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Sunday, 30 June 2024

वह आवाज क्या थी ॽ

लखनऊ में बरसात का मौसम शुरू हो चुका है। 

शनिवार 29 जून 2024 को रात के 11:20 बजे अचानक नींद खुल गई बादलों के गड़गड़ाने और बिजली कड़कने की आवाज जैसी सुनाई दी थी।

 यह 5 मिनट तक सुनते रहे फिर कुछ समझ में नहीं आया । शायद बाहर जोरदार पानी बरस रहा है । तो बाहर की ओर की खिड़की खोली और देखा तो पानी तो नहीं बरस रहा है पर घने बादल छाए हैं। 

खिड़की के पास खड़े होकर थोड़ी देर तक ध्यान से सुनने के बाद ऐसा लगा कि यह बिजली की आवाज नहीं है यह तो बंदूक की गोली की आवाज है । कहीं फायरिंग हो रही है शायद। अक्सर वारदातें होती रहती है या फिर शायद पुलिस वाले कहीं प्रैक्टिस कर रहे हो क्योंकि थोड़ी दूर पर पुलिस की एक एकेडमी भी है। 

लेकिन जब थोड़ी देर तक यह चला रहा तो फिर एक और बात ध्यान में आई कि आज कोई त्यौहार तो नहीं है क्योंकि हो सकता है बम वाले पटाखे छूट रहे हो।

 इंटरनेट पर जाकर पटाखे क्यों छूट रहे हैं लखनऊ में इसको गूगल सर्च किया। कहीं कोई त्यौहार नजर नही आया। 

फिर अचानक एक खबर पर नजर पड़ी। भारत वर्ल्ड कप जीत गया । साउथ अफ्रीका को सात रन से हराकर। फिर एक समाचार और भी पढ़ा । लखनऊ में भारत के वर्ल्ड कप जीतने की खुशी में बहुत पटाखे छूट रहे हैं। 

तब जाकर समझ में आया की बरसात के मौसम में यह आवाज किस चीज की थी । आवाज़ थी कोहली के 76 रन की जो बहुत दिनों के बाद उसके बैट से निकली और सही समय पर । 

मुबारक हो भारत की जीत क्रिकेट प्रेमियों को।अब सो जाता हूं फिर से।

Tuesday, 11 June 2024

जाको राखे साइयां

आपको एक किस्सा सुनाते हैं । सत्य कथा है। 

 अमेरिका में एक सज्जन सिगरेट बहुत पिया करते थे और उनकी पत्नी उनकी इस आदत से परेशान हो ग‌ई । रोज इसी बात पर झगड़ा होता और घर में अशांति का वातावरण आ गया था।
नौकरी कुछ ऐसी थी कि पतिदेव को  लंबी दूरियों की यात्राएं करनी पड़ती थी अक्सर। तो एक बार एक शहर से दूसरे शहर, जो काफी दूरी पर था , जा रहे थे । हवाई जहाज में आगे  बैठे थे। अचानक सिगरेट की तलब लगी तो जेब से सिगरेट निकाल कर  सुलगाने की कोशिश कर ही रहे थे कि एयर होस्टेस आ गई। उसने कहा कि यहां सिगरेट पीना मना है। अगर आपको सिगरेट पीनी है तो बिल्कुल पीछे केबिन में जाकर सिगरेट पीजिए।

उन्होंने वैसे ही किया और अभी आधी सिगरेट ही पी थी की एरोप्लेन के इंजन में खराबी आ गई और वह जमीन पर तेजी से  आकर गिरा । जब वह जमीन से टकराया तो पीछे का हिस्सा जहां वह सिगरेट पी रहे थे टूट के छटक के दूर झाड़ी में जा गिरा और फिर हवाई जहाज में आग लग गई। सब यात्री जलकर मर गए।  वह बच गया।
इस घटना के बाद उनकी पत्नी ने उन्हें कभी सिगरेट पीने के लिए मना नहीं किया।

यह  एक सच्ची कहानी थी जिसे आप इंटरनेट पर भी ढूंढ सकते हैं ।

 हम सभी के जीवन में भी अक्सर ऐसा होता है । या फिर सुनने में आता है  ऐसी घटना के बारे में।

एक कहावत है कि जाको राखे साइयां मार सके ना कोई ।

 एक दूसरी कहावत है कि उसकी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिल सकता।

एक और किस्सा है जब एक महिला जिसका नाम  Juliane Koepcke है अपनी सीट सहित हवाई जहाज से  हजारों फीट नीचे आकर गिरी जब बिजली गिरने से उसका हवाई जहाज टूट गया। 

इस महिला के बारे में नीचे के लिंक में बहुत कुछ है । पढ़ियेगा ।

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Juliane_Koepcke

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Saturday, 18 May 2024

वह भी एक ज़माना था

एक  जमाना वह भी था जब लोग घी खरीदते समय हधेली के उल्टी तरफ घी रगड़ कर उसकी मिलावट का पता लगा लेते थे।

एक जमाना वह भी था जब लोग कपड़े के थान के एक कोने को रगड़ का उसकी quality का पता लगा लेते थे।

एक जमाना था जब लोग पंचक्की जाते थे आटा पिसाने के लिए । 
उन्हें पता रहता था की किस तरह का गेंहू खा रहे हैं।  पनचक्की के ऊपर चुक्क चुक्क चुक्क चुक्क की आवाज होती रहती थी। अब नहीं सुनाई देती है यह आवाज।

एक जमाना वह भी था जब किसी भी चीज के पैकेट में उसके दाम नहीं लिखे होते थे। उस जमाने में एलोपैथिक दवाइयों के अलावा किसी भी चीज में मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट भी नहीं लिखी होती थी। 

एक जमाना हुआ करता था जब सुबह सुबह उठकर कोयले की अंगीठी जलानी होती थी पतली पतली लकड़ियों और कागज की मदद से।  फिर एक लोहे की पाइप को फूक फूक कर उसको सुलगाया जाता था। तब कहीं जाकर सुबह की पहली कप चाय के लिए पानी तैयार होता था। उसी जमाने में काफी घरों में कुल्हाड़ियां होती थी लकड़ी की चीर फाड़ करके आग जलाने और खाना बनाने के लिये।

