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Tuesday, 11 October 2022

बॉलीवुड की कुछ बातें

बॉलीवुड की कुछ बातें

एक बहुत पुरानी फिल्म जो याद आ रही है। वह है मिस्टर एंड मिसेज 55। इसमें गुरुदत्त मधुबाला ललिता पवार और  जॉनी वॉकर ने बहुत अच्छा काम किया था। दो छोटे कलाकार, जिन्होंने बाद में बहुत से लंबे अच्छे रोल किए , उन्होंने इस फिल्म में शायद पहली बार काम किया होगा । एक थे जगदीप जो फिल्म के शुरू में अखबार बेचते नजर आए सड़क पर।  और दूसरे थे सी एस दुबे  जिन्होंने एक डॉक्टर का बहुत छोटा सा रोल किया था इस फिल्म में।

 उसी जमाने में  हावड़ा ब्रिज भी देखी। इसमें ओम प्रकाश ने  अच्छा अभिनय कर दिखाया है। यह शायद हेलन की पहली फिल्म थी और इसमें "मेरा नाम चिन चिन चूं" पर डांस किया था जिसकी वजह से वह मशहूर हो गई। 

 एक और फिल्म थी 50 के दशक की "नई दिल्ली"। इसमें सभी कलाकारों का अच्छा काम था । इस फिल्म की खासियत इसका प्लॉट  था। इसमें सबसे बढ़िया एक्टिंग थी हास्य अभिनेता धूमल की जो किशोर कुमार का नकली बाप बना था।

 ललिता पवार  की फिल्म  "जंगली"  भी अपने जमाने की क्लासिक फिल्म थी। यह सायरा बानो की पहली फिल्म थी ।   इस फिल्म में बहुत स्वाभाविक अच्छी एक्टिंग की सायरा बानो ने और उसका पैर की चोट मे टिन्चर आयोडीन लगाने वाला सीन तो लाजवाब ही था। इसी फिल्म के एक गाने "चाहे कोई मुझे जंगली कहे" के शंखनाद "याहू" के साथ शम्मी कपूर भी इसी फिल्म से फिल्म जगत में छा गए। हमेशा की तरह ललिता पवार बहुत ही अच्छे रोल में नजर आई। इसी फिल्म में एक और कलाकार थे असित सेन, मोटे थुलथुले शरीर वाले। बहुत मंजे हुए कलाकार थे और बहुत सी फिल्मों में छोटे छोटे पर यादगार  काम करते थे। मिसाल के तौर में फिल्म "आनंद" में दवा खाने के शौकीन मरीज के रोल में, फिल्म "आरधना" में शर्मिला टैगोर के घर पर काम करने वाले एक कर्मचारी का और फिल्म "बंबई तो गोआ" में एक ढाबे के मालिक का।

1970 के दशक के बाद तो एक के बाद एक कई बढ़िया फिल्में देखने को मिली और अमोल पालेकर, मौसमी चटर्जी, उत्पल दत्त और कई और छोटे और अनजान कलाकारों का नए अंदाज में बहुत शानदार अभिनय देखने को मिला। यह सब फार्मूला फिल्म से फर्क फिल्में थी। 

फिल्म "अंगूर"  ही ले लीजिए। डायरेक्शन बहुत अच्छा था। मौसमी चटर्जी ने बहुत ही सुंदर स्वाभाविक काम किया है इसमें । वैसे तो इस फिल्म में सभी कलाकारों ने बहुत ही अच्छा काम किया । मिसाल के तौर पर जौहरी के किरदार में सी एस दुबे , उसके असिस्टेंट के रूप में युनुस परवेज़ और पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में कर्नल कपूर की एक्टिंग बहुत ही लाजवाब रही।

वह ऐसा दौर था जिसमें एक के बाद एक कई बहुत अच्छी फिल्में देखने को मिली जैसे "छोटी सी बात" ,  "बातों बातों मे"  ,  "गोलमाल" ,  "रंग बिरंगी",  "किसी से ना कहना",  "नरम गरम",   "दुल्हन वही जो पिया मन भाए"  "चश्मे बद्दूर"

इत्यादि ।


  इन फिल्मों की सफलता और लोकप्रियता के लिए न तो दिलीप कुमार की जरूरत पड़ी  ना तो देवानंद की,  ना राज कपूर की, ना किसी और सुपरस्टार की जो  किसी फिल्म की सफलता के लिए आवश्यक मारे जाते थे।

उस दौर के बाद भी कई और अच्छी फिल्म है आगे चलकर । 1997 की   "चाची 420" एक अलग तरह की फिल्म थी। उसके कुछ वर्षों  बाद  "हंगामा"  आई।  उसके कुछ वर्षों बाद   "जौली एलएलबी 2" ।

