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Thursday, 21 July 2022

Unilateral Love

UNILATERAL LOVE (a poem)

He was given no choice,
 when he heard her  voice ,
"can't marry you" was  the sneer,
And he could no longer bear,
 the agony of the truth,
 "what use is your youth?"
 His inner voice asked in pain,
 and he felt a terrible strain,
 in his memory rolled his life,
 His love, his struggle and strife,
"I will jump down to my death"
 he told her under his breath
 "I have heard many giving such call 
why don't you just go and fall" 
she told him and he beat a retreat,
and went up the stair 30 feet,
And came down in a free fall 
some thirty feet down in all
He fell on bicycle old tyre pile,
And bounced to ground in Circus style,
"God decided to save my life
 so that you could be my wife"
 shouting this he ran up to her,
She heard his story but did not stir,
Thirty feet and saved by tyre
You must be a lousy liar,
If you cannot keep your vows,
You don't deserve to be my spouse.

***

Monday, 4 July 2022

गधों की बातें

दुनिया में सबसे अच्छा बासमती चावल देहरादून का होता है और सबसे अच्छे अमरूद प्रयागराज के होते हैं । वैसे ही दुनिया में सबसे अच्छे गधे इंग्लैंड के हार्टफोर्डशायर के होते हैं । बाहर के देशों में गधे की बहुत इज्जत है । फिल्में भी बन चुकी है गधों से ऊपर

 भारत के गधों को कभी भी ज्यादा सम्मान नहीं मिला । और सच पूछे तो अपमान ही  मिला है । हम बचपन से सुनते आते हैं  "गधा कहीं का. सवाल गलत कर दिया" या "तेरे जैसा गधा नहीं देखा" ।

 इतिहासकार हमें बताते हैं कि प्राचीन मिस्र में भी गधों की बहुत इज्जत थी और आर्कियोलॉजिस्ट की खुदाई  में पता चला है कि गधों को भी दफनाया जाता था इज्जत के साथ ।  इस लिंक पर आपको काफी बातें पता चल जाएंगी ।

https://www.google.co.in/amp/s/www.downtoearth.org.in/hindistory/wildlife-biodiversity/forest/amp/world-donkey-day-read-the-interesting-history-of-donkey-64408?espv=1

भारत पर अगर  गधे की भावना कोई समझता हो तो ऐसा सिर्फ एक ही आदमी था जिसका नाम था कृष्ण चंदर । कृष्ण चंदर ने गधे पर दो किताबें लिखी - एक का नाम था  " एक गधे की आत्मकथा" और दूसरे का नाम था   "एक गधे की वापसी" । कृष्ण चंद्र जी ने इस खूबसूरती से गधे के बारे में लिखा मानो वह गधे के दिमाग में होने वाले विचारों को पढ़ रहे हो । 

गधे पर कहावते भी खूब बनी है हिंदी में । जैसे      धोबी का गधा का घर का ना घाट का  या फिर   "ऐसे गायब हो गए जैसे गधे के सिर पर सींग" । "अपने फायदे के लिए गधे को बाप बनाना" या फिर "अच्छे-अच्छे गधों को इंसान बना दिया तुम क्या चीज हो" बगैरह ।

आपको यह जान कर खुशी होगी कि 8 मई को विश्व गधा दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

Tuesday, 28 June 2022

वह भी एक जमाना था

 एक  जमाना वह भी था जब लोग घी खरीदते समय हधेली के उल्टी तरफ घी रगड़ कर उसकी मिलावट का पता लगा लेते थे।

एक जमाना वह भी था जब लोग कपड़े के थान के एक कोने को रगड़ का उसकी quality का पता लगा लेते थे।

एक जमाना था जब लोग गेहूं की बोरी ले कर पंचक्की जाते थे आटा पिसाने के लिए । 
बाजार में पनचक्की के ऊपर चुक्क चुक्क चुक्क चुक्क की आवाज होती रहती थी।

एक जमाना वह भी था जब किसी भी चीज के पैकेट में उसके दाम नहीं लिखे होते थे। उस जमाने में एलोपैथिक दवाइयों के अलावा किसी भी चीज में मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट भी नहीं लिखी होती थी। दुकानदारो की मौज होती थी।

