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Tuesday, 28 April 2020

मूक प्रश्न

" मूक प्रश्न "

एक जमाना था जब हमारा साइज बहुत छोटा हुआ करता था । तब  हम बच्चे  कहलाते थे और हाफ पैंट पहनते थे।

उस जमाने में शहर छोटे थे और मकान बड़े होते थे। सड़कों पर मोटर गाड़ियां इक्की दुक्की कभी-कभी दिखाई दे जाती थी । पेड़ों पर चिड़िया चहचहाती रहती थी और मधुमक्खी और तितलियां फूलों के ऊपर मडराती नजर आती थी।  तोते नीलकंठ कठफोड़वा  और ऐसे ही अनेक पक्षी हमेशा दिखाई देते रहते थे। आसमान साफ रहता था । हवा में ताजगी थी। रात में हजारों तारे पूरे आकाश पर छिटके पड़े रहते रहते थे और उत्तर से दक्षिण की तरफ  बीच आकाश में पूरी आकाशगंगा दिखाई देती थी।

 फिर हम बड़े हो गए । फुल पैंट पहनने लगे। शहर भी बड़े होते चले गए। शहर में आबादी बढ़ने लगी। मकान छोटे होते चले गए। गंदगी बढ़ती चली गई।

फिर धीरे धीरे आकाश में तारे दिखने बंद हो गए । घर के बाहर फूल पत्तियों के ऊपर से तितलियां और भवरे दिखाई देने भी बंद होने लगे । जो रहे सहे पेड़ बचे थे उन पर भी चिड़ियों का कोई झुंड नजर नहीं आता था।

चिड़िया परेशान। भँवरे परेशान। मधुमक्खियां परेशान। तितलिया परेशान ।आकाश परेशान । पेड़ पौधे परेशान। और इंसान अपने पूरे नशे में प्रकृति को नष्ट करने का खेल खेलता जा रहा था।

फिर एक दिन एक छोटे से कीटाणु ने जिसे आप देख भी नहीं सकते थे मनुष्य पर हमला कर दिया। मनुष्य मरने लगे । विज्ञान उनको बचाने में असफलता में धिरता नजर आया। पूरे संसार में हाहाकार मच गया। फैक्ट्रियां बंद हो गई । सड़कों पर यातायात गायब हो गया । सड़कों पर कूड़े के ढेर इकट्ठे होने बंद हो गए। सब मनुष्य जान बचाने के लिए अपने अपने घरों में बंद हो गए । कार चलनी बंद हो गई । सड़कें वीरान हो गई। काफी लोग वापस अपने गांव चले गए । मिल और फैक्ट्रियां  जो नदिया में अपना जहर उगल रही थी  वह भी बंद हो गईं।  फैक्ट्रियों से धुआं के काले गुबार निकलने बंद हो गए।

फिर धीरे-धीरे  नदियों का पानी  साफ होने लगा । फिर धीरे-धीरे आसमान साफ होने लगा। तारे फिर से दिखाई देने लगे । आकाशगंगा के भी दर्शन होने लगे । तितलियां भंवरे फिर फूलों के ऊपर वापस आने लगे । चिड़िया फिर से चहचहाने लगी ।  जिन जानवरों को  सड़क पर स्वछंद घूमने की अनुमति नहीं थी वह वापस खुली दुनिया में घूमने लगे और मनुष्य अपने घरों के अजायबघरों में बंद हो गया । 

यह खेल काफी दिनों तक चला । लाखों मनुष्य की मृत्यु हो गई । 

जब विनाश का यह दौर खत्म हुआ तब एक मूक  प्रश्न उठा। क्या हम वापस उस पुराने युग में फिर चले जाएंगे ? क्या तारे फिर से दिखने बंद हो जाएंगे? क्या भंवरे तितलियाँ  फिर प्रकृति से गायब होने लगेगी ?  चिड़ियाँ क्या फिर विनाश की ओर चली जायेंगी। 

इस सवाल का जवाब बहुत जरूरी है क्योंकि जब दोबारा मनुष्य प्रकृति के विनाश में जुट जाएगा तो फिर दोबारा जो वाइरस आएगा वो अपने साथ इंसान की प्रजाति को भी ले जाएगा . . . हमेशा के लिए । 

जैसे डाईनासोर को कभी ले गया था। 

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Wednesday, 8 January 2020

THE COMING DELUGE

MAN is helpless against the powers of  NATURE , howsoever great may be his scientific achievement. 