 अब जौली एलएलबी 2 को ही ले लीजिए इस में टॉप स्टार है अक्षय कुमार पर इसमें टॉप एक्टिंग है एक बहुत छोटे कलाकार की जिसका नाम सौरभ शुक्ला है और जिसने इस फिल्म में जज का रोल किया है।

मैं समझता हूं कि किसी फिल्म के अच्छी होने के लिए किसी सुपरस्टार की जरूरत नहीं  होती है।  जरूरत होती  है एक अच्छी पटकथा , एक अच्छे स्वाभाविक एक्टर की और एक अच्छे डायरेक्टर की। 
एक समस्या जरूर है और वह है कि अच्छी फिल्म व्यवसायिक रूप से सफल हो यह जरूरी नहीं है। इसीलिए कभी कभी कम लागत पर बनी हुई बहुत अच्छी क्वालिटी की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फेल हो जाती है। ऐसी फिल्मों की सफलता  इस बात पर निर्भर करती है कि ऐसी फिल्मों में  कुछ ऐसी चीजें डाल दी जाए जो सभी को पसंद हों।
कभी-कभी समझ में नहीं आता कि एक अच्छी फिल्म जिस पर सब तरह का मनोरंजन है फिर भी क्यों फेल कर जाती है अब इसका एक उदाहरण है फिल्म मुस्कुराहट है जिसका हीरो था एक अनजाना कलाकार जिसका नाम जय मेहता था. पिक्चर काफी अच्छी थी अमरीश पुरी का अभिनय उच्च कोटि का था और बाकी कलाकारों ने भी बहुत अच्छा काम किया था पर जाने क्यों बॉक्स ऑफिस पर चली नहीं।

वैसे देखा जाय तो फिल्मों के सुनहरे दिन खत्म हो चुके है। यह तो अब ना तो अब 70 mm के बड़े स्क्रीन वाले सिनेमा हाल हैं, न ही वह संगीतकार और गायक। तीस साल पहले आए शाहरुख खान अभी भी डटे हुए हैं क्योंकि अब सुपरस्टार्स का जमाना भी खत्म हो गया है और नए कलाकारों में वो बातें भी नहीं हैं ।

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Tuesday, 4 October 2022

बॉलीवुड के गुमनाम एक्टर

बॉलीवुड के गुमनाम अभिनेता

50 के दशक में मैने पिक्चर देखना शुरू किया था और तब के बड़े एक्टर होते थे देवानंद, राज कपूर और दिलीप कुमार और इनकी एक्टिंग की हर जगह तारीफ होती रहती थी।

अब तो काफी समय बीत गया है और सब कुछ बदल गया है । अब एक्टिंग के तरीके भी बदल गए हैं। तब ऐसा लगता था कि दिलीप कुमार गजब की एक्टिंग करता है पर अब ऐसा नहीं लगता है ।उसकी पुरानी पिक्चरों को देखकर लगता है स्वाभाविक एक्टिव नहीं है बल्कि कोरी डायलॉगबाजी है। देवानंद की एक्टिंग देखकर तो हंसी आती है। लटके झटके और उसका बोलने का तरीका बहुत बेतुका लगता है। हां  स्वाभाविक अंदाज़ राज कपूर का था कुछ हद तक।

 बहुत से ऐसे कलाकार हैं जिनकी कोई गिनती नहीं थी। वह बड़े कलाकारों से ज्यादा स्वाभाविक एक्टिंग करते थे। अब जब पुरानी पिक्चर  देखता हूं तो मुझे उन छोटे कलाकारों की एक्टिंग ज्यादा अच्छी लगती है। फिल्म रंगी बिरंगी में जावेद खान ने एक ब्लैक टिकट बेचने वाले की बहुत शानदार एक्टिंग की है उसी तरह एक मोटर गेराज के मालिक गुरनाम की शानदार एक्टिंग की है सीएस दुबे ने फिल्म छोटी सी बात में।

अंगूर में भी सीएस दुबे की एक्टिंग लाजवाब है जिसमें वह एक जेवर बनाने की दुकान का मालिक है और उसी फिल्म के एक और कलाकार ने बहुत शानदार एक्टिंग की है जिसका नाम युनुस परवेज़ है। युनुस परवेज़ ने फिल्म गोलमाल में भी बहुत अच्छी एक्टिंग की और उत्पल दत्त ने तो इस फिल्म में कमाल ही कर दिया है। 

