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Thursday, 9 February 2023

कुछ बातें चाय की

बचपन में हमारे यहां चाय टी पॉट में बनती थी और चाय  की पत्ती टी पॉट में डालकर खौलता पानी भरने के बाद उसे फॉरेन टीकोजी से ढक दिया जाता था । साथ में ट्रे में रहता था मिल्कपौट और शुगर पौट।

 उस जमाने में लिपटन की चाय बहुत चलती थी और लिपटन की तीन मुख्य ब्रांड मार्केट में दिखाई देती थी ,  ग्रीन लेबल ,यलो लेवल और रेड लेबल। 

 हमारे यहां ग्रीन लेबल और रेड लेबल को मिलाकर चाय बनती थी।

 तब बाजार में चाय का दाम था दोआने प्रति कप। दो आने का मतलब है 12 पैसे। उस जमाने में सबसे महंगी चाय मैंने नैनीताल मे पी थी फ्लैट्स में फ्लैटीज़ रेस्टरों में  । एक कप का दाम छै आने  था।

फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी चला गया और वहां पर हॉस्टल के मेस में चार आने का एक पॉट मिलता था जिसमें दो कप चाय होती थी। यह रेट बहुत सालों तक वहीं था।

लखनऊ यूनिवर्सिटी ज्वाइन की तब शायद पहली बार गिलास में चाय मिले रेस्ट्रो में। यह चाय की पत्ती को उबालकर बनाई गई चाय होती थी जिसका स्वाद कुछ फर्क था। कड़क चाय ।

जब मेरा ट्रांसफर नागपुर हो गया तो वहां शुरू शुरू में बहुत घटिया किस्म की चाय पीने को मिली। लगता था जैसे चमड़े को पानी में उबाल कर बनाई है। पर जल्दी ही दफ्तर के नजदीक एक दक्षिण भारतीय रेस्टरो मिल गया और वहां का खाने पीने का सामान और नीलगिरी की चाय ने मन को मोह लिया । शायद पहली बार इतनी जायकेदार चाय पी जो ग्रीन लेबल चाय से भी अच्छी थी स्वाद में। रेस्टोरेंट के मालिक कोई मिस्टर नायर से दक्षिण भारत के बुजुर्ग आदमी थ
 रुपहले बाल थे, सफेद नकली दांत थे और बहुत ही मनमोहक हंसी थी।  कुल मिलाकर बहुत ही शानदार आदमी। फिर तो रोज नैयर साहब के रेस्टोरेंट में  आना जाना शुरू हो गय

फिर ट्रांसफर हो गया और मैं दिल्ली आ गया । दिल्ली की साधारण चाय पीने की आदत पड़ गई । दिल्ली में चाय के शौकीन कम है। पर दिल्ली में भी मैंने एक ऐसी जगह ढूंढ ली जहां बहुत शानदार चाय मिलती थी। कनॉट प्लेस के बहुत नजदीक नई दिल्ली रेलवे स्टेशन था। उसे इमारत में जहां पर गाड़ियां आकर रुकती थी अंदर जाने के लिए और जिसे बरसाती कहते हैं उसके ठीक ऊपर खुली छत पर एक रेस्टोरेंट था वहां पर उचित दाम पर काफी उचित दाम पर काफी  सामान मिलता था जिसमें ग्रीन लेबल चाय भी थी। 

सत्तर के दशक में लालबाग चौराहे के पास शर्मा जी की नुक्कड़ वाली चाय की दुकान में चाय पीने का अवसर मिला । शायद नई दुकान खोली थी। यह चाय अब तक की सबसे फर्क चाय थी क्योंकि इसमें लॉन्ग इलायची अदरक जैसे पता नहीं क्या मसाले मिले थे । यह चाय लखनऊ में काफी लोकप्रिय थी। अब भी लोकप्रिय है। 

शायद बहुत कम लोगों को पता होगा कि एक जमाने में विश्व की सबसे प्रसिद्ध चाय बेनीनाग उत्तराखंड की काली , लंबी पत्तियों वाली चाय थी  खुशबू और स्वाद बेमिसाल थी। यह चाय के बागान प्रसिद्ध उत्तराखंड उद्योगपति दान सिंह बिष्ट के थे जिनका मुख्य व्यवसाय पहाड़ के पेड़ों को काट-काट कर  देश के कई भागों में भेजेना होता था जहां लकड़ी का कारोबार होता था। इसी वजह से उधर टिंबर किंग भी कहा जाता था।वह अपने छोटे से जीवनकाल में बहुत जबरदस्त औद्योगिक प्रगति कर बैठे और उनके देहांत के साथ ही उनकी इंडस्ट्रियल अंपायर समाप्त हो गई। उनके कौसानी स्थित चाय के बागान भी। 

चाय के सबसे बड़े कदरदानों में ब्रिटेन के लोग हुआ करते हैं और इनकी आदत चाय में बिस्किट डुबो कर खाने की है जिसे डंकिंग इन टी कहते हैं । अभी कुछ दिनों पहले पढा था ब्रिटेन के एक समाचार पत्र में कि भारत के समोसे वहां बहुत लोकप्रिय हो गए हैं और लोग बिस्किट की जगह समोसे के साथ चाय पीना ज्यादा पसंद करने लगे हैं।

पश्चिमी देशों के लोगों को यह देखकर आश्चर्य होता होगा कि भारत में ट्रेन में सफर करने वालों में चाय कितनी लोकप्रिय है और किस तरह स्टेशन आते ही छोटे छोटे लड़के पीतल के चाय के बड़े मटके लेकर प्लेटफार्म में ट्रेन के आने पर लोगो को गरम गरम चाय पिलाने के लिए दौड़ पड़ते हैं। 

आपको यह सब बताने में इतना व्यस्त हो गया मैं कि भूल गया की गैस में चाय का पानी चढ़ा रखा है। चलता हूं अब चाय बनाने के लिए। शायद आपको भी चाय पीने का मन कर रहा होगा।

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Tuesday, 7 February 2023

Miracle cure for hairloss at young age.

