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Monday, 18 May 2026

शब्दों का हेर फेर

यह तो सभी जानते हैं कि आम एक फल है जिसका पेड़ काफी बड़ा होता है और सदाबहार होता है जिसमें गर्मियों के मौसम में फल लगते हैं जो पहले हरे होते हैं और बाद में मीठे और पीले हो जाते हैं। हरे आम की चटनी बनती है , हरे आम का पन्ना बनता है जो लू के दिनो में शरीर की रक्षा करता है। हरे आम का अचार भी बनता है । पका हुआ आम बहुत मीठा और स्वादिष्ट होता है। आम पूरे भारतवर्ष में होते हैं।

पर आम शब्द का प्रयोग फल के अलावा और भी तरह से होता है ,कई तरह से । कहावतों में पॉलीटिकल पार्टी में और आयुर्वेद में इत्यादि ।

बचपन में स्कूल के लिए पैदल जाते वक्त एक शॉर्टकट लेता था मैं क्योंकि सीधे सड़क से जाने में स्कूल बहुत दूर पड़ता था। शॉर्टकट एक पगडंडी थी जिसके दोनों तरफ एक बोर्ड लगा रहता था जिस पर लिखा था "आम रास्ता नहीं है". यह आम शब्द का दूसरा उपयोग देखा मतलब की रास्ता प्राइवेट है सब लोगों के इस्तेमाल का नहीं है. 

फिर स्कूल में ही एक कहावत पढ़ी कि "आम 
के आम गुठली के दाम" । यह आम शब्द का तीसरा प्रयोग था। मुहावरे के रूप में ।

करीब 10-12 साल पहले भारत में लोगों ने एक नई पार्टी बना दी आम शब्द के ऊपर "आम आदमी पार्टी"। यह आम खाने वाले मनुष्य की पार्टी नही थी बल्कि  एक पॉलीटिकल पार्टी थी।

आयुर्वेद में 'आम' (जिसका मूल संस्कृत शब्द 'अमा' है) का अर्थ कोई फल नहीं, बल्कि  "विषाक्त तत्व" (Toxins) होता है। आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में होने वाली अधिकांश बीमारियों की जड़ यही 'आम दोष' होता है।

हिंदी भाषा में कई ऐसे शब्द हैं जिनके एक से अधिक मतलब होते हैं। मिसाल के तौर पर कनक
का मतलब सोना भी होता है और गेहूं भी। कल का अर्थ बीता हुआ दिन भी होता है, आने वाला दिन भी होता है और मशीन भी होता है जैसे कल पुर्जे। इसी तरह तीर का मतलब भी एक तो तीर धनुष वाले तीर से होता है और दूसरा किनारे से, जैसे  "मेरा गांव गंगा के तीर है"। 

शब्दों का इस्तेमाल बहुत सोच कर करना चाहिए खास कर तब जब आप किसी दूसरे भाषाई क्षेत्र में हो जहां उस शब्द का कुछ और मतलब हो सकता है जो आपके लिए परेशानी कर सकता है। मिसाल के तौर पर हिंदी भाषिक क्षेत्र में वासना का अर्थ कामवासना से होता है पर मलयालम में इसका अर्थ खुशबू होता है।

 अब सोचिए कि अगर केरल का रहने वाला कोई मनुष्य उत्तर प्रदेश में आकर हिंदी बोलता है और एक युवा महिला से कहता है कि आपके शरीर से बहुत वासना आ रही है तो उसका क्या हाल होने वाला है। 

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रुपए की कहानी बचपन से बुढ़ापे तक