छोटे-मोटे कलाकारों की बात आती है तो एस एन बनर्जी  का नाम भी सामने आता है । बहुत पुराने जमाने के एक्टर थे ।  फिल्म चलती का नाम गाड़ी में मधुबाला के पिताजी का किरदार निभाया था। इन्होंने  फिल्म किसी से ना कहना मैं दीप्ति नवल के मामाजी का रोल करने में कमाल दिखा दिया है। इसी तरह फिल्म जौली एलएलबी 2 मैं जज का रोल निभाते हुए सौरभ शुक्ला ने बड़े-बड़े एक्टरों की छुट्टी कर दी है। एक और नाम याद आ रहा है वह है अन्नू कपूर जो बहुत ही स्वाभाविक अच्छी एक्टिंग करते हैं इन्होंने फिल्म मिस्टर इंडिया में एक समाचार पत्र एडिटर का रोल किया है और फिल्म जौली एलएलबी 2 मूवी में भी एक वकील की बहुत ही शानदार एक्टिंग की है।

छोटे-मोटे रोल करने वाला एक और बढ़िया कलाकार है इफ्तेखार। इन्होंने सबसे ज्यादा किरदार निभाया है पुलिस के छोटे से बड़े  ओहदा के अफसर का। एक जमाने में यह पुलिस इंस्पेक्टर का रोल किया करते थे । बाद मैं इनकी  तरक्की हुई और कई फिल्म मैं यह पुलिस कमिश्नर के रूप में दिखाई दिए । ये एक बहुत स्वाभाविक एक्टर है दिलीप कुमार की तरह डायलॉगबाजी नहीं करते हैं देवानंद की तरह लटके झटकेभी नही। इनका बड़ा रोल फिल्म इत्तेफाक में था और फिल्म दुल्हन वही जो पिया मन भाए में भी बहुत लंबा रोल था इनका।

 कलाकार तो कहीं और है और सब का नाम भी तो याद नहीं है। हां डेविड और धूमल का नाम लेना भूल गया था। डेविड ने कई दशकों तक छोटे-छोटे बहुत अच्छे रोल किए जैसे फिल्म गोलमाल में अमोल पालेकर के डॉक्टर मामा बने थे और फिल्म बातों बातों में टीना मुनीम के अंकल।
धूमल ने भी फिल्म नई दिल्ली में किशोर कुमार के नकली पिताजी की बड़ी अच्छी एक्टिंग की है


औरतों की बात करें तो ललिता पवार और लीला मिश्रा का कोई जवाब नहीं था इनकी एक्टिंग इतनी  शानदार होती थी कि उसके ऊपर फिल्म के हीरो फीके पड़ जाते थे। फिल्म परिचय में लीला मिश्रा, फिल्म कथा में लीला मिश्रा, फिल्म मिस्टर एंड मिसेज 55 और अनाड़ी में ललिता पवार का कोई जवाब ही नहीं था। इसके अलावा दुर्गा खोटे भी मां के रूप में बहुत अच्छी लगती थी और बड़ी स्वाभाविक एक्टिंग करती थी।

हां एक और कलाकार याद आ रहा है । नाम है देव किशन। इस कलाकार ने करीब करीब सभी पिक्चरों में घर के एक स्थाई नौकर का रोल किया है जो खाना बनाता है और घर के लोगों की देखभाल करता है और जिसका नाम करीब करीब हर फिल्म में रामू काका है ।
इसे आप फिल्म चुपके चुपके के शुरू में गेस्ट हाउस के चौकीदार के रुप में, फिल्म आनंद में अमिताभ बच्चन के रसोईया के रूप में , फिल्म सीता और गीता में भी देख सकते हैं। और कई फिल्मो में भी। 

अब समय आ गया है कि इस तरह के कलाकारों का भी नाम याद किया जाए और इन्हें भी लाइफटाइम अवॉर्ड या नेशनल अवार्ड से संवारा जाए।

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Wednesday, 24 August 2022

सस्पैंडर्स और बेल्ट और आपकी पतलून

एक जमाने में पैंट को नीचे खिसकने से रोकने के लिए सस्पैंडर्स का इस्तेमाल होता था जिसे आम भाषा में उन दिनों गैलिस कहते थे । आप लोगों में से ज्यादातर लोग यह समझ नहीं पा रहे होंगे की गैलिस क्या चीज होती थी तो इसीलिए मैंने फोटो भी लगा दी है ।

उस जमाने में भी बहुत से लोग ऐसे होते थे जो गैलिस का इस्तेमाल नहीं करते थे तो उनके पैंट की कमर में दोनों तरफ दाहिने और बाऐं ओर  पैंट को कसने  के लिए खास तरह की clips  होती थी ।आम भाषा में  उन्हें बक्सू कहते थे । उसे कमर को कसा जा सकता था। 