MIRACLE CURE FOR HAIR LOSS

(Note : Once upon a time there lived in maqbara colony of Hazratganj Lucknow a wise man by the name of CL Pepper. He worked in state governments transportation department during the day and in the morning and evening devoted his time to diagnosing health problems of men and women and prescribing herbal treatment. This was all free of cost. This treatment for #hairloss was given by him to many people during 1950s and 60s and was reportedly quite effective. 

It is very important to note that after the carom seed formula is ready, it should be completely dry so that it does not develop fungus while in storage.)

Take 250 grams of ajwain seeds (carrom seeds).. Get two and a half kgs fresh juicy lemon. Soak the ajwain seeds  in home made  fresh , filtered  lemon juice in a large glass or stone bowel. Add a flat teaspoon of rock salt to this juice.. keep it  covered through the night. In the morning scoop and spread the carrom seeds on big china platesto dry in the sun. In the evening put t back in the pot in the lemon juice. Repeat the process until the entire juice gets absorbed in carrom seeds. Keep it in the sun for a few days more to get it completely dried. Store it in an airtight glass jar. 

After each of the two main meals take  pea size of the seeds, mixed in a flat spoonful of honey. Do this till you use the entire stock . 

Within  a fortnight  of starting this treatment you are likely to see a change in your general health, in your muscular strength and in your scalp . By the time you finish with the treatment you will most likely have a new healthy personality and a scalp full of healthy hair.

The most remarkable recovery is generally seen in the case of  young men under thirty. People who are more than 40  also get benefited  but not in  such a dramatic way.

With the sun getting stronger in the month of march in northern hemisphere, this is the right time to make this preparation .

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Monday, 6 February 2023

ज़माना बदल गया है

कुछ साल पहले एक दिन अचानक बहुत हाई ब्लड प्रेशर हो गया और मैं घबरा गया । ब्लड प्रेशर की दवाई तो खाता हूं नियमित रूप से और ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है पर अचानक ब्लड प्रेशर का बहुत ऊपर  जाना चिंता का कारण था। सो अपने मित्र के साथ एक कार्डियोलॉजिस्ट के कंसलटिंग क्लिनिक में पहुंच गया।

बाहर काफी भीड़ थी करीब 40 लोग लाइन से लंबे बरामदे में कुर्सियां में बैठे थे और अपने नंबर का इंतजार कर रहे थे। मैं भी अपने हिसाब से लाइन में बैठ गया। करीब 1 घंटे बाद मेरा नंबर आ गया और मैंने सोचा चलो डॉक्टर साहब अच्छी तरह चेकअप करके दवाई में चेंज कर देंगे और खाने-पीने वगैरह की सही सलाह भी  दे देंगे 

मैं अंदर गया और डॉक्टर साहब के बगल में बैठ गया और  उनसे कहा कि मेरा ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ गया है और ये दवाई खा रहा हूं । डॉक्टर साहब कलम उठाई प्रिस्क्रिप्शन लिख दिया और अगले पेशेंट को अंदर आने को कहा। 

 उन्होंने मुझसे कहा,  लाइए मेरी फीस।  ₹1000 दे दीजिए। मैं उनको समझाने लगा अपने बारे में।0

 "यह सब सुनने के लिए टाइम नहीं है आप देख रहे हैं  पीछे एक लंबी लाइन खड़ी है इंतजार में सब का टाइम खराब मत कीजिए पैसे दीजिए और जाइए दवाई मैंने लिख दी है ।"

 मैंने उनको ₹1000 दे दिए और बाहर आ गया।


अब चलते हैं 1950 के दशक में जब मैं एक स्कूल जाने वाला स्टूडेंट था । एक दिन अचानक तबीयत खराब हो गई तो मेरे पिताजी मुझे पास की एक क्लिनिक में ले गए । जब  पहले वाला मरीज बाहर निकला तो डॉक्टर ने मुझे बुलाया। 

फिर उन्होंने मेरी आंख को चेक किया। आंख के नीचे की पलक पलट  कर देखा फिर  मेरी जीभ को एक चम्मच से दबाकर अच्छी तरह चेक किया।  फिर उन्होंने मेरे घुटने में एक इंस्ट्रूमेंट से धीरे-धीरे टैप किया जिससे  घुटने से नीचे का पैर उछाला जाता था। स्टेटस्कोप से मेरी छाती और पीठ को चेक किया।  फिर उन्होंने दवाई लिख दी और मुझे खाने पीने के बारे में सलाह दी। करीब 15 मिनट से ज्यादा टाइम दिया और उसके बाद कंपाउंडर को बुलाकर प्रिस्क्रिप्शन दे दिया ताकि वो दवा बना दे। उस जमाने मैं डॉक्टर की क्लिनिक मैं ही दवा बनती थी।

 पुराने जमाने और आजकल के डॉक्टर के व्यवहार और काम करने के स्टाइल में कितना अंतर है ! आजकल एक सफल डॉ वह है जो सुबह डीकेडी पर बैठता है शाम को अधिक से अधिक में बैठता है और दिन में कई अस्पतालों में कंसलटेंट डॉक्टर है। आजकल वह एक मरीज को कितना टाइम दे रहा है ?