हम पैदा हो गए थे भारत के आजादी के थोड़े पहले तो आजादी के टाइम पर बच्चे थे। तब रुपया आना पैसा होता था। ₹1 के 16 आने  और एक आने का चार पैसा। दो तरह के पैसे के सिक्के दिखाई देते थे एक तो बड़े साइज का था आजकल के रुपए का दूने साइज का। और एक होता था आजकल के रुपए के साइज का गोल और बीच पर उसमें एक छेद होता था जिसमें एक पेंसिल जा सकती थी।  मतलब है कि वह एक छल्ला था। दोनों सिक्के शुद्ध तांबे के होते थे। आजकल तो ₹1 का सिक्का भी लोहे का होता है, सस्ते लोहे का। 

एक पैसे में तीन बीड़ी आती थी और दो पैसे है काफी हरी सब्जी।

हां तो एक आने में चार पैसे होते थे और एक आने का सिक्का पीतल मिली धातु का होता था। सुंदर चमकीला। उसके बाद दो आने का सिक्का होता था और फिर एक शुद्ध  चांदी की चवन्नी। अठन्नी और रुपया भी चांदी का ही होता था, अठन्नी थोड़ी बड़ी और रुपया काफी बड़ा और हुई वजनदार। आजकल तो उस ₹1 की कीमत तीन  हजार रुपए से ज्यादा है।

आजकल तो मिट्टी तेल मिलता ही नहीं है। वह तब कौड़ियों में मिलता था और गरीब आदमी के लालटेन और छोटी ढिबरी से ही उसके घर में रोशनी होती थी।  पेट्रोल आठ आना लीटर था मतलब 50 पैसे का 1 लीटर था।

इस तरह के दाम सुनकर लोग पगला जाते हैं। अक्सर फेसबुक में पढ़ता हूं की क्या बढ़िया जमाना था जब सब चीज इतनी सस्ती थी पर कोई बंदा यह नहीं सोचता की उस समय आपके पास कितना पैसा होता था। तो सच्ची बात तो यह है कि उस समय भी पैसे की तंगी होती थी आजकल की ही तरह। 

आपको एक उदाहरण देता हूं।

आजकल एक पुताई करने वाले मजदूर की एक दिन की कमाई ₹700 के करीब होती है। उस जमाने में एक दिहाड़ी मजदूर को मुश्किल से ₹3 रोज मिलता था। दफ्तर के एक चपरासी की मासिक आय तब ₹70 होती थी जो आजकल करीब 28000 है। कहने का मतलब है की दाम तो बहुत कम थे सब चीजों के पर आमदनी भी उसी हिसाब से बहुत कम थी तो हाथ सभी के तंग रहते थे। हां यह बात सही है कि वैश्विक बाजार में रुपए का भाव मजबूत था। भारत की आजादी के बाद $1 ₹5 के बराबर था जो आजकल 95 रुपए को पार कर चुका है। मतलब  यह हुआ कि अमेरिका का जो सामान पहले आप ₹500 में खरीद सकते थे वह अब आपको ₹10000 के लगभग पड़ेगा।

भारत की पहली नोटबंदी 12 जनवरी 1946 को हुई जब सरकार ने द्वितीय महायुद्ध के टाइम पर  मुनाफाखोरों के खिलाफ अभियान छेड़ा। 500 1000 और 10000 के नोटों की नोटबंदी हो गई।

इसका असर  भारत के जनसाधारण को कुछ भी नहीं पड़ा क्योंकि तब आम आदमी के पास कभी ₹100 का नोट भी नहीं आया। 

दूसरे नोटबंदी मोरारजी भाई देसाई ने 1978 में की। उस समय तक 1000, 5000 और 10000 के नोट वापस आ गए थे जिन्हें बंद करवा दिया गया। इसका भी असर जन साधारण पर बिल्कुल नहीं पड़ा क्योंकि 1000 के नोट को तो शायद ही किसी आम आदमी ने भी 1978 देखा होगा। 