मैं अपने बचपन की बात कर रहा हूं सन 1950 के आसपास के समय की । वह जमाना रेडीमेड कपड़ों का नहीं था तब हर गली में हर सड़क में दर्जियों की दुकान हुआ करती थी सस्ती और महंगी और आपके पसंद के हिसाब से वह पॉकेट कर के बकसू या सस्पैंडर के लिए बटन इत्यादि बनाते थे।

गैलिस का फायदा यह था कि आजकल जिस तरह बेल्ट से कस के पैन्ट बांधने से पेट में कसाव पैदा होता है वह नहीं होता था और स्वास्थ्य के लिए काफी अच्छा था क्योंकि कहते हैं कि जो लोग कस के पेटी बांधते हैं उनको शरीर की कई पेट संबंधी समस्या हो सकती है । कस के बेल्ट बांधने के बाद जब आप बैठते हैं खासकर खाना खाने के लिए तब काफी समस्या पैदा हो जाती है और आप बेल्ट को  ढीली करने लगते हैं । ऐसे ही दिन में बहुत देर से अगर आपने खाना ना खाया हो तो पेट पिचक जाता है और आपको बेल्ट को और कसना पड़ता है क्योंकि पेंट नीचे को खसकने लगती है । सस्पैंडर के साथ यह प्रॉब्लम नहीं था क्योंकि सस्पैंडर को कब्र में बटन में बांधकर ऊपर कंधे में ले जाया जाता था तो हमेशा पेंट करने से लटकने की वजह से सही जगह पर रहती थी और नीचे का शक्ति नहीं थी चाहे कितनी ही ढली हो

1950 की दशक में सस्पैंडर का रिवाज बहुत कम हो गया और उद्देश्य 60 के दशक तक कहीं दिखाई दे देता था। 

ऑनलाइन खरीदारी अब काफी होने लगी है और फ्लिपकार्ट अमेजॉन जैसे कई ऑनलाइन सप्लायर हर तरह की चीज सही दाम पर आपको देने के लिए मौजूद है । तो एक बार फिर लोगों का ध्यान सस्पैंडर्स की तरफ जा रहा है क्योंकि यहां सही दाम में ऑनलाइन मिल जाते हैं आसानी से ।

मैंने भी सस्पैंडर का इस्तेमाल शुरू कर दिया है और काफी सुरक्षा और अच्छा महसूस कर रहा हूं ।

शायद आप भी सस्पैंडर्स यानी गैलिस का इस्तेमाल करना चाहेंगे खासकर अगर आपकी घड़े  जैसी तोंद है और पैंट बार-बार नीचे खिसक जाती है है जिसे ऊपर को खींचने पड़ता है।

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Thursday, 21 July 2022

Unilateral Love

UNILATERAL LOVE (a poem)

He was given no choice,
 when he heard her  voice ,
"can't marry you" was  the sneer,
And he could no longer bear,
 the agony of the truth,
 "what use is your youth?"
 His inner voice asked in pain,
 and he felt a terrible strain,
 in his memory rolled his life,
 His love, his struggle and strife,
"I will jump down to my death"
 he told her under his breath
 "I have heard many giving such call 
why don't you just go and fall" 
she told him and he beat a retreat,
and went up the stair 30 feet,
And came down in a free fall 
some thirty feet down in all
He fell on bicycle old tyre pile,
And bounced to ground in Circus style,
"God decided to save my life
 so that you could be my wife"
 shouting this he ran up to her,
She heard his story but did not stir,
Thirty feet and saved by tyre
You must be a lousy liar,
If you cannot keep your vows,
You don't deserve to be my spouse.

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Monday, 4 July 2022

गधों की बातें

दुनिया में सबसे अच्छा बासमती चावल देहरादून का होता है और सबसे अच्छे अमरूद प्रयागराज के होते हैं । वैसे ही दुनिया में सबसे अच्छे गधे इंग्लैंड के हार्टफोर्डशायर के होते हैं । बाहर के देशों में गधे की बहुत इज्जत है । फिल्में भी बन चुकी है गधों से ऊपर ।

 भारत के गधों को कभी भी ज्यादा सम्मान नहीं मिला । और सच पूछे तो अपमान ही  मिला है । हम बचपन से सुनते आते हैं  "गधा कहीं का. सवाल गलत कर दिया" या "तेरे जैसा गधा नहीं देखा" ।

 इतिहासकार हमें बताते हैं कि प्राचीन मिस्र में भी गधों की बहुत इज्जत थी और आर्कियोलॉजिस्ट की खुदाई  में पता चला है कि गधों को भी दफनाया जाता था इज्जत के साथ ।  इस लिंक पर आपको काफी बातें पता चल जाएंगी ।

https://www.google.co.in/amp/s/www.downtoearth.org.in/hindistory/wildlife-biodiversity/forest/amp/world-donkey-day-read-the-interesting-history-of-donkey-64408?espv=1