एक जमाना था जब अक्सर सड़क पर गधे की पीठ पर ढेर सारे कपड़े लादकर धोबी आता दिखाई देता था हर एक के घर पर। फिर धुले हुए कपड़े लिए जाते कॉपी मे चेक करके और इसी तरह गंदे कपड़े भी नोट करके दिए जाते। अक्सर कमीज और पेंट में बटन गायब होते और कभी-कभी तो कपड़ा ही गायब हो जाता था। उसी जमाने में लोगों का यह भी कहना था कि इम्तहान के लिए  पढ़ते वक्त अगर गधे के ढेचू ढेचू की आवाज सुनाई दे जाए तो वह सवाल इंतहान मे जरूर आता था।

उस जमाने में अगर आप रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर जाते थे तो दर्जनों होल्डॉल और काले रंग के टीम के बड़े बक्से साथ लेकर सफर करते हुए लोग दिखाई देते थे और उन्हें बाहर से अंदर ट्रेन तक ले जाने के लिए कुली को सिर्फ 25 पैसे मिलते थे। आजकल की नई पीढ़ी को तो पता भी नहीं होगा कि होल्डॉल क्या चीज होती है।

उसी जमाने में ज्यादातर लोग साइकिल में ही दफ्तर जाया करते थे और उनके सिर पर  sola hat होती थी। 1970 के बाद पैदा हुए लोगों को तो पता भी नहीं होगा कि sola hat क्या होती है.

वह भी एक अजीबोगरीब जमाना था क्योंकि तब लोग अपने प्रिय जनों को और परिचित लोगों को चिट्टियां लिखा करते हाथ से और फिर उन्हें सड़क में जाकर या पोस्ट ऑफिस जाकर लाल रंग के लेटर बॉक्स में डालते थे।  हफ्ते में कई बार घर के बाहर पोस्टमैन की आवाज सुनाई देती थी और जिसने सुनी वह दौड़ पड़ता था चिट्ठी को उठाने के लिए। 

अजीबोगरीब जमाना था वह । पर कई मायने में बहुत अच्छा भी था ।

Wednesday, 15 May 2024

कुछ कहना बेकार है

कुछ कहना बेकार है

एक अच्छा जालीदार कागज लीजिए जिस पर से पानी नीचे निकल सकता है ।अब उसमें चाय की पत्ती रखिए और उसे बंद करके  उसमें एक डोरी बांध दीजिए और उस डोरी के आखिर में एक  कार्डबोर्ड का  टुकड़ा बांध दीजिए। अब उस पैकेट को एक प्याली के अंदर डालिये और धागे  कार्डबोर्ड सहित बाहर लटकाइए । अब उस प्याली में खौलता पानी भरिये । थोड़ी देर में चाय का कलर आने लगेगा। डोरी से पैकेट को हिलाने का खेल थोड़ी देर तक कीजिए  फिर पैकेट को निकाल कर अलग कर दीजिये। चाय बन गई आपकी। 

अब चाय का पाउडर है कागज का पैकेट है रस्सी की डोरी है और कार्डबोर्ड का टुकड़ा है तो पैसा तो ज्यादा लगेगा ही। डब्बे में 20-25 ऐसी चाय की पुडियाएं भर दीजिए और एक खूबसूरत डिब्बे में रखकर बेचिये बहुत ऊंचे दामों पर।

तो अब आप चाय पी रहे हो कागज का रस पी रहे हो डोरी का रस पी रहे हो तो सब चीज के पैसे तो देने ही होंगे।   महंगी चीज़ है सब लोग नहीं खरीद सकते हैं आप खरीद सकते हैं तो आपको अनुभव ऐसा होगा की आप किस्मत वाले हैं कितनी बढ़िया चाय  पी रहे है।

थोड़ा सा विज्ञापन भी कर दो उससे भी फायदा होगा लोगों को पता चल जाएगा की रईसों के पीने वाला चाय कौन सी है। 

दुनिया में अकलमंदो की कमी नहीं है। ऐसे अकलमंद भरे हुए हैं जो फटी हुई पेंट को चौगुने दाम पर में खरीदने हैं। जींस की नई पतलून लीजिए फिर उसको रेगमाल से रगड़ रगड़कर कई जगह फाड़ डालिए खूब अच्छी तरह प्रेस कर दीजिए और उसे पर दो-तीन तरह के लेवल लगा दीजिए। फिर उसे खूब ज्यादा दाम में बेचिये। 

उसकी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद क्यों। उसकी चमड़ी मेरी  से ज्यादा गोरी क्यों। 
उसका बच्चा मेरे बच्चे से ज्यादा स्वस्थ क्यों। 
मेरा बच्चा उसके बच्चे की तरह क्लास में फर्स्ट क्या नहीं आता है। अखबार पढ़िए मैगजीन पढ़िए विज्ञापन आपको बता देंगे कि आपका बच्चा भी फर्स्ट आ सकता है अगर आप रोज सुबह उसको उनका बनाया हुआ पाउडर पानी में मिलाकर पिलाएं वह स्वस्थ भी हो सकता है पड़ोसी के लड़के से ज्यादा। और आपकी अम्मा की चमड़ी पड़ोसन की अम्मा की चमड़ी से ज्यादा गोरी हो सकती है अगर आप यह क्रीम लगायें। 

क्या कमाल खोपड़ी की सोच का और क्या विज्ञापन बनाते हैं भाई लोग। 

और सबसे कमल के तो वह लोग हैं जो इस तरह की जीत खरीदते हैं यह सोचकर कि वह बहुत अकलमंदी का काम कर रहे हैं ।

किसी का सही कहा है की बर्बाद गुलिस्ता करने को सिर्फ एक ही उल्लू काफी है,  हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्ता क्या होगा।

Friday, 5 April 2024

खाने पीने की बातें

खाने-पीने की बातें

ऐसा याद नहीं है की बचपन में कभी बाहर खाना खाया हो किसी ढाबे या रेस्टोरेंट में। बचपन का पूरा समय घर का ही खाना खाने में बीता।

  उसे जमाने में यानी 50 के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाहर का खाने का मतलब होता था हलवाई की बनी हुई पूरी या फिर समोसे वगैरा खाना । ऐसा याद नहीं है कि कभी पंजाबी स्टाइल  रेस्टोरेंट में खाना। भारत की आजादी के बाद बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान से बहुत ढेर सारे पंजाबी शरणार्थी आए तब जाकर शेरे पंजाब टाइम पर  रेस्टोरेंट दिखाई देने लगे। पहले तो खाना खाने का मतलब होता था हलवाई की दुकान।

नैनीताल में मल्लीताल में एक रेस्टोरेंट हुआ करता था जिसमकी असली घी की बनी हुई जलेबियां बहुत लोकप्रिय थीं। उसके अलावा नैनीताल में ही मंदिर के पास एक  चाट गोलगप्पे वाला  खोमचा लगाता था। गर्मियों में जब वहां जाते थे तो जी भर के चाट खाते थे। ज्यादातर पानी के बताशे दहीबड़े और दही चटनी के बताशे होते थे।