THAT'S WHY THE ANCIENTS, IN THEIR WISDOM, RESPECTED AND WORSHIPPED  NATURE ALL OVER THE WORLD.

The mind-blowing massive wild fires, the disastrous floods, the unstoppable rising sea levels, the fast receding ground-water table on which the land rests , the large-scale melting polar regions, the doomed sinking city of Jakarta are all  nature's warnings to complacent MAN, a WAKE UP call. 

https://www.wired.co.uk/article/jakarta-sinking

According to ancient Hindu texts, TIME moves in cycles intervened  by DELUGE (pralaya). The last one was at the end of DWAPAR cycle ( the Deluge of Old Testament ? ) some five thousand years back. 

Are we fast-tracking towards the next  DELUGE (PRALAY)? Are we in the process of cutting the very branch of the tree on which we are sitting ?

अमीन सयानी

एक जमाने में  रेडियो के महानायक थे अमीन सयानी जो बिनाका गीतमाला हर बुधवार को रात के 8:00 बजे पेश किया करते थे Radio Ceylon पर ।

बिनाका गीतमाला के समय पर  सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था और लोग बड़े बड़े रेडियो सेट्स  के चारों तरफ एकत्रित हो जाते थे। (यही हाल महाभारत सीरियल के समय भी हुआ था टेलिविज़न के शुरूआती युग में)।

बिनाका गीतमाला प्रोग्राम सन 1952 में शुरू हुआ। 

जो बात अमीन सयानी के पचास के दशक की रेडियो सिलोन की बिनाका गीतमाला में थी वह फिर कभी नहीं आ पाई।

Friday, 13 December 2019

पुरानी बातें

पुरानी बातें

एक जमाना था जब पॉलिस्टर के कपड़े नहीं होते थे । कपड़े सूती होते थे - कॉटन के । अच्छे कपड़े पहन कर थोड़ी देर चारपाई पर लेटने से कपड़ों में सिलवट आ जाती थी और इस्त्री खराब हो जाती थी। आजकल तो आप  घंटो की नींद भी निकाल लीजिए  कपड़े  वैसे के वैसे ही रहते हैं।

तब कपड़े धोबी धोता था । घर में कपड़े बहुत कम धुलते थे क्योंकि वाशिंग पाउडर नहीं होता था । साबुन की बट्टी से कपड़े घिसने पड़ते थे जो मेहनत का काम होता था । 

हमारे घर में कल्लू धोबी एक बार हफ्ते में आता था ढेर सारे धुले कपड़े लेकर।  साथ में उसका गधा भी  आता था जिस पर सभी घरों के कपड़े लदे होते थे। 

उस जमाने में गधे का बहुत महत्व था ।.यह मान्यता थी कि जब बच्चे  इम्तिहान   की तैयारी कर रहे हो उस  वक्त जो पढ़ रहे हो वह इम्तहान में जरूर आता था अगर उस समय गधा रेकने लगे यानि ढेंचू ढेंचू करने लगे।

 धोबी गधे की  पीठ से धुले कपड़े निकालता  और माता जी धोबी की कॉपी ले कर आ जाती थीं। वह कपड़े निकालता जाता था _  6 शर्ट 5 पेंट चार साड़ी 5 चादर 8 तकिया गिलाफ इत्यादि । कमीज के  बटन गायब होते थे, पैंट के कहीं कोने में जंग का दाग होता था। छोटे कपड़ों की धुलाई एक आने होती थी और बड़े कपड़ों की दो आने। धोबी के जाने के बाद कपड़ों को किसी चारपाई पर फैला के धूप में रख देते थे ताकि उसमें से रेह मिट्टी की अजीब सी महक निकल जाए । 