भारत पर अगर  गधे की भावना कोई समझता हो तो ऐसा सिर्फ एक ही आदमी था जिसका नाम था कृष्ण चंदर । कृष्ण चंदर ने गधे पर दो किताबें लिखी - एक का नाम था  " एक गधे की आत्मकथा" और दूसरे का नाम था   "एक गधे की वापसी" । कृष्ण चंद्र जी ने इस खूबसूरती से गधे के बारे में लिखा मानो वह गधे के दिमाग में होने वाले विचारों को पढ़ रहे हो । 

गधे पर कहावते भी खूब बनी है हिंदी में । जैसे      धोबी का गधा का घर का ना घाट का  या फिर   "ऐसे गायब हो गए जैसे गधे के सिर पर सींग" । "अपने फायदे के लिए गधे को बाप बनाना" या फिर "अच्छे-अच्छे गधों को इंसान बना दिया तुम क्या चीज हो" बगैरह ।

आपको यह जान कर खुशी होगी कि 8 मई को विश्व गधा दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

Tuesday, 28 June 2022

वह भी एक जमाना था

 एक  जमाना वह भी था जब लोग घी खरीदते समय हधेली के उल्टी तरफ घी रगड़ कर उसकी मिलावट का पता लगा लेते थे।

एक जमाना वह भी था जब लोग कपड़े के थान के एक कोने को रगड़ का उसकी quality का पता लगा लेते थे।

एक जमाना था जब लोग गेहूं की बोरी ले कर पंचक्की जाते थे आटा पिसाने के लिए । 
बाजार में पनचक्की के ऊपर चुक्क चुक्क चुक्क चुक्क की आवाज होती रहती थी।

एक जमाना वह भी था जब किसी भी चीज के पैकेट में उसके दाम नहीं लिखे होते थे। उस जमाने में एलोपैथिक दवाइयों के अलावा किसी भी चीज में मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट भी नहीं लिखी होती थी। दुकानदारो की मौज होती थी।

एक जमाना हुआ करता था जब सुबह सुबह उठकर कोयले की अंगीठी जलानी होती थी पतली पतली लकड़ियों और कागज की मदद से।  फिर एक लोहे की पाइप को फूक फूक कर उसको सुलगाया जाता था।

तब कहीं जाकर सुबह की पहली कप चाय के लिए पानी तैयार होता था। उसी जमाने में काफी घरों में कुल्हाड़ियां होती थी लकड़ी की चीर फाड़ करके आग जलाने और खाना बनाने के लिये।

एक जमाना था जब अक्सर सड़क पर गधे की पीठ पर ढेर सारे कपड़े लादकर धोबी आता दिखाई देता था हर एक के घर पर। फिर धुले हुए कपड़े लिए जाते कॉपी मे चेक करके और इसी तरह गंदे कपड़े भी नोट करके दिए जाते। अक्सर कमीज और पेंट में बटन गायब होते और कभी-कभी तो कपड़ा ही गायब हो जाता था। उसी जमाने में लोगों का यह भी कहना था कि इम्तहान के लिए  पढ़ते वक्त अगर गधे के ढेचू ढेचू की आवाज सुनाई दे जाए तो वह सवाल इंतहान मे जरूर आता था।

उस जमाने में अगर आप रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर जाते थे तो दर्जनों होल्डॉल और काले रंग के टीन के बड़े बक्से साथ लेकर सफर करते हुए लोग दिखाई देते थे और उन्हें बाहर से अंदर ट्रेन तक ले जाने के लिए कुली को सिर्फ 25 पैसे मिलते थे। आजकल की नई पीढ़ी को तो पता भी नहीं होगा कि होल्डॉल क्या चीज होती है।

उसी जमाने में ज्यादातर लोग साइकिल में ही दफ्तर जाया करते थे। ज्यादातर बाबू लोग जब दफ्तर जाते थे तो उनके सिर पर  sola hat होती थी। या एक खास तरह की हॉट होती थी जिससे धूप से बहुत अच्छी तरह रक्षा होती थी सर की और यह करीब-करीब सभी दफ्तर जाने वाले बाबू और अफसरों के पास होती थी। 1960 के बाद पैदा हुए लोगों को तो पता भी नहीं होगा कि sola hat क्या होती है.