फिर 50 के दशक के मध्य में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी  शुरू हुआ ढाबे और रेस्टोरेंट के खाने का कार्यक्रम। हॉस्टल में झुल्लर महाराज का मेस था जहां संडे की शाम को खाना नहीं बनता था तो शाम को बाहर खाना खाने का प्रोग्राम बनता था ।अक्सर निरंजन सिनेमा हॉल बिल्डिंग में बाहर रेस्त्रां में शाम के 6:30 का खाना खाया जाता था फिर वहीं पर पिक्चर देखने सिनेमा हॉल में घुस जाते।  खाने का मेनू होता था नान और मटर पनीर की सब्जी या स्टफ्ड टोमाटो तरी के साथ। 

इलाहाबाद की सिविल लाइंस में भी एक दुकान थी लकी स्वीट मार्ट । वहां की मिठाइयां बहुत अच्छी होती थी। एक मिठाई का नाम था एटम बम।

 यूनिवर्सिटी रोड में भी एक रेस्टोरेंट था जगाती का। खाली सिस्टम में खाना मिलता था ₹1 25 पैसे का एक थाल।

फिर लखनऊ यूनिवर्सिटी आ गए और यहां पर कोई रेस्टोरेंट आसपास था नहीं। रेस्टोरेंट जाने का रिवाज भी नहीं था । हॉस्टल में खाना बहुत खराब था पर संडे को भी शाम को मिल जाता था। हां सुना था कि उसे जमाने में हजरतगंज में हनुमान मंदिर के बगल में एक बंटूज़ नाम का रेस्टोरेंट था जहां पर 50 पैसे में पेट भर खाना मिलता था थाली सिस्टम में

बाहर खाने का असली सिलसिला तो शुरू हुआ नौकरी लगने के बाद। दिल्ली में कनॉट प्लेस में सबसे ज्यादा समय तक खाना जा खाया।  मद्रास होटल जो मद्रास होटल बिल्डिंग में था वहां पर ₹4 का एक अनलिमिटेड खाने का थाल होता था बासमती चावल का टिपिकल मद्रासी खाना। उसके अलावा रीगल बिल्डिंग के कोने में टी हाउस के पास एक रेस्टोरेंट हुआ करता था शुद्ध वेजीटेरियन नाम का।  वहां भी मैं अक्सर खाना खाता था वह भी चार रुपए का एक थाल था। हां याद आया करोल बाग में भी एक रेस्टोरेंट था जहां कभी-कभी खाना खाते थे जब करोल बाग जाते थे । रेस्टोरेंट का नाम तो याद नहीं है पर वहां पर खाने के साथ गोवर्धन घी से बनाई हुई सब्जियां और चुपड़ी हुई रोटियां मिलती थी।

 फिर नागपुर को तबादला हो गया। वहां दफ्तर था सेंट्रल सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग जिसमें केंद्र सरकार के कई दफ्तर थे पास में ही एक सिनेमा हॉल था लिबर्टी सिनेमा और उसके पास ही एक मद्रासी नाश्ते पानी की दुकान थी और सामने शेरे पंजाब नाम का एक होटल और उसके बगल में मोती महल। बस इन्हें तीनों जगह में अक्सर खाना खाया करता था। मद्रासी रेस्टोरेंट में तो डोसा इडली बड़ा उत्तपम वगैरा मिलता था चाय बहुत बढ़िया थी । पूरे नागपुर में उससे बढ़िया चाय कहीं नहीं पी मैंने । शेरे पंजाब और मोतीमहल में तेल मसाले वाला खाना होता था जिससे तंग आकर ब एक बार डब्बा सर्विस भी ज्वाइन की जिसमें टिफिन करियर में एक लड़का घर पर खाना ले आता था। 

फिर मैं दिल्ली आ गया और प्रगति विहार हॉस्टल में रहने लगा यहां पर मेरे एक दोस्त के सुझाव पर  घर में ही खाना बनाना शुरू कर दिया । प्रेशर कुकर में खाना आसानी से बन जाता था और ताजा खाना खाने का अपना अलग ही मजा था। 

अब बात करते हैं खाने के स्वाद की। अक्सर आपका सदा होगा लोगों को कहते की जो स्वाद फल फल रेस्टोरेंट के खाने का है वह घर के खाने में कहां होता है। बट आपकी सही हो सकती है लेकिन आप यह भूल जाते हैं कि बाहर का खाना बनाने में जिन चीजों का इस्तेमाल होता है वह सेहत के लिए बहुत नुकसानदायक होती है पहली बात तो यह है कि इस तेल में बार-बार सामान तला जाता है और तेल जहरीला हो जाता है। उसके अलावा तड़का लगाने में जिन मसाले का इस्तेमाल होता है उसमें  अजीनोमोटो इत्यादि वह मसाले होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत खराब होते हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह है की बहुत सी सब्जियां बनाकर डीप फ्रीज में रख दी जाती है एक महीने तक वहां पड़ी रहती है और उन्ही को बार बार बाहर निकाल के गर्म करके ताजी ग्रेवी मिलकर आपको पेश कर दिया जाता है।

चलते-चलते एक बात याद आ गई तो आपको बता देता हूं इलाहाबाद में अक्सर दिन में दफ्तर के पास एक रेस्टोरेंट में खाना खाया करता था और उस बैरे को अच्छी टिप देता था। एक दिन उसने कहा साहब आप यहां खाना मत खाया कीजिए मुझे बहुत ताज्जुब हुआ और मैंने कहा क्यों भाई क्या बात है।  उसने बताया ॓ साहब आप जो यहां खाना खाते हैं वह एक महीने से भी ज्यादा पुराना होता है और deep freeze में पड़ा रहता है। आपको इससे बहुत नुकसान हो सकता है। आप भले आदमी है इसलिए आपको बताना मेरा कर्तव्य है। मैंने उसे धन्यवाद दिया और कुछ पैसे दिए धन्यवाद के तौर पर और फिर मैं वहां कभी नहींगया।

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 उसे दिन के बाद मैं बहुत सावधानी बढ़ता था खाना बाहर खाने में