एक जमाना हुआ करता था जब सुबह सुबह उठकर कोयले की अंगीठी जलानी होती थी पतली पतली लकड़ियों और कागज की मदद से।  फिर एक लोहे की पाइप को फूक फूक कर उसको सुलगाया जाता था।

तब कहीं जाकर सुबह की पहली कप चाय के लिए पानी तैयार होता था। उसी जमाने में काफी घरों में कुल्हाड़ियां होती थी लकड़ी की चीर फाड़ करके आग जलाने और खाना बनाने के लिये।

एक जमाना था जब अक्सर सड़क पर गधे की पीठ पर ढेर सारे कपड़े लादकर धोबी आता दिखाई देता था हर एक के घर पर। फिर धुले हुए कपड़े लिए जाते कॉपी मे चेक करके और इसी तरह गंदे कपड़े भी नोट करके दिए जाते। अक्सर कमीज और पेंट में बटन गायब होते और कभी-कभी तो कपड़ा ही गायब हो जाता था। उसी जमाने में लोगों का यह भी कहना था कि इम्तहान के लिए  पढ़ते वक्त अगर गधे के ढेचू ढेचू की आवाज सुनाई दे जाए तो वह सवाल इंतहान मे जरूर आता था।

उस जमाने में अगर आप रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर जाते थे तो दर्जनों होल्डॉल और काले रंग के टीन के बड़े बक्से साथ लेकर सफर करते हुए लोग दिखाई देते थे और उन्हें बाहर से अंदर ट्रेन तक ले जाने के लिए कुली को सिर्फ 25 पैसे मिलते थे। आजकल की नई पीढ़ी को तो पता भी नहीं होगा कि होल्डॉल क्या चीज होती है।

उसी जमाने में ज्यादातर लोग साइकिल में ही दफ्तर जाया करते थे। ज्यादातर बाबू लोग जब दफ्तर जाते थे तो उनके सिर पर  sola hat होती थी। या एक खास तरह की हॉट होती थी जिससे धूप से बहुत अच्छी तरह रक्षा होती थी सर की और यह करीब-करीब सभी दफ्तर जाने वाले बाबू और अफसरों के पास होती थी। 1960 के बाद पैदा हुए लोगों को तो पता भी नहीं होगा कि sola hat क्या होती है.

वह भी एक अजीबोगरीब जमाना था क्योंकि तब लोग अपने प्रिय जनों को फोन नहीं करते थे। लोग  परिचित लोगों को  चिट्टियां लिखा करते हाथ से और फिर उन्हें सड़क में जाकर या पोस्ट ऑफिस जाकर लाल रंग के लेटर बॉक्स में डालते थे।  हफ्ते में कई बार घर के बाहर पोस्टमैन की आवाज सुनाई देती थी और जिसने सुनी वह दौड़ पड़ता था चिट्ठी को उठाने के लिए।

अजीबोगरीब जमाना था वह ।  कई मायने में बहुत अच्छा था और कई मामलौं में मुश्किल ।






Tuesday, 7 June 2022

पुराने लखनऊ की यादें

बरसों पहले एक उपन्यास पढ़ा था अंग्रेजी का । लेखिका थी Daphne du Maurier. उपन्यास का नाम था House on the strand. कहानी कुछ इस तरह थी - एक आदमी कोई दवा खा लेता है और उसे खा कर कई दशक पहले के समय  में चला जाता है फिर वहां पर खेत दिखाई देते हैं जहां अब रेलवे स्टेशन  है । जहां पहले बैडमिंटन खेलता था  कहां पर से अब रेलवे लाइन  जाती है वगैरा-वगैरा  ।
 
जब हम सीनियर सिटीजन हो जाते हैं तो पीछे एक बहुत बड़ा समय छोड़ जाते हैं जिस समय शहर  कुछ फर्क था। आज लखनऊ के बारे में ऐसी ही कुछ बात करेंगे।