 पुराने जमाने में कोई टेंशन नहीं था डॉक्टर  शांति से अपने क्लीनिक में ही बैठकर पैसे कमाता और उसमें संतोष रखता और मरीजों को ज्यादा से ज्यादा समय और राय देता।

पर सबसे बड़ा फर्क तो यह है कि अब कोई कंपाउंडर नही होता है जो पहले हर डॉक्टर की क्लिनिक मैं होता था। आज कल डॉक्टर  सिर्फ प्रिस्क्रिप्शन लिखता है। पहले डॉक्टर अपने मरीज के लिए दवा अपनी क्लिनिक मैं ही बनाता था मिक्सचर और पाउडर । और उसके लिए कंपाउंडर की जरूरत होती थी।

एक और बात है। पुराने जमाने मैं डॉक्टर पूरे शरीर की जिम्मेदारी लेता था और ऐसी दवाई देता था जिसको खाने से किसी और अंग में कोई बुरा असर नही हो पर अब ऐसा नहीं है। यूरोलॉजिस्ट आजकल प्रोस्टेट की अक्सर एक दवाई देते हैं जिससे आंखों को बहुत नुकसान होता है और उनको इससे कोई मतलब होता है। वह तो तब पता चलता है जब आई स्पेशलिस्ट कैटरेक्ट का ऑपरेशन करते हैं ।

Sunday, 5 February 2023

सोचने वाली बात



बॉलीवुड में दो टाइप के एक्टर होते हैं एक तो वह जो लटके झटके के साथ एक्टिंग करते हैं और वजनदार डायलॉग बोलते है।  दूसरे वह जिनके ना तो कोई लटके झटके हैं ना कोई धासू डायलॉग वाली एक्टिंग ।  बिल्कुल नेचुरल ।

देवानंद के लटके झटके तो आपने पुरानी फिल्मों में देखे होंगे,  नई फिल्मों में शाहरुख खान के लटके झटके हैं। दिलीप कुमार भी एक्टिंग ही करते थे हालांकि ऊंचे कलाकार थे वजनदार डायलॉग वाले।

लटके झटके वाले और एक्टिंग करने वाले कलाकार अपने टाइम में बहुत सफल होते हैं पर 20 साल बाद अगर कोई वह फिल्म देखें तो उनकी वह हरकत है कुछ हद तक बेतुकी लगती हैं।

 दूसरी तरफ वह कलाकार है जिनको देखकर लगता है कि आप सचमुच का दृश्य देख रहे हैं कोई फिल्म का नहीं। ऐसे कलाकारों में ज्यादातर वह कलाकार है जो छोटे रोल करते हैं लेकिन बहुत ही सरल तरीके से _ जैसे युनुस परवेज़, एस एन बनर्जी , सीएस दुबे , इफ्तेखार और कुछ हद तक उत्पल दत्त।   मुख्य कलाकार भी कई है जैसे अमोल पालेकर  मौसमी चटर्जी , फारुख शेख,  नसीरुद्दीन शाह ओम पुरी आदि ।

एक बात और। एक अच्छी फिल्म सिर्फ हीरो की वजह से नहीं चलती। सबसे महत्वपूर्ण बात है एक अच्छे डायरेक्टर का होना एक अच्छे पटकथा का होना और एक अच्छी एडिटिंग का होना।  फिल्म इत्तेफाक की बहुत सुंदर एडिटिंग थी। फिल्म अंगूर की एडिटिंग और डायरेक्शन दोनों लाजवाब थे । वही फारूक शेख  जिन्होंने फिल्म कथा में अपना झंडा गाड़ दिया था कुछ फिल्मों में  बेकार नजर आए  इसलिए की डायरेक्शन गलत था, पटकथा कमजोर थी या फिर एडिटिंग सही नहीं हुई।

अब वह जमाना चला गया है जब म्यूजिक  डायरेक्टर के बूते पर फिल्म हिट हो जाती थी।अब न तो अच्छे म्यूजिक डायरेक्टर्स हैं न अच्छे गायक।
ऐसा लगता है कि वह समय दूर नहीं है जब हिंदी फिल्मों में गाने करीब-करीब गायब हो जाएंगे हॉलीवुड फिल्मों की तरह।

Saturday, 10 December 2022

पुरानी बातें रेलगाड़ी वाली

एक जमाने में रेलगाड़ी की यात्रा में अक्सर आंख में  रेल के इंजन से निकलने वाले धुंए के कोयले के  कण घुस जाते थे और परेशानी होती थी। इसीलिए  उस जमाने में फर्स्ट क्लास के डिब्बों में  खिड़कियों में कांच और लकड़ी shutters के अलावा एक लोहे की जाली का भी shutter  होता था  ताकि कोयले के कण अंदर नहीं आ पाए।

तब ट्रेनें बहुत कम थी और यात्री भी इतने नहीं होते थे।  जंक्शन वाले बड़े स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर वन में कम ही ट्रेन आती थी। पैसेंजर ट्रेन को जिसमे ज्यादातर गांव के गरीब आदमी ही सफर करते थे प्लेटफार्म नंबर तीन या चार पर डाल दिया जाता । 

 जंक्शन स्टेशन के चौड़े साफ सुथरे  लंबे प्लेटफार्म से अच्छी जगह सैर करने की शहर में और कोई नहीं होती थी। एक तो प्लेटफार्म बहुत साफ-सुथरे होते थे और लंबे होते थे फिर घूमते घूमते आप  कुल्लड़ वाली चाय पी सकते थे और प्लेटफार्म में मैगजीन और अखबार के स्टॉल में जाकर अपने पसंद का अखबार या मैगजीन खरीद सकते थे।
अक्सर वहां दोस्तों से भी मुलाकात हो जाती थी।