Monday, 1 April 2024

सब कुछ बदल गया है

हॉलीवुड की तर्ज पर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री का नाम कब से बॉलीवुड पड़ा यह तो मुझे पता नहीं पर मैं बचपन से ही फिल्मों में दिलचस्पी रखने लगा था। बचपन में फिल्म देखने की आदत काम ही मिलती थी और साल में मुश्किल से एक दो फिल्में देख पाते थे वह भी जब बड़े लोग जाकर फिल्म देखा जाए और फिल्म बच्चों के देखने लायक मानी जाए। पर सिनेमा के पोस्टर देखने में बड़ा मजा आता था।

जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब हमारे घर के सामने जो बड़ी चौड़ी सड़क है थी उसके ऊपर से अक्सर सिनेमा हॉल मैं आने वाली नई फिल्मों के बारे में जानकारी देने के लिए एक छोटा सा कारवां निकलता था। जोकर की पोशाक में फिल्म के विज्ञापन के बड़े-बड़े पोस्टर हाथ पर लिए हुए लड़के एक के पीछे एक कतार में चलते थे और धारा लगते थे "आज रात को यूनाइटेड टॉकीज के सुनहरे पर्दे पर हंटर वाली के हैरतंगेज कारनामे " और हवा में आने वाली फिल्म के पैम्फ्लेट उछालते रहते थे । उनके पीछे-पीछे चलने वाले तमाशा बिन लड़के इन पर्चियां को लूटते रहते थे।

 बचपन में शायद सबसे पहले जिस फिल्म का इस तरह का विज्ञापन देखा था वह "हंटर वाली की बेटी" था । यह 1940 के दशक के आखिर की बात है।

उसे जमाने में सुरैया और देवानंद की बड़ी धूम थी। दिलीप कुमार तो हमेशा फिल्में के आखिर में मर जाता था और मुझे उसकी फिल्में बिल्कुल पसंद नहीं थी।

फिल्म की पहली मैगजीन जो मैंने देखी थी वह फिल्मlफेयर थी। 1952 में शायद पहली बार प्रकाशित हुई थी । उसे जमाने में 8 आने की एक मैगजीन आती थी ।  इंटरनेट तो था नहीं तो मैगजीन खूब बिकती थी और बड़े-बड़े साइज की बहुत सी मैगजीन थी जैसे इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया, धर्म योग साप्ताहिक हिंदुस्तान शंकर्स वीकली। सभी छह आने से 8 आने के बीच में होती थी। 50 के दशक में blitz नाम की मैगजीन‌ एक बहुत बिकने वाली अखबार नुमा साप्ताहिक मैगजीन थी चार आने की।

 बच्चों की जो सबसे पहले मैगजीन मैंने पढ़ी थी वह शिशु थी। चार आने की आती थी, छे सात साल के बच्चों के लिए पढ़ने वाली ।  चंदा मामा और मनमोहन भी काफी लोकप्रिय मैगजीन थी । 

50 का दशक बॉलीवुड सिनेमा का संगीत का  सफल समय की शुरुआत था। सिनेमा के गाने उसे जमाने में ऑल इंडिया रेडियो यानी दूरदर्शन पर नहीं सुनाए जाते थे क्योंकि सरकार की आदर्शवादी नीति के कारण सिर्फ क्लासिकल संगीत ही ऑल इंडिया रेडियो में सुनाया जाता था। इसका फायदा उठाया श्रीलंका की रेडियो एडवरटाइजिंग सर्विसेज ने ।  श्रीलंका को तब सिलोन नाम से जाना जाता था ।और रेडियो सिलोन भारत में बहुत लोकप्रिय हो गया सिनेमा संगीत की वजह से। 

रेडियो सिलोन का सबसे सफल संगीत का प्रोग्राम बिनाका गीत माला था जो कि शायद 1952 में शुरू हुआ और उसकौ सफल करने का श्रेय पूरी तरह से अमीन सयानी को जाता है।

1960 के दशक के अंतिम वर्ष में बॉलीवुड कुछ फीका फीका सा पड रहा था क्योंकि बहुत से काफी ज्यादा उम्र के कलाकार हीरो बनकर रोमांस कर रहे थे जो दर्शकों को भा नहीं रहा था। तब अचानक फिल्म जगत में राजेश खन्ना की एंट्री हुई है फिल्म आरधना  के रोमांटिक हीरो के रूप में।
धो अचानक पूरी बॉलीवुड इंडस्ट्री को उन्होंने झिझोड़ के रख दिया। पहले आई आराधना फिर आई आनंद और फिर एक के बाद एक बहुत सी सुपरहिट फिल्म आई चली गई।

 इससे पहले कभी पूरा देश किसी एक कलाकार के पीछे इतना दीवाना नहीं हुआ था। और उसके साथ ही फिल्म आराधना के गानों से एक नए किशोर कुमार का फिल्म जगत में प्रवेश हुआ और वह था राजेश खन्ना के पार्श्व गायक के रूप में।रूप तेरा मस्ताना, रहने दो छोड़ो जाने दो यार,  कहीं दूर जब दिन ढल जाए जैसे गानों ने देश को संगीत मय कर दिया।

आज के दौर में न तो कोई सुपरस्टार है ना तो कोई चमत्कारी सिंगर है ना तो कोई चमत्कारी सिनेमा हॉल है और नहीं कोई चमत्कारी फिल्म है।

 सब कुछ बदल गया है

Wednesday, 27 March 2024

नाम में क्या रखा है

नाम में क्या रखा है

बच्चे बहुत शरारती होते हैं बचपन में हम लोग बड़े लोगों के स्वभाव और पर्सनालिटी के आधार पर अक्सर उनके लिए कोईबनाम रख देते हैं। कभी-कभी उन दिनों के रखे हुए नाम की याद आती है तो बहुत हंसी आती है।

मेरे क्लास में एक लड़का पढ़ता था वह इतना काला और चमकीला था कि स्कूल में अलग दिखाई देता था। हमारी क्लास के लड़कों ने उसका नाम cobra boot polish dark tan रख दिया था। एक मास्टर जी थे गणित के, जो बहुत छोटे साइज के और गोल मटोल से थे और लुढ़कते हुए चलते थे,  तो उनका नाम डनलप मास्टर रख दिया था। 