 लखनऊ का हजरतगंज तो बिल्कुल ही बदल गया है। आज से कई दशक पहले हजरतगंज में न तो इतनी मोटर कार थीं न मोटरसाइकिल और स्कूटर थे। हजरतगंज की सड़क पर कोई खास ट्रैफिक था ही नहीं । उस जमाने में लोग सड़क पर   gunjing किया करते थे आराम से टहलते हुए -  Benbows से मेफेयर तक और फिर रॉयल कैफे से वापस दूसरी तरफ से । कब हजरतगंज बहुत साफ-सुथरे  बिना भीड़ वाली मार्केट हुआ करती थी । देखिए एक पुरानी फोटो और एक नई फोटो में
और अब तो मेट्रो रेल लाइन आ जाने के बाद नजारा बिल्कुल ही बदल गया है हर जगह का । मेट्रो रेल लाइन के रूट पर हर जगह खंबे ही खंबे नजर आते हैं

आज से 50 साल पहले तक लखनऊ में शायद ही कोई बहुमंजिला इमारत हो पर अब तो हर जगह ऊंची ऊंची बिल्डिंग में ही नजर आती है मिसाल के तौर पर ले लीजिए रॉयल होटल चौराहा। जहां पर आजकल सचिवालय के बापू भवन  की बहुत बड़ी बिल्डिंग है
, रॉयल होटल चौराहे पर, वहाॅ पहले एक खूब लंबा दुमंजिला होटल हुआ करता था -रॉयल होटल।

 हुसैनगंज चौराहे पर भी एक दो मंजिला शानदार होटल का जिसका नाम था बर्लिंगटन होटल और उसी के नाम पर वह चौराहा पड़ा था । आजकल हुसैनगंज चौराहे पर जो एक बहुमंजिली इमारत है  विधायक निवासवहाॅ पर 1950 के दशक के अंत तक एक खूबसूरत एक मंजिल की इमारत थी जिसका नाम था ओल्ड काउंसिलर्स रेजिडेंस। वहाॅ  हरी हरी घास का एक बहुत बड़ा खूबसूरत सा बगीचा (lawn) भी था  फूलों से लदा। और हरी घास के बीच में एक शानदार सा फव्वारा था।

 हजरतगंज के बड़े चौराहे पर जहां आजकल बहुत बड़ा छंगामल का कपड़ों का शोरूम है वहाॅ कभी एक छोटा सा रेस्ट्रो हुआ करता था जिसका नाम था बेनबोस। दोनों तरफ खुलता हुआ वह रिस्ट्रो और बेकरी सफेद दाढ़ी वाले छरहरे बुजुर्ग सरदार जी की थी जो हमेशा सफेद चूड़ीदार पजामा और कुर्ता और सफेद पगड़ी पहने काउंटर के पीछे दिखाई देते थे। निहायत सज्जन और शानदार आदमी थे और उनकी कोकोनट cookie तो पूरे लखनऊ में प्रसिद्ध थी । वहां बैठकर चाय पीने का मजा ही कुछ और था और बैठे-बैठे आप दूर तक अशोक रोड पर चलते हुए ट्रैफिक को देख सकते थे ।

दिमाग तो आगे पीछे दौड़ता ही रहता है। हनुमान सेतु नाम का गोमती नदी के ऊपर का  यूनिवर्सिटी के पास का पुल साठ के दशक में बना था। उसके पहले यहां नीचा सा पुल था मंकी ब्रिज नाम का जिसके ऊपर से साइकिल चलाता हुआ मैं यूनिवर्सिटी जाता था।

  निशातगंज के चौराहे से आजकल के पॉलिटेक्निक के चौराहे को जाने वाली सड़क तो पचास के दशक मे गोरखपुर की ओर जाने वाली एक बहुत कम चौड़ी  सड़क थी और सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े बहुत पुराने पेड़ लगे थे। सड़क के दोनों तरफ दूर दूर तक खुला मैदान था। बादशाह नगर स्टेशन के पास कुछ छोटे-मोटे दुकानें थी। महानगर तो 50 के दशक के मध्य में बनना शुरू हुआ था।

1950 दशक मे अमीनाबाद एक साफ-सुथरी बहुत कम भीड़ वाली बाजार हुआ करती थी। बीच में बहुत बड़ा पार्क था जिस में धीरे धीरे रिफ्यूजी लोगों ने अपनी दुकानें बनाई । धीरे-धीरे पूरा पार्क गायब हो गया। 

आगे की बात करें तो 1976 तक गोमती नगर नाम की कोई चीज नही थी। यहां पर गांव हुआ करते थे मलेसा मऊ, उजरियाॅव, जग्गौर,  गौरी का पुरवा इत्यादि।  यही हाल इंदिरानगर वाली जगह का था जहां पहले गांव ही गांव थे।

आज के लिए इतना ही । फिर बात करेंगे लखनऊ के पुराने जमाने के बारे में।

Tuesday, 10 May 2022

1950 and NOW

A comparative studies of 1950 and 2022. 

