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Friday, 4 November 2022

खीमा की कहानी (भाग दूसरा)

खीमानंद की कहानी  भाग2

जब खीमा 2 साल का था तो उसके पापा का तबादला बिजनौर से गोरखपुर हो गया। कहते है आते वक्त रेल के डिब्बे की खिड़की से चलती गाड़ी के बाहर खीमा ने अपना नया सिल्क का हाफ पैंट सूट बाहर फेंक दिया था।

गोरखपुर में उसके पापा के एक मित्र शंकर सिंह पोस्टेड थे जिनका तबादला उसके पिता की ही बिजनौर की पोस्ट में हो गया था। स्टेशन से उसके पिता  शंकर सिंह जी के  इसी खाली मकान पर आए।  मकान के नजदीक ही गोलघर की छोटी सी साफ-सुथरी बाजार थी और स्टेशन भी बहुत ज्यादा दूर नहीं था । गोरखपुर का स्टेशन बहुत शानदार था।

 उस जमाने में उस एरिया में जिसे सिविल लाइंस कहते थे बहुत बड़े-बड़े अहाते में मकान हुआ करते थे। इस इलाके में एक जमाने में अंग्रेज लोग रहा करते थे और उन्होंने अपने हिसाब से ही सिविल लाइंस इलाके की व्यवस्था की थी।  पास में ही अंग्रेजों के जरूरत पूरी कराने के लिए छोटी सी बाजार जहां अंग्रेजी शराब की दुकान डबल रोटी मक्खन अंडा की दुकान द रेसर बैडमिंटन रैकेट वाली खेलकूद के सामान की दुकान एक घर के जरूरत के सामान रखने वाली दुकान जहां अंग्रेजी बिस्किट टोपी टॉफी खिलौने से लेकर साबुन तेल कंगी वगैरह सब मिलता था। 

मकान का कंपाउंड तो बहुत ही बड़ा था पर मकान कुछ छोटा था हालांकि  अच्छा बना हुआ था। पहले वह मकान किसी अंग्रेज औरत ने अपने लिए बनवाया था  पर जब वह इंग्लैंड चली गई तो बाबूलाल जी नाम के एक लैंडलॉर्ड ने उसे खरीद लिया था। खीमा के पापा ने मकान मालिक से कहकर कुछ और कमरे बनवाए , सुंदर डिजाइन के बरामदे बनवाए और मकान के चारों तरफ मजबूत बाउंड्री वॉल भी बनवा दी जो पहले नहीं थी। खीमा के पापा को बागवानी का बहुत शौक था खासकर फूलों का और उन्होंने पूरे मकान में सुंदर फूल के बेल और पौधे लगाए

मकान से  चौथाई किलोमीटर पर उसके पिताजी का दफ्तर था। उतनी ही दूरी पर नेपाल क्लब था जहां उसके पापा अंग्रेजों के जमाने में टेनिस खेलने जाया करते थे। अंग्रेजों के जाने के बाद क्लब वाला कल्चर खत्म ही हो गया था।

जब खीमानंद साडे तीन साल का था उसके बड़े मामा दामोदर जी की शादी हो गई नैनीताल से। बहू पुष्पा रामनगर की थी, मामा से 12 साल छोटी। शादी के प्रोग्राम की याद की एक ग्रुप फोटो  खींची गई जो अभी भी खेमानंद के पास है जिस पर उसके नाना उसकी नानी उसकी मां उसकी मौसी उसकी मासी की लड़की और उसकी दीदी वगैरह सभी है। 

चार साल की उम्र के करीब खीमानंद गोरखपुर में सेंट मेरिज कॉन्वेंट  स्कूल में भर्ती हुआ था। साफ सुथरा अच्छा स्कूल था। वहां उसने ए बी सी डी और गणित वगैरा का पहला ज्ञान प्राप्त किया। वहां की सभी टीचर गोरी चिटटी अंग्रेज नन थी।वहां शायद 2 साल तक उसने पढ़ाई की जिसके बाद उसे हूफिंग कफ की वजह से स्कूल से निकाल दिया गया। वैसे भी वह स्कूल लड़कियों का था पर छोटे लड़कों को रख लिया जाता था।

 तब गोरखपुर एक  छोटा शहर था। रिक्शा  जैसी सवारिया उन दिनों होती नही थी । लोग पैदल ही जाते थे एक जगह से दूसरी जगह या फिर साइकिल या इक्का में । उसे और उसकी दीदी को एक चपरासी रोज स्कूल छोड़ने और लेने जाता था। पैदल ही जाते थे। स्कूल के बगल में दूसरी तरफ उसके पिताजी का ऑफिस का बड़ा सा अहाता था। वह और उसकी दीदी अक्सर पापा के  दफ्तर चले जाते थे स्कूल के बाद।

जब उसे स्कूल से निकाला गया तब उसके दफ्तर के ही एक बाबू ने उसके घर में आकर उसको पढ़ाना शुरू कर दिया। पापा उस बाबू को अच्छी ट्यूशन फीस देते थे और वह सभी विषय पढ़ाता था। मास्टर का नाम था राम राज्य भट्ट और वह हिंदी में m.a. पास था। फिर उसने तीन साल तक घर पर ही मास्टर से पढ़ा करीब-करीब सभी विषय और फिर उसने छठी क्लास पर गवर्नमेंट जुबली स्कूल में एडमिशन लिया। 

जुबली स्कूल की पहले दिन की उसे अच्छी तरह याद जीवन भर रही क्योंकि वहां पहले ही दिन एक खूंखार टीचर में बिना बात के उसकी पिटाई कर दी और वह स्कूल से भाग खड़ा हुआ । पुराने जमाने में स्कूल में लड़कों की बहुत पिटाई होती थी जो अब कानूनी तौर पर मना है। 

फिर उसने उस स्कूल में जाने से इंकार कर दिया बावजूद इसके कि उसके पिता ने उसकी  पिटाई भी की । हार कर उसके पिता ने उसे एक दूसरे स्कूल में भर्ती करा दिया जहां के हेड मास्टर पापा के परिचित थे। स्कूल का नाम था सेंट एंड्रयूज स्कूल। वहां उसने हाई स्कूल तक की पढ़ाई की । सुबह नौ बजे से क्लासेज होते थे  और  तीन बजे स्कूल बंद हो जाता था। सुबह दाल चावल सब्जी वगैरह का खाना खाकर वह स्कूल जाता था और शाम को जब लौटता था तो बुरी तरह भूखा होता था हालांकि स्कूल में एक बजे भीगा हुआ चना अदरक के टुकड़ो और नमक के साथ खाने को मिलता था। वह चना अदरक नहीं खाता था और अपने हिस्से का चना अदरक एक गरीब लड़के को दे देना था।
स्कूल से आने के बाद उसे शाम के 3:30 बजे रोज और लोगों के साथ बैठकर पूड़ी और आलू मटर की सब्जी खाने को  मिलती थी। 