हमारे घर के बाहर की तरफ का एक बड़ा कमरा मेहमानों का कमरा होता था। होता यह था कि हमारे दादाजी गांव से किसी को भी हमारे शहर में भेज देते थे नौकरी की तलाश में और जब तक उसकी नौकरी नहीं लग जाती थी और रहने के लिए जगह नहीं मिल जाती थी तब तक हमारे ही गैस्ट रूम में रहता था। तरह-तरह के लोग वहां जाकर रहे जिनमें से कुछ लोगों का नाम हम लोगों ने रख दिया था। एक बहुत लंबा दुबला पतला मेहमान था जिसका नाम लमपूछया पांडे पड़ गया था। एक दूसरा पांडे था जिसका मिजाज थोड़ा गर्म था तो उसका नाम गुर्री पांडे रख दिया गया था। इसी तरह एक और सज्जन थे जो इतने पतले लंबे और छड़ी की तरह सीधे थे कि उनका नाम खंबा रख दिया गया था। एक सज्जन साल भर तक रहे और बहुत रहस्यमई तरीके से इधर से उधर जाते दिखाई देते थे तो उनका नाम नेवला पड़ गया।

बात सिर्फ हमारे बचपन की या घर की नहीं है थोड़े बड़े होकर जब यूनिवर्सिटी में गए तो हॉस्टल में भी देखा कि लड़कों के नाम पड़ रहे हैं। मुझे पता नहीं है पर मेरा भी जरूर कोई नाम पड़ा होगा। एक लड़का था जिसके नाक के नथुने बहुत ही चौड़े थे और नाक भी बहुत बड़ी थी। उसका नाम रखा गया था भैंस। उसके बगल के कमरे में एक छोटे से कद और छोटी-छोटी आंखों वाला लड़का था जिसकी आंखें बहुत चंचल थी इधर से उधर घूमती रहती थी उसका नाम रखा गया था कबूतर। एक और सीनियर स्टूडेंट था जो ऊपर की मंजिल के कोने के कमरे में रहता था। उसकी शक्ल कुछ इस तरह की थी कि उसका नाम बुलडॉग पड़ गया। हॉस्टल में 2 साल रहने के बाद एक नया लड़का हॉस्टल में आया जिनका कद 6 फुट 4 इंच था दुबला पतला था। उसका नाम भाई लोगों ने ICBM रख दिया था।

ऐसे भी कई नाम है जो उनकी अपनी भाषा में तो सही है पर हिंदी में ऐसे नाम देखकर अगर आपको हंसी आ जाती है तो गलत नहीं है। आपकी भाषा में उसका कुछ और मतलब होता है। लोगों का नाम अपनी भाषा में अच्छा होता होगा पर उत्तरी भारत में इन डॉक्टर साहिब का बोर्ड बड़ा अटपटा लगता है।



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पानी रे पानी

पानी रे‌ पानी

पानी के बिना मानव जीवन असंभव है।

इसीलिये अधिकतर गांव और शहर नदी के किनारे  होते हैं। आसानी से पानी मिल जाता है।

पहले शहरों में पाइप से वाटर सप्लाई नहीं होती थी आजकल की तरह। ऐसे में शहर में नदी से दूर जगहों पर रह रहे लोगों को पुराने जमाने में हैंडपंप लगाने पड़तै थे। हमारे मकान में भी एक हैंडपंप लगा था।

लोहे का पंप होता था इसके हैंडल को ऊपर नीचे करने से उसके मुंह से पानी निकलता था मोटी धार में। उसी के पानी को बाल्टी में भर के बाथरूम में रखा जाता नहाने के लिए । उसी से कपड़े धोने होते थे। उसी पानी से खाना बनाया जाता था।

कुछ मकानो में कुंए हुआ करते थे । ज्यादातर कुए कच्चे होते थे पर कुछ बहुत सुंदर पक्के होते थे । सीमेंट की छोटी सी दीवार वाले। बाल्टी को रस्सी से बांधकर डुबोकर पानी खींच कर निकाला जाता था। हमारे यहां भी एक बार कुछ सब्जियां पौधे की खेती करने के बारे में सोचा गया तो एक कुआं खोदा गया और एक दो साल तक उसका इस्तेमाल भी किया गया । उसके बाद जब जमीन के खराब होने की वजह से कोई ज्यादा सब्जियां नहीं हुई तो कुंए को पाट दिया गया।

पहाड़ों में बड़ी-बड़ी चौड़ी नदी तो होती ही नहीं है । वहां पर हैंडपंप भी लगाना  संभव नहीं है।  कुआं होने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन प्रकृति का कमाल देखिए वहां पर झरने हुआ करते हैं जिससे निरंतर पानी गिरता रहता है और कुछ जगह चट्टान के बीच से पानी की धार निरंतर गिरती रहती है जिसे पहाड़ की भाषा में नौला कहते हैं। उसके चारों तरफ एक कमरा और सीमेंट का फर्श बना दिया जाता है ताकि लोग वहां जाकर आराम से  बाल्टी में पानी भरकर घर ले जा सके ।

अल्मोड़ा शहर में भी ऐसे ही कई नौले है जिसमें एक नौले का नाम सुनेरी नौला है जिसका पानी बहुत मीठा होता है।

 पहाड़ों में  पेड़ों की कटाई होने की वजह से झरने और नौले के पानी सूखते जा रहे हैं जिससे कि पहाड़ में पानी की समस्या पैदा हो रही है। लोगों को डर लगता है की अल्मोड़ा के नौले भी कुछ दिन बाद सूख जाएंगे।

पुराने जमाने में बहुत सी जगह जहां पानी का भीषण संकट होता था वहां पर उस जमाने के राजा महाराजाओं ने जमीन की सतह से बहुत नीचे जाकर पानी ढूंढ निकाला और वहां पर नीचे जाने के लिए बढ़िया सीढ़िया बना दी और उसके ऊपर एक भव्य इमारत  बना दी। ऐसे स्थानों को बावली कहते हैं और बुंदेलखंड और गुजरात में कुछ बहुत प्रसिद्ध बावली है। इस तरह के चमत्कारी तरीके से पानी की खोज निकालने वाले राजा महाराजा तो अब हैं नहीं कहीं।

विज्ञान की प्रगति के साथ बिजली के पंप द्वारा कई दशकों से पानी निकाला जा रहा है ।  इसका इतना ज्यादा उपयोग हो रहा है कि वह दुरुपयोग की तरह सामने आ रहा है क्योंकि जमीन के नीचे पानी का स्तर गिरता चला जा रहा है जिसकी वजह से पेड़ों की जड़ों को जो पानी मिलता था वह गायब होता जा रहा है। पेड़ सूखता जा रहे हैं ताल सूखते जा रहे हैं और कई जगह अकाल की स्थिति पैदा हो गई है। कई बार जमीन के नीचे से बहुत ही ज्यादा पानी निकालने की वजह से वह स्थान खाली हो जाता है और धीरे-धीरे जमीन नीचे को धसते रखती है जिसे सब्सिडेंस कहते हैं । अमेरिका में कई जगह जमीन 10 या 20 फीट नीचे तक चली गई है।