In 1950 the writing instruments were fountain pen and nib-holder pens. Both have disappeared from daily usage and so have the blotting papers used for absorbing extra ink. Also missing is the carbon paper used for making copy of a letter. We have photostat machines in use now. Also missing is the special copying pencil which was used for making several copies of a letter with the use of carbon papers.

 In 1950 we had electric bulbs with filament which consumed lot of power. They had also a  short life Those bulbs have disappeared and have been replaced by power saving long lasting LED bulbs.

 In 1950 everybody was wearing cotton. In 2022 cotton has become expensive and gone out of reach of common man and we have dress made of artificial fibre. Artificial fibre has also replaced wool in winter clothing.

 In 1950 there were very few residential telephone.  Telephone  was an expensive luxury item.Telephone has now become wireless and mobile. It has become so common and cheap that even daily wage labourer owns a mobile phone. 

Short wave and medium wave radios have disappeared from the market. also missing are gramaphones, radiograms, tape recorder, cheaper cameras, audio and video cassette players. you can add many more items to the list.

In  1950 the  distant communication in written mode was by a letter posted in the post office. This has been almost totally replaced by letters written over electronic media and received instantly whatever the distance. Person born in 21st century may not be have seen a telegram or written a letter to their family or friends.

in 1950 watching cinema was limited to cinema halls. you can now watch a movie on your mobile phone at any time of the day. Also missing is the experience of watching a movie on huge 70 mm screen in the single screen cinema hall. Small multiplexes have replaced those grand cinema halls.

In 1950s smoking a cigarette was almost a fashion statement and cultural necessity for a  modern young man. Even doctors recommended smoking  in cigarette advertisements. It is no longer so. In fact cigarette smoking is considered a very bad social habit and a serious health hazard.

In 1950 for storing  100 movies  a big room was required.  Now you can you store more than a thousand films on a tiny microchip memory card of the size of a human nail.

Medical science has taken such a leap forward that surgeries which were very complicated have become very simple . For example a cataract eye surgery that required many days of hospitalization and a complicated procedure has become so simple that the replacement of an eye lense with an artificial one takes barely twenty minutes and no hospitalisation is required.

These are just a few examples of how the world has changed the last  few  decades. There are so many more.

***

Thursday, 5 May 2022

वह आता

वह आता
दो टूक कलेजे के करता zebra पथ पर आता।
 पेट-पीठ मिलकर हैं एक,
 चल रहा बोझा ले के , 
मुट्ठी भर दाने को
नहीं है खाने को , 
फटी-पुरानी पतलून में घुटने छिपाता ।
 दो टूक कलेजे के करता zebra पथ पर आता। 
साथ दो झोले भी हैं सदा हाथ मे उठाए,
 बाएं झोले मैं है पुराने कपड़े दाएं में अखबार
 रद्दी बेचकर कुछ पाने को 
वह आता
 दो टूक कलेजे के करता सड़क पार कर आता।

Wednesday, 13 April 2022

फैशन के शिकंजे

फैशन के शिकंजे

जब मैं बीए में पढ़ रहा था तो पैंट की मोहरी बहुत चौड़ी होती थी , करीब 24 इंच की। तो मेरी सभी पैंट की मोहरी चौबीस इंच की थी । उसके बाद अचानक फैशन  बदल गया और 16 इंच की मोहरी आ गई। सब पैंट बेकार हो गई।

तब मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ता था ।  पुरानी हरक्यूलिस साइकिल थी मेरे पास । तो साइकिल उठाई और अमीनाबाद पहुंच गए।  दो पैंट के कपड़े खरीदे और दो शर्ट के,  क्योंकि शर्ट की कॉलर भी चेंज हो गई थी ।