उसे स्कूल पहुंचाने के लिए साइकिल में बैठा कर एक चपरासी आता था और शाम को उसे घर ले जाता था क्योंकि स्कूल घर से थोड़ा दूर था। बाद में जब पापा के पास कार आ गई  तब उसके ठाठ हो गए क्योंकि एक ड्राइवर उसे कभी कभी स्कूल छोड़ने और लेने जाता था।

नए स्कूल में खीमा का मन लग गया था क्योंकि लड़के अच्छे थे और मास्टर भी उसे परेशान नहीं करते थे। उसे सबसे अच्छे मास्टर शशिमॉल पंडित लगते थे जो हिंदी पढ़ाया करते थे। बंगाली टीचर बिस्वास अंग्रेजी पढाते थे।  स्कूल ईसाइयों का था तो सुबह क्लासेस शुरु होने से पहले प्रार्थना होती थी बाइबल के पाठ जैसा कि अन्य क्रिश्चियन स्कूल में होता था1 हेड मास्टर साहब का नाम राय बहादुर अमर सिंह था जो ईसाई थे। वह गोरे चिट्टे थे और उनकी शादी एक एंग्लो इंडियन औरत से हुई थी। स्कूल के बगल में ही उनका बंगला था।

इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के लिए वह सेंट एंड्रयूज कॉलेज पर आ गया जो उस जमाने का अच्छे  कॉलेज  था। वहां के प्रिंसिपल पीटी चांडी थे जो आगे चलकर कई विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलर भी रहे।

 केमिस्ट्री की लैब में प्रैक्टिकल करते वक्त एक बार उसकी अच्छी खासी नई पेंट में कई जगह छेद हो एसिड गिरने से। उसे अभी तक केमिस्ट्री लैब के बाहर h2s गैस की बदबू  याद है।

इंटरमीडिएट तक उसका विषय विज्ञान  (साइंस)  सब्जेक्ट का था पर इंटरमीडिएट के बाद उस आर्ट्स मैं बीए करने का फैसला किया और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी चला गया ।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी मै वह एक हॉस्टल में रहने लगा। हॉस्टल  का नाम अमरनाथ झा हॉस्टल था जिसे म्योर हॉस्टल भी कहते थे।  शुरू शुरू में सभी नए लड़कों की रैगिंग होती है और उसकी भी काफी खिंचाई हुई पर बाद में आपस में काफी भाईचारा हो गया था सीनियर्स के साथ। 

हॉस्टल की पुराने जमाने की शानदार बिल्डिंग थी।उस हॉस्टल में दो प्राइवेट मेस यानी भोजनालय थे। उसने झुल्लर महाराज का मेस ज्वाइन कर लिया। ज्यादातर लड़के झुल्लार महाराज का मेस ही पसंद करते थे।

सुबह सात बजे रजा बेकरी का एक आदमी डबलरोटी मक्खन पेस्ट्री इत्यादि लेकर आता था। खीमा उससे आधी ब्रेड स्लाइस करवाकर और एक टिकिया मक्खन ले लेता था और फिर हीटर मैं चाय बना कर नाश्ता कर लेता था। अधिकतर लड़के ऐसा ही करते थे। शाम चार बजे  एक आदमी सामने यूनिवर्सिटी रोड की भट्ट जी की बेकरी से आता था। वह बहुत ताजे मुलायम बन में मक्खन लगा कर देता था। यूनिवर्सिटी रोड पर ही जगाती का पुराना पॉपुलर रेस्त्रां था जहां स्टूडेंट्स अक्सर खाना खाते थे।किताबों की भी बहुत सी दुकान थी। 

 पहले साल  हॉस्टल के एनुअल फंक्शन में उसने अंग्रेजी ड्रामे में पार्ट लिया था। इसके अलावा उसने वहां टेबल टेनिस और स्क्वैश रैकेट खेलना शुरू किया। उसे बाद में स्क्वैश रैकेट डबल्स टूर्नामेंट में दो बार यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप मिली।

उस जमाने में इलाहाबाद एक बहुत अच्छा, खुला हुआ साफ सुथरा शहर था।  किसी जमाने में इलाहाबाद यू पी सरकार की राजधानी रही थी और वहां की ब्रिटिश समय की इमारतें बहुत भव्य थीं।

 यूनिवर्सिटी की इमारतें भी लाजवाब थीं। आर्ट्स फैकल्टी के सीनेट हाल के ऊपर हूबहू लंदन के बिग बेन जैसा एक क्लॉक टावर था जिसके म्यूजिकल घंटे की आवाज कई मील दूर तक सुनाई देती थी। साइंस ब्लॉक मैं प्रसिद्ध म्योर टावर था।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बी.ए. करने के बाद वह लखनऊ यूनिवर्सिटी आ गया एम.ए. करने ।

बाकी की कहानी तीसरे भाग मैं।

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Saturday, 22 October 2022

खीमानंद की कहानी

खीमानंद की कहानी ---  कुछ सुनी हुई और कुछ देखी हुई।  ( part one)

उसके पापा के पिताजी का नाम लीलाधर  था। पापा की मम्मी का नाम पता नहीं। लीलाधर  अल्मोड़ा शहर में सरकारी दफ्तर में काम करते थे शायद इंस्पेक्टर ऑफ यूरोपियन स्कूल्स के दफ्तर में हेड क्लर्क थे । अच्छे संस्कारों वाले पुरुष थे पर बहुत गुस्से बाज। कहते हैं एक बार उन्होंने अपने अंग्रेज अफसर के ऊपर कुर्सी उठा ली थी मारने लिए । गांव में लोग हेड क्लर्क शब्द नही समझ पाते थे तो उन्हें हिट लर साहब कहते थे।

माला उनका गांव था जहां उनके पास अपने खेत थे । उन्होंने एक  तीन मंजिला मकान भी बनाया था जिसमें नीचे की मंजिल में , जिसे वहां की भाषा में गोठ कहते थे, गाय बैल रहते थे। बीच की मंजिल में परिवार के लोग और ऊपर की मंजिल में रसोईघर वगैरह था।