बचपन में हम कभी कभी प्लेटफार्म की सैर कर लेते थे अपने पापा के साथ या फिर अपनी दीदी या छोटी बहिन कान्ता के साथ और चंदा मामा जैसी मैगजींस खरीद कर लाते थे। वहां के टिकट चेकर त्रिपाठी जी हमारी जान पहचान के थे और प्लेटफार्म टिकट हम नही खरीदते थे। वैसे भी तब प्लेटफार्म टिकट के बिना भी लोग प्लेटफार्म पर जाते थे। उस जमाने में प्लेटफॉर्म टिकट एक आने का (छह पैसे का) होता था ।

रेल की बात आती है तो रेलवे कॉलोनी की बात भी आनी चाहिए।  उस जमाने में शहर की सबसे खूबसूरत कॉलोनी रेलवे कॉलोनी ही होती थी जहां साफ-सुथरे मकान होते थे , रेलवे में काम करने वालों के लिए खेल के मैदान होते थे, शहर की सबसे बढ़िया सड़कें होती थी और उन पर सबसे ज्यादा रोशनी देने वाली लाइट होती थी।

जी हां रेलवे कॉलोनी भी सैर करने के लिए अच्छी जगह थी पर वहां सन्नाटा होता था। प्लेटफार्म का मजा ही कुछ और था। चहल पहल थी ट्रेन आती-जाती दिखाई देती थी चाय की दुकानें थी किताबों की दुकानें थी

तब ज्यादातर लोगों के सामान में लोहे का एक ट्रक और एक होल्डॉल जरूर होता था और परिवार के लोग प्लेटफार्म पर अक्सर ट्रंक और होल्डॉल के ऊपर बैठ कर ट्रेन का इंतजार करते हुए नजर आते थे।

तब लोग घर से खाना बना कर लाते थे ट्रेन में खाने के लिए । प्लेटफार्म में मिलने वाली चीजें  कम ही खाते थे। हां चाय तो सभी पीते थे और तब चाय मिट्टी के कुल्हड़ में होती थी प्लास्टिक के कप में नहीं और मिट्टी के कुल्हड़ की चाय की सोंधी सोंधी खुशबू अपने आप में एक बहुत ही अच्छा एहसास था। 

रात की ट्रेन चलने के बाद परिवार के साथ जाने वालों के टिफिन केरियर खुलने लगते थे और पूरी की चटपटी सब्जी की और अचार की खुशबू पूरे डिब्बे में भर जाती थी तब जो लोग अगले स्टेशन पर प्लेटफार्म से खरीद कर खाना खाने का इंतजार कर रहे होते थे उनकी भूख और भी ज्यादा बढ़ जाते थे। 

कई ऐसे स्टेशन थे जो खाने-पीने के सामान की वजह से प्रसिद्ध हो गए थे जैसे संडीला स्टेशन के लड्डू (संडीला स्टेशन उत्तर प्रदेश में लखनऊ और हरदोई के बीच में पड़ता है)।  दक्षिण भारत की रेल यात्रा में इटारसी स्टेशन में एक जमाने में बहुत ही बढ़िया दूध मिलता था और ज्यादातर लोग वहां ट्रेन के रुकने पर जायकेदार दूध ही पीना पसंद करते थे। वैसे ही चेन्नई जाने में (जिसको तब मद्रास कहते थे) रास्ते में एक बहुत छोटा स्टेशन पड़ता है नेल्लौर का। वहां के प्याज वाले चटपटे दाल बड़े बहुत ही स्वादिष्ट होते थे। लखनऊ से नैनीताल एक्सप्रेस काठगोदाम जाने पर सुबह हल्द्वानी से कुछ पहले लाल कुआं स्टेशन पड़ता था जहां पर गाड़ी में डबल इंजन लगाया जाता था क्योंकि वहां से थोड़ी चढ़ाई शुरू हो जाती थी। इसमें कुछ वक्त लग जाता था इसलिए ट्रेन काफी देर रुकती थी। वहां पर सुबह-सुबह बढ़िया जलेबी मिलती थी और दूध जलेबी का नाश्ता करने वाले काफी शौकीन होते थे ट्रेन में।

 ऐसे और भी स्टेशन होंगे जिन्हें खाने पीने की चीजों की वजह से याद किया जाता है पर मुझे अब कुछ याद नहीं है। हां बड़ौदा स्टेशन पर एक बार खाने की थाल का आर्डर दिया था। जब खाना आया और मैंने एक चम्मच डाल मुंह में डाली तो नमक के साथ चीनी का भी स्वाद आया। फिर पता चला कि गुजरात में खाने में मीठा मिलाने का  रिवाज है। 

बाकी फिर कभी। आज के लिए इतना ही।

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Friday, 9 December 2022

कुछ इधर की कुछ उधर की

कुछ इधर की कुछ उधर की

Q.  घोड़ा क्यों अड़ा ?  पान क्यों सडा ?
Ans    फेरा न था

आपने देखा होगा कि तांगे वाले या घुड़सवार घोड़े की गर्दन पर हाथ फेरते रहते हैं जिससे घोड़े का मूड ठीक रहता है वैसे ही पान की दुकान वाले पान के पत्तों को उलट-पुलट करते हैं ताकि वह सड़ न जाए

Q. पथिक प्यासा क्यों ? गधा क्यों उदास ?
Ans. लोटा न था 


मतलब यह कि पंडित के पास लोटा न था इसलिए वह कुएं से निकालकर पानी नहीं पी पाए और प्यासे रह गए और गधा ने जमीन पर लोट पोट नही की इसलिए उदास था।