 फरीदाबाद के पास का सुंदर प्राकृतिक ताल था जिसे बदखल ताल कहते थे।  वह भी सूख चुका है क्योंकि फरीदाबाद अब एक विशाल शहर बन गया है और वहां नदी नहीं होने के कारण बहुत ही अधिक मात्रा में कई दशक से जमीन के नीचे से पानी निकाला जा रहा है।

 पंजाब  में भी गेहूं की जगह चावल की खेती करने के लिए किसानों ने अत्यधिक मात्रा में पानी निकलना शुरू किया जमीन के नीचे से जिसकी वजह से  वहां पर पानी की सतह काफी नीचे चली गई है। 

 ऐसे ही 2024 में बेंगलुरु शहर जो कभी एक बहुत सुंदर  और बहुत ही अच्छे मौसम वाला शहर हुआ करता था आजकल पानी की भयंकर समस्या से जूझ रहा है। पुराने जमाने में शहर में तालाब हुआ करते थे, खुले मैदान हुआ करते थे सड़के भी कच्ची हुआ करती थी फुटपाथ कच्चे होते  थे । तब जब बरसात होती थी और सब जगह पानी भर जाता था तो धीरे-धीरे जमीन पानी को सोख लेती थी और पानी नीचे जाकर जमा हो जाता था। पर आधुनिक करण के चक्कर में मनुष्य ने  पूरे शहर को कंक्रीट और कोलतार से ढक दिया और तालाब गायब करके उनकी जगह मल्टी स्टोरी बिल्डिंग  खड़ी कर दीं। इस वजह से शहर में जो पानी बरसता है वह जमीन पर नहीं जाता है।

पानी के दुरुपयोग की वजह से  आगे भविष्य निराशाजनक दिखाई देता है।

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Tuesday, 26 March 2024

जब मैं छोटा बच्चा था

मेरा पहला स्कूल

मेरे ख्याल से मेरी उमर 4 साल रही होगी जब मेरा एडमिशन सेंट मेरी कौन्वेट स्कूल में लोअर केजी क्लास में हो गया । लोअर केजी क्लास में कुछ पढ़ाते नहीं है । बच्चों को खिलौने दे के खेलने के लिए कहते हैं या फिर एबीसीडी वाली किताब में एबीसीडी सिखाते हैं । कोई इम्तिहान भी नहीं होता है।

  मैं और मेरी दीदी ,जो मुझे दो साल बड़ी है,   घर में काम करने वाले मलहू नाम के एक  आदमी के साथ स्कूल जाते थे । छोटा शहर था स्कूल कोई आधे मील दूर था। आधा रास्ता सीमेंट वाली पक्की सड़क का था और उसके बाद आधा रास्ता कच्ची सड़क थी जिससे बरसात में पानी के गड्ढे होते थे। बरसात के दिनों में अक्सर उस पर अगर कोई मोटर गाड़ी आती थी तो गड्ढों में से पानी और कीचड़ उछालती थी । 

अक्सर सामने से आती गाड़ी को देखकर भी मैं अपने को कीचड़ से बचने की कोई कोशिश नहीं करता था और चलता जाता था पर मेरी दीदी जो काफी होशियार थी तेजी से मलहू के पीछे चली जाती थी तो पानी की पूरी कीचड़ मेरे और मलहू के ऊपर गिरती थी और दीदी को कुछ नहीं होता था। कुछ लोग बचपन म बहुत होशियार होते हैं और कुछ लोग बचपन में बुद्धू होते हैं। 

सेंट मैरीस स्कूल में बहुत से छोटे-छोटे बच्चे थे  पर किसी का नाम याद नहीं है। हां एक लड़के का नाम याद है जिसे बाबा कहते थे और याद इसलिए है कि वह अक्सर क्लास के बाहर बरामदे में टट्टी कर देता था।

स्कूल के दरवाजे पर एक बहुत विशालकाय चिलबिल का पेड़ था और उसमें से चिलबिल नीचे गिरती रहती थी। सभी बच्चे खाली समय में पेड़ के नीचे से चिलबिल बीन कर खाया करते थे। मैंने भी सेंट मैरीस स्कूल में काफी चिलबिल खाई ।

एलजी से मेरा प्रमोशन यूकेजी में हो गया और यहां आकर कुछ किताबें घर ले जाने को भी मिलती थीं जिनमें खूब सी तस्वीर हुआ करती थी रंग-बिरंगी। साल में एक या दो बार एक मेला भी लगता था स्कूल में बच्चों का , जिसे फैंसी फैयर कहते थे ।अभी तक याद है कि उसमें एक खेल होता था जिसमें दो आने का एक टिकट लेकर लकी डिप किया करते थे। एक मछली के कांटा जैसा हुक एक बंद मटके के अंदर डाला जाता था और उस पर फंसकर जो भी खिलौना आ जाता था वह हमारा हो जाता था।

स्कूल के बगल में पिताजी का ऑफिस था जहां के वह सबसे बड़े औफिसर थे । तो हम लोग अक्सर पापा के  दफ्तर चले जाया करते थे क्लास के बाद और वहां समर हाउस के अंदर जाकर खेलकूद क्या करते थे। अभी तक याद है कि दफ्तर में बोटल ब्रश के कई पेड़ थे जिनमे लाल बोटल ब्रश की शक्ल के फूल भरे रहते थे पेड़ में। उसमें से इलायची की महक आती थी।

 उसी साल शहर में हूफिंग कफ  बच्चों में फैलने लगा और मुझे भी हो गया। खांसते-खांसते बुरा हाल हो जाता था । इसके बाद मुझे स्कूल से निकाल दिया गया। 

स्कूल से निकाल देने के बाद दो-तीन साल तक मेरी शिक्षा घर पर ही हुई और उसके बाद सीधे छठी क्लास पर मेरा एडमिशन करा दिया गया।
उस दौरान घर पर पढ़ाने के लिए राजबली सिंह नाम के एक मास्टर आया करते थे जो हमें सभी विषय पढ़ाया करते थे और जो बहुत से विषय खेलकूद की तरह मजेदार स्टाइल में पढ़ाते थे। गणित के सवाल करने के लिए वह हमारे लौन के (जो काफी बड़ा था)  एक छोर पर दो मेज पर जोड़ घटाने के सवाल रख देते थे। फिर दूसरे छोर पर मैं और दीदी खड़े होते थे और जब सिटी बजती थी तो दौड़ के दूसरे छोर पर जाकर सवाल करते थे और वापस अपने पहले वाले स्थान पर आ जाते थे। जो पहले आ जाता था वह जीत जाता था।