 उसे याद है कि बहुत ही छोटी उम्र में जब एक बार वह माला गया था तो वहां की बैठक में बैठकर उससे कल्याण पुस्तक का एक विशेष अंक देखा था और उसमें सुंदर चित्र उसके मन को भा गए थे।

 बचपन में अल्मोड़ा में उसके दादाजी पहले माल रोड पर जाखन  देवी मंदिर के पास किसी मकान में रहते थे । फिर बाद में एक बड़े मकान में बक्शीखोला में आ गए मॉल रोड पर ही । कहते हैं बाद में इसी मकान में  मुरली मनोहर जोशी जी रहते थे।

यह दो मंजिला मकान था और उसमें बहुत बड़ा पक्का आंगन था और पीछे गाय भैंस के लिए गौशाला। नीचे की मंजिल पर रसोई घर था और ऊपर बैठक वगैरह। इस मकान के ठीक ऊपर सड़क पर एक पेड़ था जिसके नीचे उसके बचपन में एक दुबला पतला बुड्ढा रोज बैठा करता था जिसके पास बड़े लंबे पहाड़ी खीरे होते थे और वह उन्हे काट के लंबे-लंबे टुकड़ों में भंगीरे के नमक के साथ खाने के लिए बच्चों को देता था। दो आने में एक लंबा खीरा।  

जैसा कि मैंने ऊपर बताया है वह अपने बचपन में बहुत छोटी उम्र में वह माला गांव जा चुका था । तब उसकी  बुआ की शादी हुई थी केदार दत्त जी के साथ। तब वह शायद करीब  6 बरस का था और  एक बड़े से  दाडिम के पेड़ के चबूतरे पर  बैठकर उसने खाना खाया था , उड़द चने की दाल , चावल, कापा, भांगे की चटनी वगैरह। 

मांला गांव अल्मोड़ा जिले में सोमेश्वर तहसील के अंदर एक गांव है बोरारो घाटी मे।  सोमेश्वर से कुछ ही दूर पर है थोड़ा आगे कौसानी जाने वाली सड़क पर । पहले बाएं तरफ सोमेश्वर आता है फिर थोड़ा आगे जाने पर दाहिने तरफ माला गांव आता है । बीच में गौला नदी है । गौला नदी को पार करने के लिए पहले कोई पुल नहीं था और जैसा कि पहाड़ी नदियों में होता है बड़े-बड़े पत्थरों पर पैर रखते हुए नदी को पार किया जाता था जो बरसात के मौसम में थोड़ा मुश्किल होता था क्योंकि नदी काफी भर जाती थी।। कुछ वर्ष पूर्व गौला नदी के ऊपर एक बहुत सुंदर मजबूत लोहे का हरे रंग का पुल बन गया है और अब नदी पार करना  आसान हो गया है। अब मोटरसाइकिल वगैरह भी गांव में लोगों ने रखी है।

हां तो मै बता रहा था कि खीमा के दादाजी ने माला गांव में एक तीन मंजिला मकान बनाया था और उस मकान के एक ओर पक्का आगन था जहां दाढ़िम अखरोट वगैरा के पेड़ लगे हुए थे। उस मकान के आंगन में एक ओखली भी थी जहां पर उसकी मां  धान के दानों को कूटती थी। पुराने जमाने में बहू की पोजीशन सास के घर में एक नौकरानी टाइप की होती थी जो सब तरह के काम करती थी झाड़ू पोछा, ओखली मैं धान कूटना , घर से दूर पानी के प्राकृतिक   नौला से गगरी में भर के पानी लाना और सास की जली कटी सुनना ।  बचपन में जब शायद वह 3 साल का होगा , उसे गौशाला में गायों के साथ बंद कर दिया था उसकी मा की सास ने। और  मा कुछ नहीं कर पाई। अपनी उस बहुत छोटी उम्र  में अपनी माता जी के साथ वह रोज ऊपर की ओर सड़क में नौला की तरफ जाता था यहां से गगरी में भरकर माताजी कई बार पानी लाती थी। तब माला गांव में पक्के मकान बहुत कम थे। अब तो काफी लोगो ने बड़े बड़े मकान बना लिए हैं। 

माला गांव की सपाट घाटी मैं दूर-दूर तक खेत थे जहां औरते खेती का काम भी करती थी।

उसके पापा जब 2 साल के थे तब उनकी मां की मृत्यु हो गई। पापा के पिताजी ने शीघ्र ही दूसरा विवाह किया और 12 साल की नई मां (जिनको  कैंजा कहते थे) घर पर आ गई। वह पापा से दस साल बड़ी थी यानी बारह साल की। उस जमाने में बाल विवाह की प्रथा काफी जोरों पर थी। 

कुछ वर्षों बाद दादी ने बच्चों को जन्म देना शुरू किया। पहली लड़की  शायद 17 साल की उम्र में हुई थी  । उसके बाद तीन और लड़कियां हुई  और उसके बाद दो पुत्रों  का जन्म हुआ और अंत में उसकी सबसे छोटी बुआ का।

घर में  बच्चों को देखने की ड्यूटी उसके पापा की थी क्योंकि वह सबसे बड़े थे तो गोद में किसी बच्चे को चुप कराते हुए या खिलाते हुए उन्होंने अपना विद्यार्थी जीवन शुरू किया। फिर भी हर साल अपनी कक्षा में प्रथम आए और यह सिलसिला उन्होंने एम एस सी की परीक्षा तक जारी रख्खा। 

उसके पापा ने हाई स्कूल की पढ़ाई अल्मोड़े के जीआईसी इंटर कॉलेज से की। पढ़ाई के दौरान वह मॉल रोड पर स्थित जय दत्त जी के मकान में रहते थे जिनको उसके पापा जयका कहते थे । मुझे पता नहीं कि उस समय उसके दादा जी कहां पोस्टेड थे क्योंकि आम तौर पर दादाजी अल्मोड़ा में सरकारी नौकरी करते थे। हां इतना अवश्य पता है कि 1935 में वह इलाहाबाद में पोस्टेड थे क्योकि उस पोस्टिंग के दौरान उसके बड़े चाचा का जन्म हुआ था इलाहाबाद के कर्नलगंज वाली रोड पर स्थित एक मकान में । बाद में उसके चाचा ने उसे वह मकान दिखाया था जब वह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा था ।