धोबी तब कपड़े भट्टी में रेह मिट्टी के साथ उबाल कर धोते थे । और फिर नदी या तालाब के किनारे पत्थर के स्लैब पर पटक पटक कर  साफ करते थे।

फिर साठ के दशक में टेरीलीन (पोलीस्टर) के कपड़े आने लगे। डिटरजेन्ट पाउडर भी आ गया। ललिता जी भी आ गईं। लोग घर में कपड़े धोने लगे।फिर धोबी गायब हो गए , गधे भी।

उस जमाने में 1:00 बजे लंच खाने का फैशन नहीं था । ज्यादातर लोग  खाना सुबह 10:00 बजे खा लेते थे। खाना हम लोग रसोई घर में ही खाते थे। तब घरों में  अलग से डाईनिंग रूम नही होते थे और रसोईघर काफी बड़ा होता था। गरम गरम रोटी चूल्हे पर चढ़े तवे से निकाल कर लकड़ियो की आग मै फुलाई जाती और हम सभी को दी जाती थी बारी बारी से। तब गैस का चूल्हा नहीं था।

हमारे बचपन में न तो मैगी था न चाऊ मिन। नाश्ते में शुद्ध घी की पूरी और आलू के गुटके होते थे। नाश्ता शाम चार बजे मिलता था जब हम स्कूल  से लौटते थे। बे टाइम की भूख के लिये घर की बनी मठरी, सकरपाले, च्यूड़ा-मुंगफली वगैरह होते थे। फेरी वाले भी कमलगट्टा , गन्ने की गडेरी (कैरम की गोटियों जैसे टुकड़े) कभी कभार ले आते थे।

एक्की दुक्की मोटरे होती भी तब। तांगे और इक्के काफी थे। साइकिलें भी। 

शहर तब छोटे होते थे। लोग पैदल काफी चलते थे। उस जमाने में सबसे सस्ते और टिकाऊ जूते कानपुर के फ्लैक्स के होते थे। बाटा के कैनवस के जूते भी सस्ते और मजबूत होते थे।  नैनीताल और लखनऊ में कई दुकाने चाइनीस जूते वालों की भी थी जो बहुत ही मजबूत जूते बनाते थे ।  मोजे सूती होते थे (कॉटन के) जो बहुत जल्दी फट जाए करते थे। 1958 में जब पहली बार polyester का मोजा आया तो उसके दाम साढ़े तीन रुपए थे जो आजकल के  ₹400 के बराबर है । पहली पोलिस्टर की कमीज harvest tone brand की आई थी मार्केट में सन् 1958 में और वह उस जमाने के तीस रूपये की थी जो आजकल के ₹4000 से ज्यादा ही है।

आजादी के बाद नेताओं ने सोशलिज्म पर ज्यादा जोर दिया और "सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसाइटी" नाम से उद्योगों का विकास किया जिसमें आमतौर पर घरेलू काम की छोटी मोटी वस्तुओं पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया । नतीजा यह हुआ कि बाहर से आने वाले बढ़िया शेविंग ब्लेड पर बहुत ही ज्यादा ड्यूटी लगने से वह आम आदमी की पहुंच के बाहर हो गए और ब्लैड्स का अकाल पड़ गया। दाढ़ी मूछ बनाना यानी शेविंग करना बहुत महंगा पड़ने लगा।

 तब एक नया ब्लेड मार्केट पर आया जिसका नाम था भारत ब्लेड । उससे दाढ़ी बनाने में जगह-जगह गाल कट जाता था और फिटकरी का बहुत इस्तेमाल करना पड़ता था।

यादों का सिलसिला तो लम्बा है पर बाकी फिर कभी।

Friday, 22 November 2019

On the road

On the road."