वहां से नजीराबाद रोड पर आ गए और कैसरबाग चौराहे के नजदीक

 टेलर्स की दुकान में जाकर अपनी पेंट और शर्ट की नाप दे दी और उसे बता दिया मोहरी के बारे में , पैंट की प्लीट्स, पैंट के लूप्स के बारे में, और कमीज के कॉलर के बारे में ।

 पैंट की सिलाई ₹ 4 और कमीज की सिलाई ₹2 पड़ी। टेलर मास्टर दे रसीद काट दी और जेब में रसीद रखकर वापस  चल दिया पैडल मारते हुए।

 चार दिन के बाद जब शर्ट की डिलीवरी लेने पहुंचा तो दोनों पैंट और शर्ट तैयार थी । जब पैसा दे रहा था तो बगल में एक सज्जन खड़े थे। करीब पचास साल के होंगे। अचानक वो बोल उठे "क्यों भाई  सबसे कमीज के ₹1 25 पैसा लेते हो और पैंट के  ₹3 50 तो इन student  ज्यादा क्यों ले रहे हो ।

टेलर मास्टर में जवाब दिया,  "साहब  इनके  नखरे बहुत है तो मेहनत  पड़ती है कटिंग करने और सिलने में इसलिए"।

 मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी । जैसे ही वह सज्जन सीढ़ियों से उतर के बाहर चले गए मैंने उससे कहा "क्यों भाई मुझसे ज्यादा पैसा क्यों ले रहे हो। गलत बात है "

टेलर मास्टर  उस्ताद था । पलट कर बोला "साहब यह बुड्ढे लोग क्या जाने फिटिंग क्या होती है और फैशन क्या होता है। इनको तो किसी तरह भी काट के कपड़े पहना दो ठीक है। आपके साथ मुझे बहुत कायदे से कटिंग करनी पड़ती है हर चीज का ध्यान रखता होता है क्योंकि आप फैशन के पारखी हैं।" 

 अपनी तारीफ सुनकर मेरी तबीयत खुश हो गई और मैं कपड़े लेकर हरकुलिस साइकिल के  पेडल मारता हुआ वापस रवाना हो गया।

 अब सोचता हूं कि यह फैशन इंडस्ट्री वाले पब्लिक को किस तरह से नये कपड़े खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। Teenage  युवा वर्ग अपनी आइडेंटिटी से जूझ रहा होता है और उसे इमोशनली ब्लैकमेल करना बहुत आसान है तो यह उसी युवा वर्ग को टारगेट करते हुए अपने इंडस्ट्री को आगे बढ़ाते हैं और उनके दिमाग में यह बैठा देते हैं कि पुराने फैशन के कपड़े बदलो। पुराने फैशन के कपड़ों में तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं है ।

मेरा अच्छे खासे कपड़ों को बर्बाद करने का
सिलसिला आगे भी चला। जब बेल बॉटम पैंट्स आ गई और कुत्ते के कान वाली (dog collar) कमीज तो दिल्ली में मैंने अपने टेलर के पास नए कपड़े ले जाकर कुत्ते के कान वाली शर्ट और लहराती हुई 24 इंच मोहरी की पैंट सिलाई तब जाकर तसल्ली हुई।

अस्सी का दशक आते-आते मैंने फैशन के साथ समझौता कर लिया और 18 इंच की मोहरी पर तब से टिका हुआ हूं इसी तरह  कॉलर पर भी समझौता कर दिया और कालर न तो बहुत लंबी है और ना ही बहुत छोटी।

कल सामने सड़क पर कुछ लड़कों को जाते देखा कॉलेज की ओर । उनमें से कुछ तो बहुत ज्यादा फैशन वाले लगते थे और उनकी पेंट की सिलाई कुछ इस तरह की थी कि बेचारे ठीक से चल नहीं पा रहे थे बैठने की तो बात ही मत कीजिए । 
मुझे अपना विद्यार्थी जीवन याद आ गया।  यह उमर ही ऐसी होती है।

Tuesday, 8 March 2022

जमाना बदल गया है

जमाना बदल गया है

जब आप बचपन को बहुत पीछे छोड़ जाते हैं और फिर मुड़कर देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि अरे कभी ऐसा भी था। वही हाल मेरा भी है । जब दिमाग के घोड़े पुराने समय की तरफ दौड़ते हैं तो पुराने समय को याद कर कर बहुत आश्चर्य होता है।