उसके पापा ने हाईस्कूल  और  इंटर  प्रथम श्रेणी में पास किया और पूरे कुमाऊं में सबसे ज्यादा नंबर लाए।

फिर वो ग्रेजुएशन के लिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी गए  और वह वहां गंगानाथ झा हॉस्टल में रहे।  वहां से उन्होंने बीएससी किया, फर्स्ट क्लास फर्स्ट, हमेशा की तरह।

 उसके बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी में आ गए और उन्होंने एमएससी किया फर्स्ट डिवीजन और टॉपर बनकर। यूनिवर्सिटी में वह बटलर हॉस्टल में रहते थे और बटलर हॉस्टल की क्रिकेट टीम में भी सदस्य थे। 

 प्रथम श्रेणी में एमएससी करने के बाद सवाल आया नौकरी का । उसे जमाने में या तो आप सरकारी नौकरी करते थे या फिर टीचर बनते थे।
अच्छे विद्यार्थी अगर साधन संपन्न हो तो उस जमाने में इंग्लैंड जाकर आईसीएस के परीक्षा में बैठते थे। दादाजी साधन संपन्न नहीं थे इसलिए आईसीएस की परीक्षा में बैठना नहीं हो पाया । नौकरी मिलना बहुत मुश्किल था उसे जमाने में। टीचर बनने के लिए LT की एक साल पढ़ाई होती थी। 

फिर सरकारी नौकरी का प्रयास शुरू हुआ  और साथ ही एलटी की डिग्री प्राप्त की। (वही डिग्री LT की बाद में बी एड बन गई थी)। अपने ट्रेनिंग के दौरान वो क्रिश्चियन कॉलेज में जो बलरामपुर हॉस्पिटल के पास था फिजिक्स पढ़ाया करते थे थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों। इसी दौरान उनका सिलेक्शन डिप्टी कलेक्ट्री में हो गया और वह बिजनौर में पोस्ट हुए । वहीं पर खीमा का जन्म हुआ। 

 एमएससी की पढ़ाई के दौरान ही खीमा के पापा का विवाह भोला जी की लड़की से हो गया  । भोला जी उस समय नैनीताल में रहते थे और सरकारी दफ्तर में ऑफिस सुपरिटेंडेंट थे। 

बिजनौर में उसके पापा जिस मकान में रहते थे वह पुराने जमाने का काफी बड़ा मकान था जिसके दो हिस्से कर दिए गए थे और जिस पर दो किराएदार रहते थे। उसके पापा के अलावा दूसरे किराएदार एक बहुत ही सज्जन पुरुष थे जो कहीं पर पढ़ाते थे और उनको सब लोग मास्टर साहब कहते थे।

बिजनौर  मे 5 साल रहने के बाद खीमा के पिताजी का तबादला गोरखपुर हो गया। तब वह करीब 2 साल का था।

 गोरखपुर की बातें कहानी के पार्ट 2 में ।
(आगे की कहानी पार्ट 2 में)

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Tuesday, 11 October 2022

बॉलीवुड की कुछ बातें

बॉलीवुड की कुछ बातें

एक बहुत पुरानी फिल्म जो याद आ रही है। वह है मिस्टर एंड मिसेज 55। इसमें गुरुदत्त मधुबाला ललिता पवार और  जॉनी वॉकर ने बहुत अच्छा काम किया था। दो छोटे कलाकार, जिन्होंने बाद में बहुत से लंबे अच्छे रोल किए , उन्होंने इस फिल्म में शायद पहली बार काम किया होगा । एक थे जगदीप जो फिल्म के शुरू में अखबार बेचते नजर आए सड़क पर।  और दूसरे थे सी एस दुबे  जिन्होंने एक डॉक्टर का बहुत छोटा सा रोल किया था इस फिल्म में।

 उसी जमाने में  हावड़ा ब्रिज भी देखी। इसमें ओम प्रकाश ने  अच्छा अभिनय कर दिखाया है। यह शायद हेलन की पहली फिल्म थी और इसमें "मेरा नाम चिन चिन चूं" पर डांस किया था जिसकी वजह से वह मशहूर हो गई। 

 एक और फिल्म थी 50 के दशक की "नई दिल्ली"। इसमें सभी कलाकारों का अच्छा काम था । इस फिल्म की खासियत इसका प्लॉट  था। इसमें सबसे बढ़िया एक्टिंग थी हास्य अभिनेता धूमल की जो किशोर कुमार का नकली बाप बना था।

 ललिता पवार  की फिल्म  "जंगली"  भी अपने जमाने की क्लासिक फिल्म थी। यह सायरा बानो की पहली फिल्म थी ।   इस फिल्म में बहुत स्वाभाविक अच्छी एक्टिंग की सायरा बानो ने और उसका पैर की चोट मे टिन्चर आयोडीन लगाने वाला सीन तो लाजवाब ही था। इसी फिल्म के एक गाने "चाहे कोई मुझे जंगली कहे" के शंखनाद "याहू" के साथ शम्मी कपूर भी इसी फिल्म से फिल्म जगत में छा गए। हमेशा की तरह ललिता पवार बहुत ही अच्छे रोल में नजर आई। इसी फिल्म में एक और कलाकार थे असित सेन, मोटे थुलथुले शरीर वाले। बहुत मंजे हुए कलाकार थे और बहुत सी फिल्मों में छोटे छोटे पर यादगार  काम करते थे। मिसाल के तौर में फिल्म "आनंद" में दवा खाने के शौकीन मरीज के रोल में, फिल्म "आरधना" में शर्मिला टैगोर के घर पर काम करने वाले एक कर्मचारी का और फिल्म "बंबई तो गोआ" में एक ढाबे के मालिक का।

1970 के दशक के बाद तो एक के बाद एक कई बढ़िया फिल्में देखने को मिली और अमोल पालेकर, मौसमी चटर्जी, उत्पल दत्त और कई और छोटे और अनजान कलाकारों का नए अंदाज में बहुत शानदार अभिनय देखने को मिला। यह सब फार्मूला फिल्म से फर्क फिल्में थी। 

फिल्म "अंगूर"  ही ले लीजिए। डायरेक्शन बहुत अच्छा था। मौसमी चटर्जी ने बहुत ही सुंदर स्वाभाविक काम किया है इसमें । वैसे तो इस फिल्म में सभी कलाकारों ने बहुत ही अच्छा काम किया । मिसाल के तौर पर जौहरी के किरदार में सी एस दुबे , उसके असिस्टेंट के रूप में युनुस परवेज़ और पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में कर्नल कपूर की एक्टिंग बहुत ही लाजवाब रही।