तीसरी नोटबंदी 8 नवंबर 2016 को हुई  अचानक।  नोटबंदी हो गई 500 और 1000 के नोट की। इस समय तक रुपए का मूल्य इतना गिर चुका था की साधारण आदमी भी 500 के नोट का इस्तेमाल करता था इससे 80% से ज्यादा लोगों को इसका गंभीर प्रभाव पड़ा और बैंकों के बाहर बहुत ही लंबी कटारे लग गई पुराने नोटों को जमा करने की । समाज के ऊपर इसका बहुत असर पड़ा। 

तो मतलब यह निकला कि मेरे बचपन में रुपया मेंरी ही तरह स्वस्थ था और मेरे बुढ़ापे में रुपया मेरी तरह ही कमजोर हो गया है। मैं तो अपने स्वास्थ्य को स्थिर रखने की काफी कोशिश कर रहा हो पर रुपया ऐसी कोशिश करता हुआ नजर तो नहीं आ रहा है। 

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यह क्या हो रहा है भाई

अरे भाई यह क्या हो रहा है ! दुनिया बिल्कुल बदलती जा रही है!

 हम इस दुनिया के पुराने लोगों में से है पर हमको ऐसा नहीं लग रहा है कि हम उसी प्लेनेट में है जिस पर पैदा हुए थे । 

पहले पोस्ट ऑफिस जाकर अंतर्देशीय पत्र खरीदते थे फिर घर जाकर उस पर चिट्ठी लिखते थे पता लिखते थे और फिर लाल रंग के लेटर बॉक्स की तलाश में निकल पड़ते थे। अब तो 20 साल से कोई चिट्ठी ही नहीं लिखी है।

लेकिन इस समय मसला कुछ और है। कल मई की चिलचिलाती  धूप में एक अधेड़ सब्जी वाले को जलती हुई सड़क पर ठेला ढकेलते हुए देखा तो सोच में पड़ गया। उसे ग्राहक ढूंढने पड़ रहे थे जबकि पहले  ग्राहकों की भीड़ लग जाती थी। सब्जी बेचने  ठेले वाले मजबूरी में आते हैं धूप  में बारिश में घर  घर जाकर अपना सामान बेचने । जब सब्जियां बिक जाती है तब जाकर दो टाइम की रोटी का जुगाड़ होता है। 

अब नए ठेले वाले आ गए हैं। हां भाई जो ठेले वालों के साथ कंपटीशन करें वह ठेले वाला ही कहलाएगा। यह लोग हैं फ्लिपकार्ट अमेजॉन बिग बॉस्केट जिओ मार्ट  वगैरा-वगैरा। इनका हिसाब किताब फर्क है यह सामान सीधे गांव वालों से उठाते हैं मंडी से नहीं। काफी सस्ते में सामान मिल जाता है। गरीब ठेले वाले तो मंडी से लेते हैं मतलब यह हुआ की गरीब ठेले वालों के पेट में लात मारने के लिए करोड़पति बिजनेस वाले आ गए हैं ।

 बहुत ही शर्म की बात है। 

पब्लिक तो यह देखी है की कम से कन दाम में ज्यादा से ज्यादा समान मिले तो अब लोग यह समझते हुए भी की यह सामान खरीदने का मतलब है गरीब ठेले वालों के पेट में लात मारना, मजबूरी में ऑनलाइन ही सब्जी खरीदते हैं।

सरकार को इसका कुछ उपाय ढूंढता होगा।कुछ इस तरह का सिस्टम होना चाहिए कि ठेले वाला भी कम दाम में सब्जी खरीद सके ताकि उसे भी कम दाम में बेचने से नुकसान ना हो। या फिर कुछ इस तरह की व्यवस्था हो की ऑनलाइन मार्केटिंग वाले बाकी सब सामान तो बेचे पर सब्जियां अगर बेचें तो उसमें उनको  टैक्स देना पड़े। ऐसा करने से वह सब्जियों के दाम बहुत कम नहीं रख पाएंगे।