उसे जमाने में  बच्चे स्कूल में कभी-कभी  जाड़े के मौसम में पेड़ के नीचे भी पढ़ते थे गर्मियों में काफी लोग बाहर सोते थे।अब तो सब कुछ बदल गया है । बच्चों के आउटडोर क्या खेल होते हैं ज्यादातर बच्चों को तो यह भी पता नहीं है। सब मोबाइल में गेम खेलते रहते हैं।

उस कॉन्वेंट स्कूल में और बाद में लड़कों के स्कूल में जो अंतर मैंने देखा वह मुख्य रूप से सफाई का था । कॉन्वेंट स्कूल बहुत साफ सुथरा था और सभी टीचर बहुत ही सभ्य और समझदार मालूम होते थे । बाद में स्कूल में क‌ई तरह के नमूने देखे और स्कूल में  गंदगी भी। लड़कों के स्कूल में पिटाई बहुत होती थी पर क्योंकि मेरे पिताजी को उसे छोटे शहर में काफी लोग जानते थे इसलिए वहटी से बचा रहता था।

 मैं और दीदी मलहू के साथ शाम को क्लब जाया करते थे खेलने के लिए । वहां बच्चों का पार्क था। इस क्लब में रोज शाम को मैं और दीदी अक्सर पार्क में खेलने के बाद अंदर जाकर शरबत पिया करते थे और अगर पापा बिलियर्ड खेल रहे होते थे तो वहां जाकर चिप्स खाने को भी मिल जाते थे। 

इलाहाबाद शहर की बातें

अन्य शहरों की तरह ही इलाहाबाद भी आज बहुमंजिली इमारत का  जंगल और सैकड़ो वाहनो वाला भीड़भाड़ का शहर बन चुका है।

इलाहाबाद  बहुत ही पुराना शहर है और इसका सैकड़ो सालों का इतिहास है। पहले यह सिर्फ एक तीर्थ स्थान था गंगा यमुना और सरस्वती नदी का संगम। फिर जसे-जैसे विदेशी आक्रमणकारियों का आगमन हुआ तो शहर का नक्शा बदलता चला गया। अंत में यहां ब्रिटिश साम्राज्यवादी आए और इलाहाबाद का एक नए सिरे से विका किया गया।

इसका नाम प्रयाग था जो भारत के सबसे प्रसिद्ध तीर्थ में से एक था। मुगलों ने इसका नाम बदल कर इलाहाबाद रख दिया और अंग्रेजों ने स्पेलिंग की हेरा फेरी करके इसे Allahabad कर दिया। तभी से यह इसी नाम से जाना जाता था 21सदी में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने से पहले ।

अब पुराना नाम वापस आ गया है , प्रयागराज।

वैसे तो 18 वीं सदी में अंग्रेजों की नजर इलाहाबाद पर पड़ चुकी थी और 19वीं सदी के शुरू  में यहां पर अंग्रेजों ने अपने पैर जमाने शुरू कर दिए थे पर 1857 के बाद ही अंग्रेजों का इलाहाबाद पर पूरा कब्जा हुआ जब ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटेन के महारानी विक्टोरिया ने भारत का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।

 उत्तर प्रदेश को पहले यूनाइटेड प्रोविंसेस औफ आगरा एंड अवध के नाम से जाना जाता था और इसकी राजधानी अंग्रेजों ने इलाहाबाद में स्थापित की। फिर बहुत तेजी से विकास हुआ इलाहाबाद का। 

कोलकाता से दिल्ली को जाने वाली रेलवे लाइन के एक तरफ पुराने जमाने का पूरा इलाहाबाद शहर बसा हुआ था पुराने जमाने का और इसकी दूसरी तरफ के गांवों को अंग्रेजों ने खाली करवा कर यहां पर आधुनिक इलाहाबाद का निर्माण करना शुरू किया । अंग्रेजों के बनाए इस नए इलाहाबाद को सफेद इलाहाबाद भी कहते थे और यहां सिर्फ सफेद चमड़े वाले अंग्रेजी बसते थे।
बहुत ही अच्छी प्लानिंग वाला नया इलाहाबाद शहर था। अंग्रेजों ने यहां पर बहुत ही चौड़ी सड़क बनाई और सड़क के दोनों और आधुनिक इमारतें खड़ी की। सिविल लाइंस का इलाका भारत की स्वतंत्रता के कई साल बाद भी एक स्वच्छ और अच्छी नगर प्लानिंग का उदाहरण पेश करता था।

अंग्रेजों के इलाहाबाद शहर को देखकर लगता है कि अंग्रेजों ने बहुत सोच समझ कर इसका विकास किया। सिविल लाइंस में एक खूबसूरत मार्केट का निर्माण किया , उसके पीछे दूर-दूर तक बड़े-बड़े सुंदर बंगले और चौड़ी सड़कों के दोनों तरफ हरियाली से भरे पेड़ लगाए। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का निर्माण हुआ। 


एक विशाल पार्क बनाया जिसका नाम अल्फ्रेड पार्क रखा।
अल्फ्रेड पार्क को अब चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है क्योंकि यही पर स्वतंत्रता संग्राम  सेनानी शहीद चंद्रशेखर आजाद को साम्राज्यवादी ताकतों ने  गोलियों से भून डाला था।
कई दशक पहले मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का छात्र रह चुका हूं और वहां के एक हॉस्टल में रहता था। उस जमाने में इलाहाबाद शहर काफी हद तक अंग्रेजों के समय जैसा ही था यानी ताबड़तोड़ बिल्डिंग निर्माण, सड़कों पर दुकानों का कब्जा, शहर में बढ़ती गंदगी और इलाहाबाद शहर की आबादी का बढ़ना नहीं हुआ था। तब यूनिवर्सिटी से सिविल लाइंस तक का इलाका बहुत ही सुंदर और शांत हुआ करता था। सिविल लाइंस की मार्केट जो बाद में बिल्डिंगों का जंगल बन गई थी साफ सुथरी एक मंजिल मार्केट वाली  साफ सुथरी बाजार थी। सिविल लाइंस मार्केट के मुख्य चौराहे की खूबसूरती उसके खुलेपन में थी

बड़े चौराहे के पास ही प्लाजा सिनेमा हुआ करता था जहां हिंदी फिल्में दिखाई जाती थी।