वह भी एक अजीबोगरीब जमाना था क्योंकि तब लोग अपने प्रिय जनों को फोन नहीं करते थे। लोग  परिचित लोगों को  चिट्टियां लिखा करते हाथ से और फिर उन्हें सड़क में जाकर या पोस्ट ऑफिस जाकर लाल रंग के लेटर बॉक्स में डालते थे।  हफ्ते में कई बार घर के बाहर पोस्टमैन की आवाज सुनाई देती थी और जिसने सुनी वह दौड़ पड़ता था चिट्ठी को उठाने के लिए।

अजीबोगरीब जमाना था वह ।  कई मायने में बहुत अच्छा था और कई मामलौं में मुश्किल ।






Tuesday, 7 June 2022

पुराने लखनऊ की यादें

बरसों पहले एक उपन्यास पढ़ा था अंग्रेजी का । लेखिका थी Daphne du Maurier. उपन्यास का नाम था House on the strand. कहानी कुछ इस तरह थी - एक आदमी कोई दवा खा लेता है और उसे खा कर कई दशक पहले के समय  में चला जाता है फिर वहां पर खेत दिखाई देते हैं जहां अब रेलवे स्टेशन  है । जहां पहले बैडमिंटन खेलता था  कहां पर से अब रेलवे लाइन  जाती है वगैरा-वगैरा  ।
 
जब हम सीनियर सिटीजन हो जाते हैं तो पीछे एक बहुत बड़ा समय छोड़ जाते हैं जिस समय शहर  कुछ फर्क था। आज लखनऊ के बारे में ऐसी ही कुछ बात करेंगे।

 लखनऊ का हजरतगंज तो बिल्कुल ही बदल गया है। आज से कई दशक पहले हजरतगंज में न तो इतनी मोटर कार थीं न मोटरसाइकिल और स्कूटर थे। हजरतगंज की सड़क पर कोई खास ट्रैफिक था ही नहीं । उस जमाने में लोग सड़क पर   gunjing किया करते थे आराम से टहलते हुए -  Benbows से मेफेयर तक और फिर रॉयल कैफे से वापस दूसरी तरफ से । कब हजरतगंज बहुत साफ-सुथरे  बिना भीड़ वाली मार्केट हुआ करती थी । देखिए एक पुरानी फोटो और एक नई फोटो में
और अब तो मेट्रो रेल लाइन आ जाने के बाद नजारा बिल्कुल ही बदल गया है हर जगह का । मेट्रो रेल लाइन के रूट पर हर जगह खंबे ही खंबे नजर आते हैं

आज से 50 साल पहले तक लखनऊ में शायद ही कोई बहुमंजिला इमारत हो पर अब तो हर जगह ऊंची ऊंची बिल्डिंग में ही नजर आती है मिसाल के तौर पर ले लीजिए रॉयल होटल चौराहा। जहां पर आजकल सचिवालय के बापू भवन  की बहुत बड़ी बिल्डिंग है
, रॉयल होटल चौराहे पर, वहाॅ पहले एक खूब लंबा दुमंजिला होटल हुआ करता था -रॉयल होटल।

 हुसैनगंज चौराहे पर भी एक दो मंजिला शानदार होटल का जिसका नाम था बर्लिंगटन होटल और उसी के नाम पर वह चौराहा पड़ा था । आजकल हुसैनगंज चौराहे पर जो एक बहुमंजिली इमारत है  विधायक निवासवहाॅ पर 1950 के दशक के अंत तक एक खूबसूरत एक मंजिल की इमारत थी जिसका नाम था ओल्ड काउंसिलर्स रेजिडेंस। वहाॅ  हरी हरी घास का एक बहुत बड़ा खूबसूरत सा बगीचा (lawn) भी था  फूलों से लदा। और हरी घास के बीच में एक शानदार सा फव्वारा था।

 हजरतगंज के बड़े चौराहे पर जहां आजकल बहुत बड़ा छंगामल का कपड़ों का शोरूम है वहाॅ कभी एक छोटा सा रेस्ट्रो हुआ करता था जिसका नाम था बेनबोस। दोनों तरफ खुलता हुआ वह रिस्ट्रो और बेकरी सफेद दाढ़ी वाले छरहरे बुजुर्ग सरदार जी की थी जो हमेशा सफेद चूड़ीदार पजामा और कुर्ता और सफेद पगड़ी पहने काउंटर के पीछे दिखाई देते थे। निहायत सज्जन और शानदार आदमी थे और उनकी कोकोनट cookie तो पूरे लखनऊ में प्रसिद्ध थी । वहां बैठकर चाय पीने का मजा ही कुछ और था और बैठे-बैठे आप दूर तक अशोक रोड पर चलते हुए ट्रैफिक को देख सकते थे ।