भैया मैं समझ रहा हूं की जो बात मैं कह रहा हूं उससे मेरा भी नुकसान हो सकता है क्योंकि सब्जियां तो मैं भी खरीदता हूं। पर ताजी सब्जियां सिर्फ ठेले वालों से ही मिल सकती है। ऑनलाइन वाले तो सस्ती सब्जियां खरीद कर कोल्ड स्टोरेज में रखते हैं जहां उनके स्वाद और गुण में फर्क आ जाता है। 

बाहर एक सब्जी वाला आवाज लग रहा है।अब चलता हूं सब्जी खरीदने।

रेलवे की बातें

महात्मा गांधी जब अफ्रीका से भारत आए तो उनका पूरा हिसाब किताब ही बदल गया। पहले तो वो सुटेड बूटेड रहते थे क्योंकि बड़े वकील थे पर यहां आकर उनका परिधान बदल गया। सिर्फ एक धोती और वह भी लंगोटी नुमा।  निकल पड़े ट्रेन की यात्रा करने के लिए। मुंबई से मद्रास। अफ्रीका में तो फर्स्ट क्लास के डिब्बे से बाहर फेंक दिए गए थे पर भारत आकर थर्ड क्लास  टिकट खरीद कर यात्रा की। ट्रेड ई ट्रेड आई और उधर रेट के डिब्बे में घुसने की कोशिश की। थर्ड क्लास के यात्री ज्यादा और डिब्बे कम। बड़ी मुश्किल से ट्रेन के अंदर घुस पाए। और फिर जो उन्होंने देखी थर्ड क्लास की हालत तो उन्होंने इस पर एक लंबा चौड़ा लिख लिख डाला देख समाचार पत्र में ।


एक बंगाली बाबू  थे। नाम था ओखिल चंद्र सेन । थर्ड क्लास में सफर कर रहे थे। अहमदनगर स्टेशन आते ही उदय बड़े जोर की पॉटी लगी उसे जमाने में ट्रेन के डिब्बे में कोई बाथरुम नहीं होता था। तो जैसे ही ट्रेन रुकी वह भेज पॉटी कर दे। और पॉटी करने के बाद जब वह अपनी धोती सवाल रहे थे तो ट्रेन चल पड़ी वह धोती लपेट लपेट ट्रेड के पीछे भागे और उनके धोते खुल गई। तो फिर गुस्से में आकर उधर है भारत सरकार को एक पत्र लिखा जिसकी वजह से सरकार दे फिर ट्रेड में पार्टी की व्यवस्था की । आप उनकी यह 9 जुलाई 1909 की चिट्ठी पढ़ सकते हैं दिल्ली के रेलवे म्यूजियम में जाकर।

तो आखिल बाबू की चिट्ठी की वजह से ट्रेन में पार्टी की व्यवस्था हो गई की व्यवस्था हो गई।  पर इस पर भी कभी-कभी परेशानी हो जाती है। मुझे भी एक बार दिल्ली जाते वक्त दिल्ली आने से करीब 1 घंटे पहले जोर की पॉटी लगी और मैं भाग बाथरूम की तरफ। कॉरिडोर में  काफी भीड़ थी क्योंकि कंपार्टमेंट में डेली पैसेंजर नाम के बंदे घुस गए थे। मुश्किल से जब पॉटी के दरवाजे पर पहुंच कर दरवाजा खोला तो अंदर 5 6 डेली पैसेंजर खड़े दिखाई दिए जिन्होंने बाहर निकलने से इनकार कर दिया। 

अब बताइए हुई तो परेशानी टॉयलेट की व्यवस्था होते हुए भी। यह तो अच्छी बात थी की तब में जवान था और मैंने पॉटी रोक ली । अगर मैं उस समय आज की हालत में होता तो पॉटी निकल गई होती बाहर दरवाजे पर ही। 

खैर अब बंद कर रहा हूं यह लेख क्योंकि सुबह हो गई है और पॉटी लग रही है। अगर देर करूंगा तो आपको पता ही है क्या होगा।

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