  मिसाल के तौर पर  बचपन में हम होल्डर पेन से लिखा करते थे । उसमें G निब लगाकर। ink pot में बार-बार कलम को भी डोबते  थे । तब सपने में भी नहीं सोचा था कि एक ऐसी कलम होगी जिसमें स्याही नहीं भरनी पड़ेगी बार-बार,  और उससे लिखते जाएंगे । पहले फाउंटेन पेन हाथ आई जिसमें inkpot से छुटकारा मिल गया और फिर ball pen आ गई स्याही का झंझट ही खत्म हो गया।

  उस जमाने की एक और चीज बिल्कुल ही गायब हो चुकी है और वह है रेडियो।  पहले रेडियो आया था । फिर ट्रांजिस्टर रेडियो आया जिसको लेकर आप कहीं भी घूम सकते थे । फिर दोनों ही गायब हो गए । 

 एक और चीज गायब हो गई है और वह है टिंचर आईडीन । जी हां, जब चोट लगती थी, कहीं पैर में कट जाता था, खून बहता था, तो सफाई करके उसके ऊपर रुई के फाहे से टींचर आईडीन लगा दी जाती थी - कत्थई रंग की liquid.  लगाने के बाद उछलने लगते थे क्योंकि दर्द होता था चरपराहट होती थी लगने पर । 

 एक और चीज जो बिल्कुल गायब हो गई है वह है पर्दे खसखस के । गर्मियों के दिनों में खिड़की दरवाजों में खसखस के पर्दे लगाकर उनके ऊपर पानी छिड़का करते थे लू से बचाव के लिए, कमरे में ठंडक लाने के लिए। अब तो कहीं भी नहीं दिखाई देते।

चाबी देने वाली घड़ी भी गायब हो चुकी है चाहे वह टेबल क्लॉक हो या रिस्ट वॉच । सब घड़ी आजकल तो बैटरी से चलती है।  एक जमाना था जब रात को सोने से पहले लोग घड़ी उतार देते थे उसमें चाबी भरते थे और चारपाई के बगल वाली मेज पर रख देते थे सोने से पहले। अब तो बहुत से लोगों ने घड़ी पहनना ही छोड़ दिया है क्योंकि हाथ में मोबाइल है उसी में घड़ी भी है उसी में केलकुलेटर भी है उसी में और भी हैं कई छोटी मोटी चीजें ।

एक और चीज जो गायब हो चुकी हैं उनका भी जिक्र कर देता हूं और वह है सोला हैट (Sola hat) जो 1950 के दशक तक काफी  इस्तेमाल होती थी धूप से बचने के लिए । 

Gallice याने सस्पैंडर जो पेंट में इस्तेमाल होता था पेंट को नीचे खसकने से रोकने के लिए, वह भी गायब हो गया उसके बारे में तो खैर आपको पता ही नहीं होगा कि क्या चीज होती थी वह । आजकल तो सब जगह बेल्ट का ही इस्तेमाल होता है।

लोगों के घरों से खासकर उत्तरी भारत में सिलबट्टे भी गायब हो चुके हैं जो मसाला पीसने के काम आते थे । अब या तो मिक्सी में मसाले पीसे जाते हैं या फिर बने बनाए बाजार में मिल जाते हैं। इसके अलावा शहरों में ईटें से बनने वाले मिट्टी के चूल्हे जिनपर लकड़िया जलती थी वह भी रसोई घर से गायब हो चुके हैं। सब जगह लाल रंग का सिलेंडर आ गया है जो साठ के दशक के पहले कहीं नहीं था। तब मकानों के रसोईघर के ऊपर चिमनी हुआ करती थी जिसमें से रसोई घर का धुआं निकलता था । पुराने जमाने की फोटो में शहरों में आप ऐसी ढेर सारी चिमनी देखेंगे । अब ना धुआं  है ना चिमनी है।

