ी और रुपया काफी बड़ा और हुई वजनदार। आजकल तो उस ₹1 की कीमत तीन हजार रुपए से ज्यादा है।
आजकल तो मिट्टी तेल मिलता ही नहीं है। वह तब कौड़ियों में मिलता था और गरीब आदमी के लालटेन और छोटी ढिबरी से ही उसके घर में रोशनी होती थी। पेट्रोल आठ आना लीटर था मतलब 50 पैसे का 1 लीटर था।
इस तरह के दाम सुनकर लोग पगला जाते हैं। अक्सर फेसबुक में पढ़ता हूं की क्या बढ़िया जमाना था जब सब चीज इतनी सस्ती थी पर कोई बंदा यह नहीं सोचता की उस समय आपके पास कितना पैसा होता था। तो सच्ची बात तो यह है कि उस समय भी पैसे की तंगी होती थी आजकल की ही तरह।
आपको एक उदाहरण देता हूं।
आजकल एक पुताई करने वाले मजदूर की एक दिन की कमाई ₹700 के करीब होती है। उस जमाने में एक दिहाड़ी मजदूर को मुश्किल से ₹3 रोज मिलता था। दफ्तर के एक चपरासी की मासिक आय तब ₹70 होती थी जो आजकल करीब 28000 है। कहने का मतलब है की दाम तो बहुत कम थे सब चीजों के पर आमदनी भी उसी हिसाब से बहुत कम थी तो हाथ सभी के तंग रहते थे। हां यह बात सही है कि वैश्विक बाजार में रुपए का भाव मजबूत था। भारत की आजादी के बाद $1 ₹5 के बराबर था जो आजकल 95 रुपए को पार कर चुका है। मतलब यह हुआ कि अमेरिका का जो सामान पहले आप ₹500 में खरीद सकते थे वह अब आपको ₹10000 के लगभग पड़ेगा।
भारत की पहली नोटबंदी 12 जनवरी 1946 को हुई जब सरकार ने द्वितीय महायुद्ध के टाइम पर मुनाफाखोरों के खिलाफ अभियान छेड़ा। 500 1000 और 10000 के नोटों की नोटबंदी हो गई।
इसका असर भारत के जनसाधारण को कुछ भी नहीं पड़ा क्योंकि तब आम आदमी के पास कभी ₹100 का नोट भी नहीं आया।
दूसरे नोटबंदी मोरारजी भाई देसाई ने 1978 में की। उस समय तक 1000, 5000 और 10000 के नोट वापस आ गए थे जिन्हें बंद करवा दिया गया। इसका भी असर जन साधारण पर बिल्कुल नहीं पड़ा क्योंकि 1000 के नोट को तो शायद ही किसी आम आदमी ने भी 1978 देखा होगा।
तीसरी नोटबंदी 8 नवंबर 2016 को हुई अचानक। नोटबंदी हो गई 500 और 1000 के नोट की। इस समय तक रुपए का मूल्य इतना गिर चुका था की साधारण आदमी भी 500 के नोट का इस्तेमाल करता था इससे 80% से ज्यादा लोगों को इसका गंभीर प्रभाव पड़ा और बैंकों के बाहर बहुत ही लंबी कटारे लग गई पुराने नोटों को जमा करने की । समाज के ऊपर इसका बहुत असर पड़ा।
तो मतलब यह निकला कि मेरे बचपन में रुपया मेंरी ही तरह स्वस्थ था और मेरे बुढ़ापे में रुपया मेरी तरह ही कमजोर हो गया है। मैं तो अपने स्वास्थ्य को स्थिर रखने की काफी कोशिश कर रहा हो पर रुपया ऐसी कोशिश करता हुआ नजर तो नहीं आ रहा है।
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