दिमाग तो आगे पीछे दौड़ता ही रहता है। हनुमान सेतु नाम का गोमती नदी के ऊपर का  यूनिवर्सिटी के पास का पुल साठ के दशक में बना था। उसके पहले यहां नीचा सा पुल था मंकी ब्रिज नाम का जिसके ऊपर से साइकिल चलाता हुआ मैं यूनिवर्सिटी जाता था।

  निशातगंज के चौराहे से आजकल के पॉलिटेक्निक के चौराहे को जाने वाली सड़क तो पचास के दशक मे गोरखपुर की ओर जाने वाली एक बहुत कम चौड़ी  सड़क थी और सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े बहुत पुराने पेड़ लगे थे। सड़क के दोनों तरफ दूर दूर तक खुला मैदान था। बादशाह नगर स्टेशन के पास कुछ छोटे-मोटे दुकानें थी। महानगर तो 50 के दशक के मध्य में बनना शुरू हुआ था।

1950 दशक मे अमीनाबाद एक साफ-सुथरी बहुत कम भीड़ वाली बाजार हुआ करती थी। बीच में बहुत बड़ा पार्क था जिस में धीरे धीरे रिफ्यूजी लोगों ने अपनी दुकानें बनाई । धीरे-धीरे पूरा पार्क गायब हो गया। 

आगे की बात करें तो 1976 तक गोमती नगर नाम की कोई चीज नही थी। यहां पर गांव हुआ करते थे मलेसा मऊ, उजरियाॅव, जग्गौर,  गौरी का पुरवा इत्यादि।  यही हाल इंदिरानगर वाली जगह का था जहां पहले गांव ही गांव थे।

आज के लिए इतना ही । फिर बात करेंगे लखनऊ के पुराने जमाने के बारे में।

Tuesday, 10 May 2022

1950 and NOW

A comparative studies of 1950 and 2022. 

In 1950 the writing instruments were fountain pen and nib-holder pens. Both have disappeared from daily usage and so have the blotting papers used for absorbing extra ink. Also missing is the carbon paper used for making copy of a letter. We have photostat machines in use now. Also missing is the special copying pencil which was used for making several copies of a letter with the use of carbon papers.

 In 1950 we had electric bulbs with filament which consumed lot of power. They had also a  short life Those bulbs have disappeared and have been replaced by power saving long lasting LED bulbs.

 In 1950 everybody was wearing cotton. In 2022 cotton has become expensive and gone out of reach of common man and we have dress made of artificial fibre. Artificial fibre has also replaced wool in winter clothing.

 In 1950 there were very few residential telephone.  Telephone  was an expensive luxury item.Telephone has now become wireless and mobile. It has become so common and cheap that even daily wage labourer owns a mobile phone. 

Short wave and medium wave radios have disappeared from the market. also missing are gramaphones, radiograms, tape recorder, cheaper cameras, audio and video cassette players. you can add many more items to the list.

In  1950 the  distant communication in written mode was by a letter posted in the post office. This has been almost totally replaced by letters written over electronic media and received instantly whatever the distance. Person born in 21st century may not be have seen a telegram or written a letter to their family or friends.

in 1950 watching cinema was limited to cinema halls. you can now watch a movie on your mobile phone at any time of the day. Also missing is the experience of watching a movie on huge 70 mm screen in the single screen cinema hall. Small multiplexes have replaced those grand cinema halls.

In 1950s smoking a cigarette was almost a fashion statement and cultural necessity for a  modern young man. Even doctors recommended smoking  in cigarette advertisements. It is no longer so. In fact cigarette smoking is considered a very bad social habit and a serious health hazard.

In 1950 for storing  100 movies  a big room was required.  Now you can you store more than a thousand films on a tiny microchip memory card of the size of a human nail.

Medical science has taken such a leap forward that surgeries which were very complicated have become very simple . For example a cataract eye surgery that required many days of hospitalization and a complicated procedure has become so simple that the replacement of an eye lense with an artificial one takes barely twenty minutes and no hospitalisation is required.

These are just a few examples of how the world has changed the last  few  decades. There are so many more.

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Thursday, 5 May 2022

वह आता

वह आता
दो टूक कलेजे के करता zebra पथ पर आता।
 पेट-पीठ मिलकर हैं एक,
 चल रहा बोझा ले के , 
मुट्ठी भर दाने को
नहीं है खाने को , 
फटी-पुरानी पतलून में घुटने छिपाता ।
 दो टूक कलेजे के करता zebra पथ पर आता। 
साथ दो झोले भी हैं सदा हाथ मे उठाए,
 बाएं झोले मैं है पुराने कपड़े दाएं में अखबार
 रद्दी बेचकर कुछ पाने को 
वह आता
 दो टूक कलेजे के करता सड़क पार कर आता।