वह ऐसा दौर था जिसमें एक के बाद एक कई बहुत अच्छी फिल्में देखने को मिली जैसे "छोटी सी बात" ,  "बातों बातों मे"  ,  "गोलमाल" ,  "रंग बिरंगी",  "किसी से ना कहना",  "नरम गरम",   "दुल्हन वही जो पिया मन भाए"  "चश्मे बद्दूर"

इत्यादि ।


  इन फिल्मों की सफलता और लोकप्रियता के लिए न तो दिलीप कुमार की जरूरत पड़ी  ना तो देवानंद की,  ना राज कपूर की, ना किसी और सुपरस्टार की जो  किसी फिल्म की सफलता के लिए आवश्यक मारे जाते थे।

उस दौर के बाद भी कई और अच्छी फिल्म है आगे चलकर । 1997 की   "चाची 420" एक अलग तरह की फिल्म थी। उसके कुछ वर्षों  बाद  "हंगामा"  आई।  उसके कुछ वर्षों बाद   "जौली एलएलबी 2" ।

 अब जौली एलएलबी 2 को ही ले लीजिए इस में टॉप स्टार है अक्षय कुमार पर इसमें टॉप एक्टिंग है एक बहुत छोटे कलाकार की जिसका नाम सौरभ शुक्ला है और जिसने इस फिल्म में जज का रोल किया है।

मैं समझता हूं कि किसी फिल्म के अच्छी होने के लिए किसी सुपरस्टार की जरूरत नहीं  होती है।  जरूरत होती  है एक अच्छी पटकथा , एक अच्छे स्वाभाविक एक्टर की और एक अच्छे डायरेक्टर की। 
एक समस्या जरूर है और वह है कि अच्छी फिल्म व्यवसायिक रूप से सफल हो यह जरूरी नहीं है। इसीलिए कभी कभी कम लागत पर बनी हुई बहुत अच्छी क्वालिटी की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फेल हो जाती है। ऐसी फिल्मों की सफलता  इस बात पर निर्भर करती है कि ऐसी फिल्मों में  कुछ ऐसी चीजें डाल दी जाए जो सभी को पसंद हों।
कभी-कभी समझ में नहीं आता कि एक अच्छी फिल्म जिस पर सब तरह का मनोरंजन है फिर भी क्यों फेल कर जाती है अब इसका एक उदाहरण है फिल्म मुस्कुराहट है जिसका हीरो था एक अनजाना कलाकार जिसका नाम जय मेहता था. पिक्चर काफी अच्छी थी अमरीश पुरी का अभिनय उच्च कोटि का था और बाकी कलाकारों ने भी बहुत अच्छा काम किया था पर जाने क्यों बॉक्स ऑफिस पर चली नहीं।

वैसे देखा जाय तो फिल्मों के सुनहरे दिन खत्म हो चुके है। यह तो अब ना तो अब 70 mm के बड़े स्क्रीन वाले सिनेमा हाल हैं, न ही वह संगीतकार और गायक। तीस साल पहले आए शाहरुख खान अभी भी डटे हुए हैं क्योंकि अब सुपरस्टार्स का जमाना भी खत्म हो गया है और नए कलाकारों में वो बातें भी नहीं हैं ।

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Tuesday, 4 October 2022

बॉलीवुड के गुमनाम एक्टर

बॉलीवुड के गुमनाम अभिनेता

50 के दशक में मैने पिक्चर देखना शुरू किया था और तब के बड़े एक्टर होते थे देवानंद, राज कपूर और दिलीप कुमार और इनकी एक्टिंग की हर जगह तारीफ होती रहती थी।

अब तो काफी समय बीत गया है और सब कुछ बदल गया है । अब एक्टिंग के तरीके भी बदल गए हैं। तब ऐसा लगता था कि दिलीप कुमार गजब की एक्टिंग करता है पर अब ऐसा नहीं लगता है ।उसकी पुरानी पिक्चरों को देखकर लगता है स्वाभाविक एक्टिव नहीं है बल्कि कोरी डायलॉगबाजी है। देवानंद की एक्टिंग देखकर तो हंसी आती है। लटके झटके और उसका बोलने का तरीका बहुत बेतुका लगता है। हां  स्वाभाविक अंदाज़ राज कपूर का था कुछ हद तक।

 बहुत से ऐसे कलाकार हैं जिनकी कोई गिनती नहीं थी। वह बड़े कलाकारों से ज्यादा स्वाभाविक एक्टिंग करते थे। अब जब पुरानी पिक्चर  देखता हूं तो मुझे उन छोटे कलाकारों की एक्टिंग ज्यादा अच्छी लगती है। फिल्म रंगी बिरंगी में जावेद खान ने एक ब्लैक टिकट बेचने वाले की बहुत शानदार एक्टिंग की है उसी तरह एक मोटर गेराज के मालिक गुरनाम की शानदार एक्टिंग की है सीएस दुबे ने फिल्म छोटी सी बात में।

अंगूर में भी सीएस दुबे की एक्टिंग लाजवाब है जिसमें वह एक जेवर बनाने की दुकान का मालिक है और उसी फिल्म के एक और कलाकार ने बहुत शानदार एक्टिंग की है जिसका नाम युनुस परवेज़ है। युनुस परवेज़ ने फिल्म गोलमाल में भी बहुत अच्छी एक्टिंग की और उत्पल दत्त ने तो इस फिल्म में कमाल ही कर दिया है। 

छोटे-मोटे कलाकारों की बात आती है तो एस एन बनर्जी  का नाम भी सामने आता है । बहुत पुराने जमाने के एक्टर थे ।  फिल्म चलती का नाम गाड़ी में मधुबाला के पिताजी का किरदार निभाया था। इन्होंने  फिल्म किसी से ना कहना मैं दीप्ति नवल के मामाजी का रोल करने में कमाल दिखा दिया है। इसी तरह फिल्म जौली एलएलबी 2 मैं जज का रोल निभाते हुए सौरभ शुक्ला ने बड़े-बड़े एक्टरों की छुट्टी कर दी है। एक और नाम याद आ रहा है वह है अन्नू कपूर जो बहुत ही स्वाभाविक अच्छी एक्टिंग करते हैं इन्होंने फिल्म मिस्टर इंडिया में एक समाचार पत्र एडिटर का रोल किया है और फिल्म जौली एलएलबी 2 मूवी में भी एक वकील की बहुत ही शानदार एक्टिंग की है।