उसे गोल चक्कर से एक ओर एक सीधा रास्ता एक बहुत ही सुंदर चर्च की तरफ जाता था

उस सड़क के बांई ओर पैलेस‌ सिनेमा हुआ करता था जहां सिर्फ अंग्रेजी पिक्चर ही दिखाई जाती थी। दाहिने तरफ इसी सड़क पर मुख्य बाजार थी एक मंजिली जिसमें तरह-तरह की दुकान थी जैसे कोहली फोटोग्राफर,  जनरल मर्चेंट की दुकान किंग एंड कंपनी, लकी स्वीट मार्ट, मैस्टन टेलर्स और जूते की दो-तीन दुकान। प्लाजा सिनेमा के ठीक सामने का हिस्सा खाली प्लॉट था जिस पर बाद में बिल्डिगों का जंगल हो गया।

जहां तक सिनेमा घरों की बात है तो हम लोग अक्सर चौक की तरफ भी जाते थे सिनेमा देखने चौक में बहुत पुराने जमाने के सिनेमाघर थे ।
एक का नाम याद है,  विशंम्भर टॉकीज।
उससे काफी पहले रेलवे के ब्रिज से चौक इलाके में दाखिल होते ही उसे जमाने का सबसे आधुनिक सिनेमाघर निरंजन था जब शायद बंद हो चुका है। हम लोग अक्सर रविवार के दिन शाम को पिक्चर देखने चले जाते थे निरंजन में और निरंजन के ठीक नीचे ही एक रेस्टोरेंट है रात का भोजन कर लेते थे क्योंकि उसे दिन हॉस्टल में रात का भोजन नहीं मिलता था।

भारत में आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है और गांव से शहरों की ओर काफी आबादी का पलायन हुआ है इसलिए हर शहर की आबादी चौगुनी हो चुकी है। यही हाल है इलाहाबाद का भी है पर हमारी याददाश्त में तो अभी भी वही पुराना सुंदर खुला हुआ साफ सुथरा पुराना वाला इलाहाबाद ही है। वही पुराना पैलेस सिनेमा हॉल, वही पुराना कॉफी हउस, वही पुरानी साइकिल रिक्शा जिस पर बैठकर हम 25 पैसे में अपने हॉस्टल से सिविल लाइंस आते खाली खुली साफ सड़कों पर।

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आज का मनुष्य

एक विज्ञापन बहुत पहले आया था । शायद वाशिंग पाउडर का था जिसमें एक आदमी कहता है उसकी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद क्यों। 

सारी दुनिया इसी मानसिकता पर जी रही है ।अगर दूसरे के पास मुझसे ज्यादा है तो जिंदगी भर मैं कुढ़ता रहूंगा चाहे मेरे पास कितने ही सुख सुविधा हो।


अंग्रेजी में कहावत है count your blessings। मतलब यह है कि ऊपर वाले ने जो आपको दिया है उसको देखिए । यह मत देखिए कि दूसरे को क्या दिया है। अपने से गरीब आदमी को देखिए जिसको खाना नसीब नहीं हो रहा है और आपके पास तो एक स्कूटर भी है फिर भी आप अपने किस्मत को रो रहे हैं

कभी आपने  यह सोचा है कि आप कितने किस्मत वाले हैं ॽ 

मानव सभ्यता के शुरू में मनुष्य जंगल में रहता था। चारों तरफ जंगल ही जंगल थे । खतरनाक जानवर पूरे जंगल में घूमते रहते थे शिकार की तलाश में। आजकल की तरह मनुष्य मकान मे नहीं रहता था। उसके पास कपड़े भी नहीं थे । नंगा घूमता था। सुबह से शाम तक खाने की तलाश में रहता था। अपने को जंगली जंगली जानवरों से दिन भर बचाता रहता था। उसे रात में सोने के लिए स्थान ढूंढना पड़ता था सुरक्षित किसी गुफा में या पेड़ के ऊपर। 

भोजन की बड़ी समस्या होती थी। सुबह से शाम तक भोजन ढूंढना पड़ता था। किसी पेड़ का फल तोड़कर खा लिया किसी पौधे की जड़ को खा लिया। या फिर अपने से कमजोर जानवर को मार कर खा लिया। आजकल की तरह किसी रेस्टोरेंट में जाकर दाल चावल रोटी का आर्डर नही दे सकता था । बंद कमरे में सुरक्षित होकर चारपाई पर कंबल ओढ़ के सो नहीं सकता था। बीमार होने के बाद उसके पास कोई दवाई नहीं थी कि एक गोली खाई और पानी पी लिया और फायदा हो गया। इस बात पर  मनन कीजिए और समझने की कोशिश कीजिए। 21वीं सदी में आप जितने भाग्यवान है उतना मानव जाति में पहले कभी कोई नहीं हुआ था।

एक जमाने में तिलस्मी कहानियां होती थी। खुल जा सिम सिम कहते ही दरवाजा खुल जाता था ।
ताली बजाने से बहुत से कम हो जाते थे। आज यथार्थ में यह सब हो रहा है। और आगे क्या होना है इसकी तो कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बहुत तेजी से विकसित हो रही है। 21वीं सदी के शुरू में ही इंटरनेट ने पूरी दुनिया को पूरी तरह से बदल दिया है।  आप मोबाइल का बटन दबाकर कोई भी फोटो एक सेकंड में दुनिया के किसी कोने में भी भेज सकते हैं । आप दुनिया के दूसरे छोर में रहने वालों से बातचीत कर सकते हैं। आप घर में ही बैठकर मोबाइल के बटन दबाकर बाजार से बहुत कुछ खरीद सकते हैं और बटन दबाकर अपने बैक के अकाउंट से पैसे निकाल कर payment  सकते हैं ।

तो जरा सोचिए कि हम आदि मानव से कितने आगे आ चुके हैं और जीवन के सब सुख सुविधा दुनिया के करीब करीब सभी लोगों को उपलब्ध है।

 समस्या यह है कि मनुष्य ने विज्ञान में अपनी सुख सुविधाओं के लिए तो बहुत ही अधिक प्रगति कर ली है पर उसके मानसिक विकास के बारे में विज्ञान ने कुछ नहीं किया है। आज से हजारों साल पहले जो मानसिकता थी वही मानसिकता आज भी है। शायद  मानसिक रूप से और भी ज्यादा गिर गया है। 

यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि इतनी अधिक सुख सुविधा होने के बावजूद भी आज भी वह सोचता है कि दूसरे की कमीज उसकी कमीज से ज्यादा सफेद क्यों है।
विज्ञान की प्रगति तो हुई है पर मनुष्य अच्छा कैसे हो सकता है इस पर कोई प्रगति नहीं हुई है।
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