As we came out of Charbagh Railway Station we were greeted by a chorus of loud shouts of  "Aaiye sahib idhar aayiye "  (come this way sir)  by the  horse-drawn Tanga drivers.

we chose a sturdy new tanga. The elders settled in the back seats of the Tanga and kids were helped  up to the front, safe, seats. The big black trunk, the holdall and the suitcase were  pushed into the ample luggage space under the seats on the footboard by the red-shirted coolie who had carried our luggage from the train.

The Tanga driver touched the back of the horse lightly with the whip and on cue the horse began trotting. Another light flick of the whip on its back made the horse pick up speed.  Time and again the horse raised his tail and farted. Sitting right behind the horse's tail, I faced this barrage of  farts and droppings as the horse cantered along the road through light traffic. . . . .

Now a word about the Tanga. It was one of the three types of horse drawn carriages then in common use, around 1950 . Cycle rishaw came later and auto-rikshaw much  later. The affluent class had  their own private Tuntums.  Public transport was provided by Tanga and Ekkathe latter being a poor man's cheap transport,  an uncomfortable alternative to Tanga. It had a flat hard floor on which the passengers squatted. Devoid of cushions and shock absorbers, even a short journey in an ekka  rattled the occupants.

We have come a long way since. First came the cycle rikshawrobbing the tanga walas of livelihood. Rikshaw was compact and much cheaper and slowly replaced the tanga as the preferred mode of city transport.  Then the city started expanding exponentially and the faster  cheaper auto rikshaw grabbed the major share of longer distance travel.  First of these auto rikshaw were peculiar contraptions driven by powerful bullet motorcycle . Then came factory made Tempo brands in early sixties.These long black contraptions made a huge amount of noisen. They could seat more people and the charges were moderate.

Then came the compact,mass produced, scooter powered auto rikshaw that we see today.They give a comfortable ride, occupy less of road space and are fast.

Lately electric vehicle are replacing the traditional vehicles and so we have what are known as E- rikshaw.These are slow moving uncomfortable vehicles but  have taken a good share of public transport.

For the present auto rikshaws rules the roost.  The city is now getting to the next generation city transport - THE METRO !! 

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Tuesday, 19 November 2019

Kunjapuri temple and Narendra Nagar

KUNJAPURI TEMPLE AND NARENDRA NAGAR

Kunjapuri Temple is a Devi temple in Tehri Garhwal Uttarakhand India , dedicated to the Goddess Sati .The  temple is located on the top of Kunjapuri hill at an altitude of 1645 meters . It lends a panoramic view of the Himalayan peaks to the North and Rishikesh, Haridwar and the Doon valley to the South. It is on route from Rishikesh  to uttarkashi, about 8 kms, from the town of Narendra Nagar.

The present town of Narendra nagar came into existence in 1919 when Maharaja Narendra Shah of Tehri Garhwal moved his capital from Tehri as this was  a more picturesque location with an extraordinary scenic beauty and was close  to the plains below. On a clear day you get an magnificent view of Ganga flowing from mountains to Plains of haridwar.

Narendra Nagar was the district headquarters of Tehri Garhwal for long time and has a small well developed township. There is central market along the highway that passes through the town .  There is a Shiv temple in Narendra Nagar where there is a huge statue of Nandi, the biggest in North India, sculpted by Sri Avtar Singh Panwar. This was inaugurated in 1960 by the then District Magistrate of Tehri district, Sri Daya Nand Joshi.There is a plaque at the base of the statue commemorating this.

The district headquarters was later shifted to New Tehri city.