छोटे-मोटे रोल करने वाला एक और बढ़िया कलाकार है इफ्तेखार। इन्होंने सबसे ज्यादा किरदार निभाया है पुलिस के छोटे से बड़े  ओहदा के अफसर का। एक जमाने में यह पुलिस इंस्पेक्टर का रोल किया करते थे । बाद मैं इनकी  तरक्की हुई और कई फिल्म मैं यह पुलिस कमिश्नर के रूप में दिखाई दिए । ये एक बहुत स्वाभाविक एक्टर है दिलीप कुमार की तरह डायलॉगबाजी नहीं करते हैं देवानंद की तरह लटके झटकेभी नही। इनका बड़ा रोल फिल्म इत्तेफाक में था और फिल्म दुल्हन वही जो पिया मन भाए में भी बहुत लंबा रोल था इनका।

 कलाकार तो कहीं और है और सब का नाम भी तो याद नहीं है। हां डेविड और धूमल का नाम लेना भूल गया था। डेविड ने कई दशकों तक छोटे-छोटे बहुत अच्छे रोल किए जैसे फिल्म गोलमाल में अमोल पालेकर के डॉक्टर मामा बने थे और फिल्म बातों बातों में टीना मुनीम के अंकल।
धूमल ने भी फिल्म नई दिल्ली में किशोर कुमार के नकली पिताजी की बड़ी अच्छी एक्टिंग की है


औरतों की बात करें तो ललिता पवार और लीला मिश्रा का कोई जवाब नहीं था इनकी एक्टिंग इतनी  शानदार होती थी कि उसके ऊपर फिल्म के हीरो फीके पड़ जाते थे। फिल्म परिचय में लीला मिश्रा, फिल्म कथा में लीला मिश्रा, फिल्म मिस्टर एंड मिसेज 55 और अनाड़ी में ललिता पवार का कोई जवाब ही नहीं था। इसके अलावा दुर्गा खोटे भी मां के रूप में बहुत अच्छी लगती थी और बड़ी स्वाभाविक एक्टिंग करती थी।

हां एक और कलाकार याद आ रहा है । नाम है देव किशन। इस कलाकार ने करीब करीब सभी पिक्चरों में घर के एक स्थाई नौकर का रोल किया है जो खाना बनाता है और घर के लोगों की देखभाल करता है और जिसका नाम करीब करीब हर फिल्म में रामू काका है ।
इसे आप फिल्म चुपके चुपके के शुरू में गेस्ट हाउस के चौकीदार के रुप में, फिल्म आनंद में अमिताभ बच्चन के रसोईया के रूप में , फिल्म सीता और गीता में भी देख सकते हैं। और कई फिल्मो में भी। 

अब समय आ गया है कि इस तरह के कलाकारों का भी नाम याद किया जाए और इन्हें भी लाइफटाइम अवॉर्ड या नेशनल अवार्ड से संवारा जाए।

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Wednesday, 24 August 2022

सस्पैंडर्स और बेल्ट और आपकी पतलून

एक जमाने में पैंट को नीचे खिसकने से रोकने के लिए सस्पैंडर्स का इस्तेमाल होता था जिसे आम भाषा में उन दिनों गैलिस कहते थे । आप लोगों में से ज्यादातर लोग यह समझ नहीं पा रहे होंगे की गैलिस क्या चीज होती थी तो इसीलिए मैंने फोटो भी लगा दी है ।

उस जमाने में भी बहुत से लोग ऐसे होते थे जो गैलिस का इस्तेमाल नहीं करते थे तो उनके पैंट की कमर में दोनों तरफ दाहिने और बाऐं ओर  पैंट को कसने  के लिए खास तरह की clips  होती थी ।आम भाषा में  उन्हें बक्सू कहते थे । उसे कमर को कसा जा सकता था। 

मैं अपने बचपन की बात कर रहा हूं सन 1950 के आसपास के समय की । वह जमाना रेडीमेड कपड़ों का नहीं था तब हर गली में हर सड़क में दर्जियों की दुकान हुआ करती थी सस्ती और महंगी और आपके पसंद के हिसाब से वह पॉकेट कर के बकसू या सस्पैंडर के लिए बटन इत्यादि बनाते थे।

गैलिस का फायदा यह था कि आजकल जिस तरह बेल्ट से कस के पैन्ट बांधने से पेट में कसाव पैदा होता है वह नहीं होता था और स्वास्थ्य के लिए काफी अच्छा था क्योंकि कहते हैं कि जो लोग कस के पेटी बांधते हैं उनको शरीर की कई पेट संबंधी समस्या हो सकती है । कस के बेल्ट बांधने के बाद जब आप बैठते हैं खासकर खाना खाने के लिए तब काफी समस्या पैदा हो जाती है और आप बेल्ट को  ढीली करने लगते हैं । ऐसे ही दिन में बहुत देर से अगर आपने खाना ना खाया हो तो पेट पिचक जाता है और आपको बेल्ट को और कसना पड़ता है क्योंकि पेंट नीचे को खसकने लगती है । सस्पैंडर के साथ यह प्रॉब्लम नहीं था क्योंकि सस्पैंडर को कब्र में बटन में बांधकर ऊपर कंधे में ले जाया जाता था तो हमेशा पेंट करने से लटकने की वजह से सही जगह पर रहती थी और नीचे का शक्ति नहीं थी चाहे कितनी ही ढली हो

1950 की दशक में सस्पैंडर का रिवाज बहुत कम हो गया और उद्देश्य 60 के दशक तक कहीं दिखाई दे देता था। 

ऑनलाइन खरीदारी अब काफी होने लगी है और फ्लिपकार्ट अमेजॉन जैसे कई ऑनलाइन सप्लायर हर तरह की चीज सही दाम पर आपको देने के लिए मौजूद है । तो एक बार फिर लोगों का ध्यान सस्पैंडर्स की तरफ जा रहा है क्योंकि यहां सही दाम में ऑनलाइन मिल जाते हैं आसानी से ।

मैंने भी सस्पैंडर का इस्तेमाल शुरू कर दिया है और काफी सुरक्षा और अच्छा महसूस कर रहा हूं ।

शायद आप भी सस्पैंडर्स यानी गैलिस का इस्तेमाल करना चाहेंगे खासकर अगर आपकी घड़े  जैसी तोंद है और पैंट बार-बार नीचे खिसक जाती है है जिसे ऊपर को खींचने पड़ता है।

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Thursday, 21 July 2022

Unilateral Love

UNILATERAL LOVE (a poem)

He was given no choice,
 when he heard her  voice ,
"can't marry you" was  the sneer,
And he could no longer bear,
 the agony of the truth,
 "what use is your youth?"
 His inner voice asked in pain,
 and he felt a terrible strain,
 in his memory rolled his life,
 His love, his struggle and strife,
"I will jump down to my death"
 he told her under his breath
 "I have heard many giving such call 
why don't you just go and fall" 
she told him and he beat a retreat,
and went up the stair 30 feet,
And came down in a free fall 
some thirty feet down in all
He fell on bicycle old tyre pile,
And bounced to ground in Circus style,
"God decided to save my life
 so that you could be my wife"
 shouting this he ran up to her,
She heard his story but did not stir,
Thirty feet and saved by tyre
You must be a lousy liar,
If you cannot keep your vows,
You don't deserve to be my spouse.