Q जूता नहीं भाया ? समोसा नहीं खाया ?
 Ans. तला ना था

मतलब यह कि समोसा कच्चा था । तला हुआ नहीं था और जूते के नीचे तल्ला यानी सोल नही था।

ये थे  अपने बचपन के वह सवाल जिनका एक ही जवाब होता था ।
ऐसे शायद बहुत से सवाल होंगे।

उस जमाने में मोबाइल फोन नहीं थे । इंटरनेट नहीं था । जब चार लोग जब इकट्ठा होते थे और टाइम पास करना होता था तो गप्प लड़ाते थे। ताश खेलते थे । कैरम खेलते थे । चुटकुले सुनाते थे या फिर पहेलियां बुझाते थे।

आजकल तो चार दोस्त अगर किसी रेस्ट्रो में बैठे हैं तो हर एक की खोपड़ी नीचे को झुकी होती है अपने मोबाइल की तरफ और उंगलियां मोबाइल के स्क्रीन पर चिपकी होती  हैं। आपस में ना कोई बातचीत, न गपशप,  न किसी को यह होश है कि आसपास क्या हो रहा है।

जैसा मैंने ऊपर दो पहेलियां लिखी है क्या आपको भी ऐसी कुछ पहेली याद है जिसमें 2 सवालों का एक ही जवाब हो ?

एक और बात दिमाग में आती है।  किसी शहर में छोटी बड़ी सड़कों के नाम होते हैं। इनमें कुछ नाम ऐसे कैसे होते हैं जिनके बारे में कुछ पता ही ना हो ?

मिसाल के तौर पर ले लीजिए तो महानगर लखनऊ में एक छन्नी लाल का चौराहा है।  अब यह छन्नी लाल कौन थे ? 

वैसे ही क्ले स्क्वायर के बीच से होता हुआ एक रास्ता जाता है जिसका नाम है खलीफा ईदुलजी मार्ग।  अब यह खलीफा साहब कौन थे?

 वैसे ही लखनऊ में ही एक झाऊ लाल का पुल है तो भाई यह झाऊ लाल कौन थे ? 

इन बातों पर भी कुछ विचार कीजिएगा।

एक और बात दिमाग में आती है । एक जमाने में कुछ चीजें किसी शहर से ही जुड़ी होती थी। तो उस जगह में ऐसी क्या खास बात थी कि वह चीज उसी जगह की प्रसिद्ध थी ?

 जैसे संडीला के लड्डू, अलीगढ़ के ताले ,खुर्जा का घी, बनारस की साड़ियां, मिर्जापुर की दरी और कालीन, मथुरा के पेड़े , दिल्ली घंटाघर का सोहन हलवा,  बीकानेर की भुजिया, आगरे का पेठा, मुरादाबाद के बर्तन।

चलते-चलते आपसे एक पहेली पूछ लेता हूं उसका जवाब बताइए

एक मुर्गा चश्मे श्याही चलते चलते थक गया
लाओ चाकू काटो गर्दन फिर वह चलने लग गया।

इसका जवाब शायद वही लोग दे पाए जो उस जमाने के हैं जब बॉल पॉइंट पेन और फाउंटेन पेन नहीं होती थी।

क्योंकि आप में से कोई इसका जवाब नहीं बता पाएगा इसलिए मैं ही बता देता हूं ।

एक जमाने में स्कूल में लिखने के लिए जो कलम होती थी वह नरकुल नाम की लकड़ी की होती थी जिसको आगे से तिरछा काटा जाता था फाउंटेन पेन जैसी नोक मनाई जाती थी और नोक को चाकू से चीरा जाता था।

और फिर  श्याही की दावात में डूबो कर लिखा जाता था । पर कुछ समय बाद उसे फिर से काटना पड़ता था जब नोक घिस जाती थी।

बातें तो और भी हैं पर फिर कभी।

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Tuesday, 29 November 2022

हिंदी फिल्मों के हास्य कलाकार

 फिल्में काफी लंबी होती है । पिक्चर हॉल के अंदर  3 घंटे तक पिक्चर देखने वाला इंसान  बोर हो जाता है डायलॉगबाजी से और ड्रामा से। ऐसे में आवश्यक होता है कि फिल्म में कुछ ऐसी स्थिति लाई जाए कि वह थोड़ा सा फर्क महसूस कर सकें थोड़ा हंस सके थोड़ा रिलैक्स हो सके । ऐसे में एक विदूषक यानी कॉमेडियन की बहुत जरूरत होती है और कॉमेडियन हमेशा से हिंदी फिल्मों का हिस्सा रहा है ।

50 के दशक के शुरू में हिंदी फिल्मों में जिन हास्य कलाकारो का हाथ रहा उनमें आगा और मिर्जा मुसर्रफ प्रमुख है। मिर्जा साहब अपने टेढ़ी-मेढ़ी  जबड़े की एक्सरसाइज के साथ डायलॉग बोलते थे और हंसाते थे। आगा ज्यादा अच्छे कॉमेडियन थे और अपने चेहरे के एक्सप्रेशन से ही लोगों को हंसा दिया करते थे । 50 के दशक शुरू होने के कुछ समय बाद जॉनी वॉकर एक कॉमेडियन के रूप में आए और उन्होंने अपनी पक्की जगह बना ली । उनकी उस जमाने की मशहूर फिल्में टैक्सी ड्राइवर सीआईडी और मिस्टर एंड मिसेस 55 आदि रही है ।