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Monday, 18 November 2019

राम जेठामलानी और नानावती कांड

नानावती कांड और ब्लिट्ज का धमाका


 अब से कोई साठ साल पहले1959 में नानावती के केस ने  (google search The Nanavati Case) पूरे विश्व में सनसनी फैला दी थी और BLITZ नाम के साप्ताहिक पेपर को भारत का सबसे ज्यादा बिकने वाला पेपर बना दिया था। 


नानावती भारतीय नौसेना के एक कमांडर थे जो अपनी ब्रिटिश पत्नी और बच्चों के साथ बंबई (अब मुंबई) में रहते थे और अपनी ड्यूटी के सिलसिले में ज्यादातर बाहर ही रहते थे। उनकी गैरहाजरी के दौरान उनकी पत्नी सिल्विया  अहूजा के प्रेम पाश में फंस गईं थी। 

जब नानावती वापस घर आते हैं और अपनी पत्नी को बहुत उदास पाते हैं तो काफी पूछताछ करने पर उन्हें पता चलता है उनकी पत्नी और आहूजा के  बीच संबंधों के बारे में। 

उस शाम को नानावती का अपने परिवार के साथ किसी फिल्म को देखने  जाने का प्रोग्राम था । वह अपने बच्चों और पत्नी को सिनेमा हॉल छोड़ जाते हैं और खुद सीधे  अपने दफ्तर  जाते हैं, एक पिस्टल अपने नाम issue कराते हैं और फिर सीधे प्रेम आहूजा के दफ्तर पहुंच जाते हैं।

वहां पता चलता है कि  प्रेम आहूजा घर पर ही है। नानावती उनके घर पर पहुंच जाते हैं । कहा जाता है के अंदर घुसते पर उन्होंने देखा कि आहूजा तौलिया लपेटकर बाथरूम से निकल रहे हैं। उन्होंने आहूजा से पूछा की क्या वे सिलविया से शादी करने के लिए तैयार है। आहूजा का जवाब था कि वह हर उस लड़की से शादी नहीं कर सकते जिनके साथ उनका अफेयर है। 
आपस में बहस होती है दोनों की। फिर गोलियों की आवाज से वह इलाका गूंज उठता है। प्रेम आहूजा मर जाता हैं।

वहां से वह सीधे पुलिस की डिप्टी कमिश्नर के पास जाते हैं और अपना अपराध कबूल करके अपने को पुलिस के हवाले कर देते हैं। 

फिर मुंबई की अदालत में नानावती के ऊपर केस चलता है। 

साप्ताहिक मैगजीन Blitz इस  केस को लेकर काफी विस्तार से रिपोर्ट देती रहती है। इस केस पर पूरे देश में सनसनी मची थी इसलिए विस्तृत रिपोर्ट देने के कारण इस दौरान Blitz की साप्ताहिक प्रतिया मुश्किल से मिल पाती हैं और एक-एक कॉपी जो  25 पैसे की हुआ करती थी दो दो रुपए में बिकती है!
  

 फिर Jury trial हुआ (उन दिनों Jury trial होता था) । नानावती को  jury ने निर्दोष बताया और उन्हे बरी कर दिया जाता है।

आहूजा की बहन  नानावती के खिलाफ अब उच्च न्यायालय में case ले जाती है और legal team मे राम जेठमलानी होते हैं। high court  में  नानावती को life imprisonment की सजा मिलती है। 



तीन साल जेल में काटने के बाद बंबई के गवर्नर के स्पेशल powers के आधार पर नानावती की बाकी सजा माफ कर दी जाती है और वह अपने परिवार के साथ हमेशा के लिए कनाडा चले जाते हैं। 

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नकल में अकल

आपने  बहुत पहले शायद एक फिल्म देखी होगी जिसका नाम था "एक रुका हुआ फैसला" । बहुत ही बढ़िया फिल्म थी जिसमें सभी कलाकारों ने बहुत ही अच्छा काम किया था  खासकर पंकज कपूर ने ।

क्या आपको पता है कि यह फिल्म हॉलीवुड के अल्फ्रेड  हिचकौक  की एक बहुत ही मशहूर फिल्म की नकल थी -  डिट्टो सीन बाय सीन। उस फिल्म का नाम था "12 एंग्री मैन" और वह 1957 में आई थी । 