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Monday, 4 July 2022

गधों की बातें

दुनिया में सबसे अच्छा बासमती चावल देहरादून का होता है और सबसे अच्छे अमरूद प्रयागराज के होते हैं । वैसे ही दुनिया में सबसे अच्छे गधे इंग्लैंड के हार्टफोर्डशायर के होते हैं । बाहर के देशों में गधे की बहुत इज्जत है । फिल्में भी बन चुकी है गधों से ऊपर ।

 भारत के गधों को कभी भी ज्यादा सम्मान नहीं मिला । और सच पूछे तो अपमान ही  मिला है । हम बचपन से सुनते आते हैं  "गधा कहीं का. सवाल गलत कर दिया" या "तेरे जैसा गधा नहीं देखा" ।

 इतिहासकार हमें बताते हैं कि प्राचीन मिस्र में भी गधों की बहुत इज्जत थी और आर्कियोलॉजिस्ट की खुदाई  में पता चला है कि गधों को भी दफनाया जाता था इज्जत के साथ ।  इस लिंक पर आपको काफी बातें पता चल जाएंगी ।

https://www.google.co.in/amp/s/www.downtoearth.org.in/hindistory/wildlife-biodiversity/forest/amp/world-donkey-day-read-the-interesting-history-of-donkey-64408?espv=1

भारत पर अगर  गधे की भावना कोई समझता हो तो ऐसा सिर्फ एक ही आदमी था जिसका नाम था कृष्ण चंदर । कृष्ण चंदर ने गधे पर दो किताबें लिखी - एक का नाम था  " एक गधे की आत्मकथा" और दूसरे का नाम था   "एक गधे की वापसी" । कृष्ण चंद्र जी ने इस खूबसूरती से गधे के बारे में लिखा मानो वह गधे के दिमाग में होने वाले विचारों को पढ़ रहे हो । 

गधे पर कहावते भी खूब बनी है हिंदी में । जैसे      धोबी का गधा का घर का ना घाट का  या फिर   "ऐसे गायब हो गए जैसे गधे के सिर पर सींग" । "अपने फायदे के लिए गधे को बाप बनाना" या फिर "अच्छे-अच्छे गधों को इंसान बना दिया तुम क्या चीज हो" बगैरह ।

आपको यह जान कर खुशी होगी कि 8 मई को विश्व गधा दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

Tuesday, 28 June 2022

वह भी एक जमाना था

 एक  जमाना वह भी था जब लोग घी खरीदते समय हधेली के उल्टी तरफ घी रगड़ कर उसकी मिलावट का पता लगा लेते थे।

एक जमाना वह भी था जब लोग कपड़े के थान के एक कोने को रगड़ का उसकी quality का पता लगा लेते थे।

एक जमाना था जब लोग गेहूं की बोरी ले कर पंचक्की जाते थे आटा पिसाने के लिए । 
बाजार में पनचक्की के ऊपर चुक्क चुक्क चुक्क चुक्क की आवाज होती रहती थी।

एक जमाना वह भी था जब किसी भी चीज के पैकेट में उसके दाम नहीं लिखे होते थे। उस जमाने में एलोपैथिक दवाइयों के अलावा किसी भी चीज में मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट भी नहीं लिखी होती थी। दुकानदारो की मौज होती थी।

एक जमाना हुआ करता था जब सुबह सुबह उठकर कोयले की अंगीठी जलानी होती थी पतली पतली लकड़ियों और कागज की मदद से।  फिर एक लोहे की पाइप को फूक फूक कर उसको सुलगाया जाता था।

तब कहीं जाकर सुबह की पहली कप चाय के लिए पानी तैयार होता था। उसी जमाने में काफी घरों में कुल्हाड़ियां होती थी लकड़ी की चीर फाड़ करके आग जलाने और खाना बनाने के लिये।

एक जमाना था जब अक्सर सड़क पर गधे की पीठ पर ढेर सारे कपड़े लादकर धोबी आता दिखाई देता था हर एक के घर पर। फिर धुले हुए कपड़े लिए जाते कॉपी मे चेक करके और इसी तरह गंदे कपड़े भी नोट करके दिए जाते। अक्सर कमीज और पेंट में बटन गायब होते और कभी-कभी तो कपड़ा ही गायब हो जाता था। उसी जमाने में लोगों का यह भी कहना था कि इम्तहान के लिए  पढ़ते वक्त अगर गधे के ढेचू ढेचू की आवाज सुनाई दे जाए तो वह सवाल इंतहान मे जरूर आता था।

उस जमाने में अगर आप रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर जाते थे तो दर्जनों होल्डॉल और काले रंग के टीन के बड़े बक्से साथ लेकर सफर करते हुए लोग दिखाई देते थे और उन्हें बाहर से अंदर ट्रेन तक ले जाने के लिए कुली को सिर्फ 25 पैसे मिलते थे। आजकल की नई पीढ़ी को तो पता भी नहीं होगा कि होल्डॉल क्या चीज होती है।

उसी जमाने में ज्यादातर लोग साइकिल में ही दफ्तर जाया करते थे। ज्यादातर बाबू लोग जब दफ्तर जाते थे तो उनके सिर पर  sola hat होती थी। या एक खास तरह की हॉट होती थी जिससे धूप से बहुत अच्छी तरह रक्षा होती थी सर की और यह करीब-करीब सभी दफ्तर जाने वाले बाबू और अफसरों के पास होती थी। 1960 के बाद पैदा हुए लोगों को तो पता भी नहीं होगा कि sola hat क्या होती है.