Wednesday, 13 April 2022

फैशन के शिकंजे

फैशन के शिकंजे

जब मैं बीए में पढ़ रहा था तो पैंट की मोहरी बहुत चौड़ी होती थी , करीब 24 इंच की। तो मेरी सभी पैंट की मोहरी चौबीस इंच की थी । उसके बाद अचानक फैशन  बदल गया और 16 इंच की मोहरी आ गई। सब पैंट बेकार हो गई।

तब मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ता था ।  पुरानी हरक्यूलिस साइकिल थी मेरे पास । तो साइकिल उठाई और अमीनाबाद पहुंच गए।  दो पैंट के कपड़े खरीदे और दो शर्ट के,  क्योंकि शर्ट की कॉलर भी चेंज हो गई थी ।

वहां से नजीराबाद रोड पर आ गए और कैसरबाग चौराहे के नजदीक

 टेलर्स की दुकान में जाकर अपनी पेंट और शर्ट की नाप दे दी और उसे बता दिया मोहरी के बारे में , पैंट की प्लीट्स, पैंट के लूप्स के बारे में, और कमीज के कॉलर के बारे में ।

 पैंट की सिलाई ₹ 4 और कमीज की सिलाई ₹2 पड़ी। टेलर मास्टर दे रसीद काट दी और जेब में रसीद रखकर वापस  चल दिया पैडल मारते हुए।

 चार दिन के बाद जब शर्ट की डिलीवरी लेने पहुंचा तो दोनों पैंट और शर्ट तैयार थी । जब पैसा दे रहा था तो बगल में एक सज्जन खड़े थे। करीब पचास साल के होंगे। अचानक वो बोल उठे "क्यों भाई  सबसे कमीज के ₹1 25 पैसा लेते हो और पैंट के  ₹3 50 तो इन student  ज्यादा क्यों ले रहे हो ।

टेलर मास्टर में जवाब दिया,  "साहब  इनके  नखरे बहुत है तो मेहनत  पड़ती है कटिंग करने और सिलने में इसलिए"।

 मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी । जैसे ही वह सज्जन सीढ़ियों से उतर के बाहर चले गए मैंने उससे कहा "क्यों भाई मुझसे ज्यादा पैसा क्यों ले रहे हो। गलत बात है "

टेलर मास्टर  उस्ताद था । पलट कर बोला "साहब यह बुड्ढे लोग क्या जाने फिटिंग क्या होती है और फैशन क्या होता है। इनको तो किसी तरह भी काट के कपड़े पहना दो ठीक है। आपके साथ मुझे बहुत कायदे से कटिंग करनी पड़ती है हर चीज का ध्यान रखता होता है क्योंकि आप फैशन के पारखी हैं।" 

 अपनी तारीफ सुनकर मेरी तबीयत खुश हो गई और मैं कपड़े लेकर हरकुलिस साइकिल के  पेडल मारता हुआ वापस रवाना हो गया।

 अब सोचता हूं कि यह फैशन इंडस्ट्री वाले पब्लिक को किस तरह से नये कपड़े खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। Teenage  युवा वर्ग अपनी आइडेंटिटी से जूझ रहा होता है और उसे इमोशनली ब्लैकमेल करना बहुत आसान है तो यह उसी युवा वर्ग को टारगेट करते हुए अपने इंडस्ट्री को आगे बढ़ाते हैं और उनके दिमाग में यह बैठा देते हैं कि पुराने फैशन के कपड़े बदलो। पुराने फैशन के कपड़ों में तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं है ।

मेरा अच्छे खासे कपड़ों को बर्बाद करने का
सिलसिला आगे भी चला। जब बेल बॉटम पैंट्स आ गई और कुत्ते के कान वाली (dog collar) कमीज तो दिल्ली में मैंने अपने टेलर के पास नए कपड़े ले जाकर कुत्ते के कान वाली शर्ट और लहराती हुई 24 इंच मोहरी की पैंट सिलाई तब जाकर तसल्ली हुई।

अस्सी का दशक आते-आते मैंने फैशन के साथ समझौता कर लिया और 18 इंच की मोहरी पर तब से टिका हुआ हूं इसी तरह  कॉलर पर भी समझौता कर दिया और कालर न तो बहुत लंबी है और ना ही बहुत छोटी।

कल सामने सड़क पर कुछ लड़कों को जाते देखा कॉलेज की ओर । उनमें से कुछ तो बहुत ज्यादा फैशन वाले लगते थे और उनकी पेंट की सिलाई कुछ इस तरह की थी कि बेचारे ठीक से चल नहीं पा रहे थे बैठने की तो बात ही मत कीजिए । 
मुझे अपना विद्यार्थी जीवन याद आ गया।  यह उमर ही ऐसी होती है।