1960 का दशक शुरू होते ही राजेंद्रनाथ आ गए मेडियन के रूप में और दिल देके देखो फिल्म से उन्होंने अपना स्थान बना दिया

जहां जाने वाकर एक इंटेलिजेंट कॉमेडियन के रूप में दिखाई देते थे वही राजेंद्र नाथ एक बेवकूफ के रूप में एक्टिंग करने में माहिर थे। जॉनी वॉकर की तरह राजेंद्रनाथ ने भी काफी लंबे समय तक राज किया उसके बाद 70 के दशक में महमूद आ गए पर्दे पर और उन्होंने दूसरों को बेवकूफ बनाकर लोगों को हटाया। उनकी देखने लायक फिल्मों में प्यार किए जा हमजोली मुझे अभी तक याद है फिरअसरानी साहब का आगमन हुआ। असरानी शायद सबसे ज्यादा देर तक टिकने वाले कॉमेडियंस में से एक थे और हमेशा फर्क फर्क तरह की एक्टिंग करके मनोरंजन किया करते थे जबकि राजेंद्रनाथ एक ही टाइप में माहिर थे । कुछ और कलाकारों का नाम लिया जा सकता है पर वह ज्यादा पॉपुलर नहीं हुए और कुछ भी फिल्मों में दिखाई दिया। इनमे पेंटल सतीश शाह मुख्य थे। एक और हास्य कलाकार हैं जो सिर्फ एक टाइप की एक्टिंग करते थे शराबी की और उनका नाम है केस्टो मुखर्जी।

कुछ और नाम है हास्य कलाकारों के जो याद आ रहे हैं । इनमें उत्पल दत्त ओम प्रकाश और केस्टो  मुखर्जी प्रमुख हैं । फिल्म गोलमाल में तो यह तीनों ही लोग थे और वह फिल्म शायद अपने टाइप की अकेली ही फिल्म थी बहुत ही मनोरंजक।

 80 के दशक के अंत में जॉनी लीवर ने बॉलीवुड में प्रवेश किया। वह पहले  एक उच्च कोटि के मिमिक आर्टिस्ट के रूप में और बाद में एक कॉमेडियन के रूप में आए। वह अपनी लाउड एक्टिंग के लिए मशहूर थे यानि इनका हंसाने का तरीका था जोर जोर से चिल्ला कर डायलॉग बोलना।  इसके बाद जो नाम सामने आता है वह  है राजपाल यादव । इनकी बिल्कुल अलग ही तरह की कॉमेडी थी और शुरू में बहुत ही प्रभावशाली रहे जैसे फिल्म हंगामा में।

आगे का इतिहास फिर कभी।

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Saturday, 26 November 2022

शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता

हमारी स्कूली शिक्षा

स्कूल में हमें पढ़ाया जाता है कि मोहम्मद तुगलक को क्यों पागल कहते थे। स्कूल में हमें पढ़ाया जाता है कि प्राचीन रोम के पतन के क्या कारण थे। स्कूल में हमें यह पढ़ाया जाता है कि इंग्लैंड के कवि वर्ड्सवर्थ कीट्स और शैली अपनी कविताओं में क्या कहते थे । स्कूल में हमें यह पढ़ाया जाता है कि वीर रस,  सौंदर्य रस इत्यादि के हिंदी के कौन कवि थे । स्कूल में हमें लड़ाइयां के बारे में पढ़ाई जाता है _पानीपत का युद्ध, प्लासी का युद्ध,सिकंदर का भारत पर आक्रमण, नादिर शाह ने कैसे भारत में आकर लूट मचाई, तैमूर का आक्रमण इत्यादि।

स्कूल में हमें यह नहीं पढ़ा जाता है कि हम अपना स्वास्थ्य कैसे अच्छा रख सकते हैं । स्कूल में हमें यह नहीं बताया जाता कि हम को किस तरह अपना खानपान रखना चाहिए ताकि स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकें स्कूल में हमें यह नहीं पढ़ा जाता है कि हमारे शरीर कैसे काम करता है । स्कूल में हमें यह नहीं पढ़ाया जाता कि घर में छोटी मोटी चीजों की मरम्मत हम खुद कैसे कर सकते हैं । और स्कूल में यह नहीं पढ़ाया जाता कि जिस कानून का हमें पालन करता है वह कानून क्या है । कानून की शिक्षा तो m.a. तक कहीं नहीं होती। अलग से एलएलबी करना होता है और हम से यह अपेक्षा की जाती है कि हम कानून का पालन करेंगे।

देखा जाए तो यह शिक्षा पद्धति हमारी जीवन शैली में खरी नहीं उतरती । और उतरे भी कैसे ? यह शिक्षा पद्धति तो उन अंग्रेजों की देन है जिन्होंने भारत में शिक्षा इस उद्देश्य से देनी शुरू की कि उन्हें दफ्तरों में काम करने वाले बाबू मिल जाए।

एक जमाने में ब्रिटेन बहुत बड़ी समुद्री ताकत हुआ करता था।  उस जमाने में वायु सेना तो होती ही नहीं थी तो अपनी नौसेना के बल पर अंग्रेजों ने विश्व के कई देशों को अपना गुलाम बनाया और इन देशों में से जहां जलवायु उसके रहने लायक थी वहां बड़ी संख्या में नरसंहार करके उसे अपना देश बना दिया । जैसे यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका कनाडा ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका । पर भारत एक ऐसा देश है जहां की जलवायु उसके रहने लायक नहीं थी पर जहां अनाज था कोयला था लोहा था चीनी थी और भी बहुत सी चीजें थी जिनका व्यापार करके वह बहुत धनी हो सकता था। इन सब काम करने के लिए उसे ब्रिटेन से बड़ी संख्या में देशवासी नहीं मिल सकते थे क्योंकि इस गर्म देश में कोई बसना नहीं चाहता था । यह उचित समझा गया कि देश के  लोगों को अंग्रेजी शिक्षा दी जाए ताकि छोटे पदों पर क्लर्क और सुपरवाइजर का काम करने के लिए उसे पर्याप्त मात्रा में लोग मिल जाएं । यहीं से अंग्रेज शासकों की जरूरत पूरी करने वाली शिक्षा की शुरुआत होती है।