और भी बहुत कुछ है पर फिर कभी।

Monday, 7 March 2022

यूनिवर्सिटी की बातें

 यूनिवर्सिटी की बातें

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और लखनऊ यूनिवर्सिटी इन दोनों जगह का हॉस्टल में रहने का अनुभव है मुझे पुराने जमाने में, जब विश्वविद्यालय में पॉलिटिक्स कम और पढ़ाई ज्यादा होती थी , जब हॉस्टल में असामाजिक तत्व नहीं रहते थे ।

लखनऊ यूनिवर्सिटी और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में रहने का सबसे बड़ा फर्क यह है की इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सभी हॉस्टल जिस एरिया में थे वहां पर बहुत बड़ी बाजार हुआ करती थी कटरा की तो वहां रहना बड़ा सुविधाजनक होता था । बाहर खाने का मन हुआ तो भट्ट जी की दुकान पर चले गए और चाय बंद मक्खन का नाश्ता हो गया। दिन में बाहर खाने का मन किया तो चार कदम पर जगाती का रेस्तरां। सामान खरीदना हो तो चौराहे पर दुकान वहीं पास में । किताबें खरीदनी हो तो यूनिवर्सिटी रोड पर किताबों की बहुत सी दुकान थी । रात में सेकंड शो सिनेमा देखने का मन हुआ जो रात के 12:30 बजे तक चलता है तो यूनिवर्सिटी के पास ही लक्ष्मी टॉकीज सिनेमा हॉल । मतलब यह हुआ कि रहना बड़ा सुविधाजनक था । वही बगल में पान सिगरेट की दुकान भी और कटरा में बिल्कुल हॉस्टल के नजदीक एचडी पंत की टेलरिंग शॉप । कटरा चौराहे पर नेतराम हलवाई की प्रसिद्ध दुकान जहां संडे के दिन शाम का भोजन का प्रबंध हो जाता था पूरी और सब्जी का खाना ( हर संडे को शाम का खाना बाहर खाना होता था क्योंकि mess की छुट्टी होती थी) । सिविल लाइंस या चौक जाने का मन हो तो बाहर निकलते ही हॉस्टल के गेट पर रिक्शा मिल जाता था और  चार आने में सिविल लाइंस और 6 आने में चौक । प्रयाग स्टेशन भी नजदीक ही था । कहने का मतलब यह है कि सुविधाएं बहुत थी। हॉस्टल में भी एक से ज्यादा खाने के mess होते थे  और उनमें कंपटीशन की वजह से खाना ठीक ही मिल जाता था । और तो और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में हॉस्टल की एरिया में ही यूनिवर्सिटी का अस्पताल था जिसे डिस्पेंसरी कहा जाता था । एक बार जब बीमार पड़ा तो वही एडमिट हुआ और बहुत सुविधाजनक तरीके से इलाज हो गया । इलाहाबाद की तरह लखनऊ यूनिवर्सिटी में ऐसा अस्पताल नहीं था। अगर बीमार पढ़ो तो केजीएमसी मेडिकल कॉलेज जो वहां से मीलो दूर था वहां एडमिट होने के लिए जाओ।

अब आइए लखनऊ यूनिवर्सिटी की बात करते हैं। लखनऊ यूनिवर्सिटी के करीब करीब सभी हॉस्टल मेन रोड से बहुत ही दूर थे और मेन रोड पर भी कोई बाजार नहीं थी, न कोई सिनेमा हॉल था,  ना कोई टेलरिंग शॉप थी, ना ही कोई किताबों की दुकान थी।  किताब खरीदना हो तो कई किलोमीटर दूर भीड़ भड़ से भरी अमीनाबाद  मार्केट जाइए। सिनेमा देखना हो तो वो भी बहुत दूर कई किलोमीटर का रास्ता है । रोजमर्रा का सामान खरीदने का काम भी मुश्किल था । मैं आजकल की बात नहीं कर रहा हूं। मैं बात कर रहा हूं  60 साल पहले की। अगर लखनऊ यूनिवर्सिटी में मैं हॉस्टल में रह पाया तो सिर्फ इस वजह से कि मैं घर से साइकिल ले आया था। इसकी जरूरत  इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में नहीं पड़ी थी। उसी साइकिल में हजरतगंज अमीनाबाद हुसैनगंज नजीराबाद रोड सभी जगह जाता था।