वह भी एक अजीबोगरीब जमाना था क्योंकि तब लोग अपने प्रिय जनों को फोन नहीं करते थे। लोग  परिचित लोगों को  चिट्टियां लिखा करते हाथ से और फिर उन्हें सड़क में जाकर या पोस्ट ऑफिस जाकर लाल रंग के लेटर बॉक्स में डालते थे।  हफ्ते में कई बार घर के बाहर पोस्टमैन की आवाज सुनाई देती थी और जिसने सुनी वह दौड़ पड़ता था चिट्ठी को उठाने के लिए।

अजीबोगरीब जमाना था वह ।  कई मायने में बहुत अच्छा था और कई मामलौं में मुश्किल ।






Tuesday, 7 June 2022

पुराने लखनऊ की यादें

बरसों पहले एक उपन्यास पढ़ा था अंग्रेजी का । लेखिका थी Daphne du Maurier. उपन्यास का नाम था House on the strand. कहानी कुछ इस तरह थी - एक आदमी कोई दवा खा लेता है और उसे खा कर कई दशक पहले के समय  में चला जाता है फिर वहां पर खेत दिखाई देते हैं जहां अब रेलवे स्टेशन  है । जहां पहले बैडमिंटन खेलता था  कहां पर से अब रेलवे लाइन  जाती है वगैरा-वगैरा  ।
 
जब हम सीनियर सिटीजन हो जाते हैं तो पीछे एक बहुत बड़ा समय छोड़ जाते हैं जिस समय शहर  कुछ फर्क था। आज लखनऊ के बारे में ऐसी ही कुछ बात करेंगे।

 लखनऊ का हजरतगंज तो बिल्कुल ही बदल गया है। आज से कई दशक पहले हजरतगंज में न तो इतनी मोटर कार थीं न मोटरसाइकिल और स्कूटर थे। हजरतगंज की सड़क पर कोई खास ट्रैफिक था ही नहीं । उस जमाने में लोग सड़क पर   gunjing किया करते थे आराम से टहलते हुए -  Benbows से मेफेयर तक और फिर रॉयल कैफे से वापस दूसरी तरफ से । कब हजरतगंज बहुत साफ-सुथरे  बिना भीड़ वाली मार्केट हुआ करती थी । देखिए एक पुरानी फोटो और एक नई फोटो में
और अब तो मेट्रो रेल लाइन आ जाने के बाद नजारा बिल्कुल ही बदल गया है हर जगह का । मेट्रो रेल लाइन के रूट पर हर जगह खंबे ही खंबे नजर आते हैं

आज से 50 साल पहले तक लखनऊ में शायद ही कोई बहुमंजिला इमारत हो पर अब तो हर जगह ऊंची ऊंची बिल्डिंग में ही नजर आती है मिसाल के तौर पर ले लीजिए रॉयल होटल चौराहा। जहां पर आजकल सचिवालय के बापू भवन  की बहुत बड़ी बिल्डिंग है
, रॉयल होटल चौराहे पर, वहाॅ पहले एक खूब लंबा दुमंजिला होटल हुआ करता था -रॉयल होटल।

 हुसैनगंज चौराहे पर भी एक दो मंजिला शानदार होटल का जिसका नाम था बर्लिंगटन होटल और उसी के नाम पर वह चौराहा पड़ा था । आजकल हुसैनगंज चौराहे पर जो एक बहुमंजिली इमारत है  विधायक निवासवहाॅ पर 1950 के दशक के अंत तक एक खूबसूरत एक मंजिल की इमारत थी जिसका नाम था ओल्ड काउंसिलर्स रेजिडेंस। वहाॅ  हरी हरी घास का एक बहुत बड़ा खूबसूरत सा बगीचा (lawn) भी था  फूलों से लदा। और हरी घास के बीच में एक शानदार सा फव्वारा था।

 हजरतगंज के बड़े चौराहे पर जहां आजकल बहुत बड़ा छंगामल का कपड़ों का शोरूम है वहाॅ कभी एक छोटा सा रेस्ट्रो हुआ करता था जिसका नाम था बेनबोस। दोनों तरफ खुलता हुआ वह रिस्ट्रो और बेकरी सफेद दाढ़ी वाले छरहरे बुजुर्ग सरदार जी की थी जो हमेशा सफेद चूड़ीदार पजामा और कुर्ता और सफेद पगड़ी पहने काउंटर के पीछे दिखाई देते थे। निहायत सज्जन और शानदार आदमी थे और उनकी कोकोनट cookie तो पूरे लखनऊ में प्रसिद्ध थी । वहां बैठकर चाय पीने का मजा ही कुछ और था और बैठे-बैठे आप दूर तक अशोक रोड पर चलते हुए ट्रैफिक को देख सकते थे ।

दिमाग तो आगे पीछे दौड़ता ही रहता है। हनुमान सेतु नाम का गोमती नदी के ऊपर का  यूनिवर्सिटी के पास का पुल साठ के दशक में बना था। उसके पहले यहां नीचा सा पुल था मंकी ब्रिज नाम का जिसके ऊपर से साइकिल चलाता हुआ मैं यूनिवर्सिटी जाता था।

  निशातगंज के चौराहे से आजकल के पॉलिटेक्निक के चौराहे को जाने वाली सड़क तो पचास के दशक मे गोरखपुर की ओर जाने वाली एक बहुत कम चौड़ी  सड़क थी और सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े बहुत पुराने पेड़ लगे थे। सड़क के दोनों तरफ दूर दूर तक खुला मैदान था। बादशाह नगर स्टेशन के पास कुछ छोटे-मोटे दुकानें थी। महानगर तो 50 के दशक के मध्य में बनना शुरू हुआ था।

1950 दशक मे अमीनाबाद एक साफ-सुथरी बहुत कम भीड़ वाली बाजार हुआ करती थी। बीच में बहुत बड़ा पार्क था जिस में धीरे धीरे रिफ्यूजी लोगों ने अपनी दुकानें बनाई । धीरे-धीरे पूरा पार्क गायब हो गया। 

आगे की बात करें तो 1976 तक गोमती नगर नाम की कोई चीज नही थी। यहां पर गांव हुआ करते थे मलेसा मऊ, उजरियाॅव, जग्गौर,  गौरी का पुरवा इत्यादि।  यही हाल इंदिरानगर वाली जगह का था जहां पहले गांव ही गांव थे।

आज के लिए इतना ही । फिर बात करेंगे लखनऊ के पुराने जमाने के बारे में।