भारत की स्वाधीनता के बाद इस बात की बड़ी आवश्यकता थी कि देश की शिक्षा पद्धति में मूलाधार परिवर्तन किया जाए पर हुआ यह कि जिस अंदाज से तब तक शिक्षा दी जा रही थी, वही सिलसिला चलता रहा।  नतीजा यह है कि हमें अपने कानून का ज्ञान नहीं है । हमे अपने शरीर विज्ञान का ज्ञान नहीं है हमें आयुर्वेद की चमत्कारी जड़ी बूटियों का ज्ञान नहीं है। हमें यह नहीं पता है कि घर की छोटी-मोटी चीजों के मरम्मत हम खुद कैसे कर सकते हैं। स्कूल में ऐसा कोई हुनर नहीं सिखाया जाता जिससे हम अपना रोजगार शुरु कर सके अपने आजीविका कमा सके। लड़का हाई स्कूल में फर्स्ट डिवीजन में पास हुआ और आगे भी फर्स्ट डिवीजन देता हुआ एम ए में इतिहास प्रथम श्रेणी में पास होकर जब तैयार हुआ तो नौकरी के लाले पड़ गए। वही एक दर्जी की दुकान वाला लड़का या एक मोटर मैकेनिक का लड़का हाईस्कूल पास करके अच्छे खासे पैसे कमाने लगा क्योंकि जो शिक्षा उसे स्कूल देने में असमर्थ था वो उसके घरवालों ने उसे दे दी। 

होना यह चाहिए की 12वीं क्लास तक आपको ऐसी शिक्षा दी जाए जिससे आप अपने रोजी-रोटी खुद कमा सकें और नौकरी के लिए आपको सरकार का मुंह नहीं ताकना पड़े। और जो लोग आगे अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए पढ़ना चाहते हैं या शिक्षा के क्षेत्र में या किसी और में उच्च शिक्षा लेना चाहते हैं वह ले सकते हैं पर अगर वह ना लेना चाहे तब भी एक सम्मानित जीवन व्यतीत करने योग्य बने रहें 12वीं पास करके । उस उच्च शिक्षा से क्या फायदा यदि उसने यही ज्ञान दिया है अंग्रेजी साहित्य के कवि और उपन्यासकारों की रचनाओं की किस तरह से विवेचना की जाए।

हमारी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए क्या हम आत्मनिर्भर बन सकें समय आने पर अपनी आजीविका कमा सकते हैं इस लायक बन सके कि अपने परिवार को एक सम्मानित जीवन दे सकें और इसके लिए हमारी शिक्षा पद्धति में मूलाधार परिवर्तन की आवश्यकता है।

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Friday, 25 November 2022

खीमा की कहानी (भाग 3)

 खीमा की कहानी भाग 3

खीमा के पिताजी का ट्रांसफर टेहरी गढ़वाल हो गया था और उन्होंने जुलाई के शुरू में गोरखपुर छोड़ दिया। खीमा ने लखनऊ में एम ए में  एडमिशन ले लिया था लखनऊ यूनिवर्सिटी में।  उसकी दो बहनो को भी लखनऊ आना पड़ा क्योंकि टेहरी गढ़वाल में उच्च शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने महिला विद्यालय में एडमिशन ले दिया और हॉस्टल में रहने लगी‌

उसे नरेंद्र देव हॉल छात्रावास में एक सिंगल रूम मिल गया। हॉस्टल नया बना हुआ था। साफ-सथरी अच्छी बिल्डिंग थी।
 और कमरे भी अच्छे थे जहां दीवार की अलमारी (बंद करने वाली) और छत पर सीलिंग फैन भी था जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में नही था

 अमरनाथ झा हॉस्टल और नरेंद्र देव हॉस्टल दोनों में जमीन आसमान का अंतर था बिल्डिंग में भी और वहां की लाइफ में भी। अमर नाथ झा हॉस्टल की बिल्डिंग 100 साल पुरानी थी । पत्थर की थी । काफी सुंदर थी कलात्मक। पर आधुनिक हॉस्टलों जैसी सुविधाएं नहीं थी जैसा  नए हॉस्टल्स में होती थी । पर हॉस्टल की लाइफ भाईचारे वाली थी । सभी लोग एक दूसरे को जानते थे । मिलने पर हेलो होती थी और सब लोग कॉमन हॉल में अक्सर मिलते रहते थे। हॉस्टल की अपनी क्रिकेट, टेबल टेनिस वगेरह की टीम थे जो टूर्नामेंट में हिस्सा लेती थी।

नरेंद्र देव हॉस्टल में कोई भाईचारा जैसी चीज नहीं थी। ऐसा लगता था अजनबी लोग एक धर्मशाला में रह रहे हैं । किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है । जिसको सोशल लाइफ कहते हैं वह पूरी तरह से गायब थी।

  इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में खीमा का कोई अपना रिश्तेदार नहीं था । वहां पूरा समय हॉस्टल के दोस्तों के साथी व्यतीत होता था
। यहां लखनऊ में रिश्तेदार थे बड़े मामा  छोटे माना और मौसी जो हुसैनगंज के पास मुरली नगर में रहते थे।

एक और बड़ा फर्क था दोनों हॉस्टल की स्टाइल में। म्योर हॉस्टल के दस कदम पर कटरा बाजार शुरू होती थी और यूनिवर्सिटी रोड पर भी काफी दुकानें थी  गेट से बाहर निकलते ही यूनिवर्सिटी रोड की छोटी सी बाजार आ जाती थी जहां रोजमर्रा के काम की हर चीज मिलती थी।  जगाती का रेस्त्रां , डबल रोटी मक्खन, जनरल मर्चेंट की दुकान और किताबों का बड़ा बाजार।  आप  बाहर निकलते ही दुकानों से जरूरत की चीज खरीद सकते थे ।  यूनिवर्सिटी का अपना छोटा सा अस्पताल भी था जो  हॉस्टल के बगल में ही था ।

नरेंद्र देव हॉस्टल लखनऊ यूनिवर्सिटी की मुख्य बिल्डिंग के पीछे मेन रोड से बहुत ही दूर था जहां से आपको एक लंबी सूनी सड़क चल कर जाना पड़ता था तब आप मुख्य सड़क पर आते थे। मुख्य सड़क पर भी दूर-दूर तक सन्नाटा था। वहां पर न तो कोई रिक्शा था ना कोई यातायात का साधन। हॉस्टल के गेट पर की तो बात छोड़िए, लंबी दूरी चलकर भी जब यूनिवर्सिटी के मेन गेट से बाहर आते थे वहां पर भी कोई रिक्शा नहीं थी जबकि म्योर हॉस्टल के गेट पर रिक्शेवाले खड़े रहते थे। सामान खरीदने की बात करें तो आस पास एक कप चाय पीने की भी व्यवस्था नहीं थी किताबों की दुकान अमीनाबाद में थी वहां से कई मील दूर था। बाजार भी  दूर।

ऐसे में यह जरूरी हो गया था कि एक साइकिल हो जिसके आना-जाना मुश्किल ना हो । तो यहां खीमा को अपने पापा की पुरानी मजबूत साइकल लाना जरूरी हो गया।

साइकिल आते ही यातायात की समस्या दूर हो गई। हॉस्टल की तो कोई अपनी जिंदगी थी नहीं इसलिए वह अक्सर साइकिल मैं पेडल मारता हुआ अपने मामा जी के घर पहुंच जाता था और वही गपशप लगाता रहता था। 

उसकी दो बहनें उसी के साथ लखनऊ आ गई थी और उन्होंने महिला विद्यालय में एडमिशन ले लिया था वह भी शनिवार की शाम को मामा जी के घर आ जाती थी और सोमवार की सुबह को अपने हॉस्टल में वापस चली जाती थी‌। इसलिए हर शनिवार और रविवार को वह मुरलीनगर चला जाता था।

नरेंद्र देव हॉस्टल में एक ही मेस था जो कि यूनिवर्सिटी द्वारा चलाया जाता था और जिस का खाना बहुत चौपट मिलता था। यह पता नहीं कि खीमा सुबह का नाश्ता और शाम की चाय का नाश्ता का जुगाड़ कैसे और कहां करता था। शायद मेस में चाय और टोस्ट भी मिलते हो पर निश्चित नहीं है। लखनऊ के हॉस्टल में कोई डबल रोटी मक्खन पेस्ट्री केक वाला भी नहीं आता था। 

 एक तरह से नरेंद्र देव हॉस्टल एक धर्मशाला सी थी।

एम ए  के दो साल मैं हॉस्टल में कोई  याद रखने वाली खास बात नही हुई। हां, खीमा ने डायनिंग हॉल के बाहर लगे नोटिस बोर्ड पर कभी-कभी कुछ नोटिस चिपकाने शुरू किए जिसमें टेबल टेनिस संबंधित सूचनाएं दी जाती थी।  लोगों को यह आईडिया पसंद आया। खीमा टेबल टेनिस का शौकीन था और आते ही उसके टेबल टेनिस खेल की शुरूआत कर दी ‌‌। हॉस्टल में दिल्ली यूनिवर्सिटी से बी ए करके एक लड़का आया था जिसका नाम उसका चुटकी वाला वर्मा रखा था और जो अच्छी टेबल टेनिस खेलता था। दोनों ने मिलकर हॉस्टल के लड़कों में टेबल टेनिस के प्रति दिलचस्पी पैदा की और फिर उसने फाइनल ईयर में एक टेबल टेनिस प्रतियोगिता भी रखी हॉस्टल की जिसमें हॉस्टल के लड़कों ने भाग लिया

 और इस प्रतियोगिता में उसका टेबल टेनिस पार्टनर फाइनल मैच में विजई हुआ और उसको रनर्स अप का कप मिला। दोनों सालों में यही नतीजा रहा और 2 साल के अंत में फौज के जनरल थोराट के हाथों प्राइज डिसटीब्यूशन कराया गया जिसमें ढेर सारे कप खीमा और उसके दोस्त को मिले।

उन दो सालो में उसके पिता टेहरी गढ़वाल जिले में कार्यरत थे और उसके एम ए के अंतिम दो महीनों के दौरान उसके पिता का ट्रांसफर लखनऊ हो गया। इसलिए m.a. का इम्तिहान देने के बाद और लखनऊ में अपने पापा के पास ही आ गया और यहां से उसका नौकरी की तलाश में इम्तहान देने का सिलसिला शुरू हुआ।

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