आखिर में बात करते हैं हॉस्टल के वातावरण की - भाईचारे की,  सोशल एक्टिविटीज की । तो इस मामले में भी लखनऊ यूनिवर्सिटी के हॉस्टल इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के हॉस्टल से बहुत पीछे थे। इलाहाबाद में मैं जिस हॉस्टल में रहता था वहां हर साल जाड़ों में बहुत बड़ा सोशल फंक्शन होता था जिसमें शहर के बड़े बड़े लोग उपस्थित होते थे । लखनऊ यूनिवर्सिटी में ऐसा कुछ नहीं था। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में नए लड़कों की बड़ी तगड़ी होती थी रैगिंग। लेकिन इसका फायदा यह था कि इस के बाद हॉस्टल के सभी लोग एक दूसरे को अच्छी तरह जान जाते थे और एक परिवार की तरह रहते थे । लखनऊ यूनिवर्सिटी में ऐसा कुछ नहीं था ।हॉस्टल में बगल वाले कमरे में कौन है उससे हमें कोई मतलब नहीं रहता था सिर्फ अपने दोस्तों तक रहते थे।

यह सब पुरानी बातें हैं  । आजकल इलाहाबाद और लखनऊ यूनिवर्सिटी का क्या हाल है इसके बारे में वहां इस समय रहने वाले लड़के ही बता सकते हैं।

Sunday, 6 March 2022

VINTAGE RAILWAY TIMES

There was a time when trains had compact small  compartments instead of the longer  vestibule coaches of today with multiple cabins and a long running corridor

Railways used to have four categories of compartments -  first class, second class, third class and an inter class.  There were no air conditioned coaches. 

The first class compartment had  two very wide lower berths . One upper berth above one of the lower berths  and a  long rack for keeping hats above the other lower berth. Those were the days when every one first really the hat, usually a sola hat.In first class compartment window has three types of shutters - a glass shutter, a wooden shutter and a wire mesh shutter. The wire mesh shutter filtered the large particles of coal travelling from the steam engine

The second class had a total of six berths - two lower berths and two upper berth on the window sides and one lower berth and one upper berth on the third side. There was a bathroom on the fourth side.

The difference between third class and inter class was that in inter class there was some kind of very ordinary cushion  benches . Third class  benches were of plain hard wood.

There were no platform tickets until early fifties. Even when the platform ticket was introduced, most people would not buy them and would go inside after simply informing the ticket collector at the gate

In most bigger Railway stations the best book stall of the town used to be the A.H.Wheeler Book Stall at the railway station. In the City where I spent my childhood the A.H. Wheeler Book Stall at platform number one of the railway station was very big and it contained lot many paperback books, dozens of magazines and several newspapers.The main platform  was  long, wide and very clean. People used to visit the railway station to simply take an evening stroll on the almost empty  platform, watch an occasional train arriving or departing and spending time at the book stall. 

Bigger railway stations had separate vegetarian and non vegetarian restaurants. The crockery bore the name of the railways, waiters used to be in smart uniforms and the food was of a good quality.

In those days the results of major all India or state examinations were published in one of the newspapers. The results of provincial education boards final examinations used to be published in newspaper special editions . I remember when I gave my high school examination, the results were declared sometime towards the end of May and the evening railway train brought the newspapers containing the results . There was a massive crowd at the station that evening, all eagerly awaiting the arrival of the train carrying the newspapers.This special thick newspaper was priced at Rupee one each while the usual  daily newspapers was two Anna (twelve paise) each.

As soon as the newspapers arrived  there was a mad rush to buy a copy of the bulky newspaper.We bought a newspaper and after checking our results helped save one rupee of several poor students. One rupee of those days was almost equal to rupees one hundred and fifty of today.

Finally a word about the railway colonies . These clean and beautiful colonies were located at important Railway centres and had all categories of railway quarters, from very small ones for the lowest of the staff and  Bungalows with very big compounds for the top officials. Railway Colony used to be very well maintained. Every Railway. colony usually had two clubs - A Junior Institute for the staff and a Senior Institute for the officers. Railway Colony had their own Electric Supply at much cheaper rate than the rest of the city.

Those were the golden days of Indian Railways in every respect - punctuality of running train, cleanliness of compartments and waiting rooms , food in the restaurents and efficiency of the catering staff.

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