वैसे तो बॉलीवुड में नकल की बहुत फिल्म बनती है पर यह ऐसी नकल थी जो कि असल के ही टक्कर की थी। 

 यदि यदि आप अपने दोनों फिल्मों में से कोई भी फिल्म नहीं देखी है  तो आपको मौका मिले तो यह दोनों फिल्में अवश्य देखिए।

टेलीविजन तब और अब

टेलीविजन तब और अब

एक ज़माना था जब टीवी का मतलब  दूरदर्शन  हुआ करता था।  सिर्फ एक चैनल। ह्ल्के फुल्के विज्ञापन। 

तब छत पर टी०वी० का एन्टिना होता था।हम लोग छत पर जाकर  टेलीविजन का एनटीना ठीक करते थे ताकि programme  साफ साफ  दिखाई दे। फिर नीचे आ  कर सभी प्रोग्राम देखते थे. . . एडवर्टाइजमेंट को भी नहीं छोड़ते  थे।

 उस जमाने में जो विज्ञापन आते थे उनकी बात ही कुछ और थी। उनको देखकर मजा आता था . . उनको काफी दिनों तक याद भी करते थे हम।

 आज हम उन्ही विज्ञापनों की बात करेंगे।

80s के दशक में शाहिद कपूर  और आयशा टाकिया दोनों का ही बचपन था । तब  एक एडवर्टाइजमेंट आया था। शायद आपको याद होगा यदि आप उस जमाने के हैं ।  शाहिद कपूर और आयशा टाकिया के हाथ में प्याले है और दोनों कुछ पी रहे हैं। फिर एक साथ हाथ ऊपर उठाकर दोनों कहते हैं "आई एम ए कौम प्लान बौय . . . . आई एम ए कॉम प्लानगर्ल " यह ad काफी पॉपुलर हुआ था।   

उसी ज़माने में फिर एक और विज्ञापन आता था . . . "आई लव यू रसना" . . . छोटी बच्ची हुआ करती थी जो  यह कहती थी । अब तो ज़माना बीत गया और उस बच्ची के बाल अब सफेद होने लगे हैं ! सुना है कि वह आजकल नागपुर मे रहती है।

उसी जमाने में अमजद खान भी एक विज्ञापन में आए थे । तब तक वह गब्बर सिंह के रूप में काफी फेमस हो चुके थे । इस विज्ञापन में  वह अपना हाथ का ढाई किलो का पंजा ऊपर उठाते हैं और हाथ मे एक बिस्किट का एक पैकेट  होता है।  "गब्बर की असली पसंद" और वह विज्ञापन था "ग्लूकोज डी" बिस्किट का । . . . अब तो दोनों ही नजर नहीं आते हैं  . . . . 

एक और विज्ञापन था काफी इंटरेस्टिंग . . . एक स्मार्ट आदमी एक रेस्तरां में एक टेबल पे बैठा हुआ है और सामने वाली टेबल पर खूबसूरत सी युवती बैठी है। युवती ने अपना एक हाथ कान के पास रखा हुआ है । वह व्यक्ति उस की तरफ देखता है तो वह मुस्कुराती है और कहती है "हेलो ! आज शाम को आप क्या कर रहे हैं " । वह तो बहुत प्रसन्न हो जाता है . . . अपनी टेबल से उठता है और उसकी टेबल के पास आकर खड़ा हो जाता है . . .  उसकी तरफ देखने लगता है । असल में वह लड़की अपने  Ericsson मोबाइल फोन में बात कर रही होती है अपनी एक दोस्त से ।  वह  उस आदमी को सामने खड़ा देखकर होटल का बेरा समझती है और कहती है " एक ब्लैक कॉफी ले आओ "। इसके बाद उस आदमी का चेहरा देखने लायक था।

उस जमाने में ललिता जी भी बहुत प्रसिद्ध हो गई थी। चमकदार सफेद रंग की कॉटन की साड़ी जिस पर नीले रंग का प्रिंट था उसे पहनकर वह बाजार में सड़क के किनारे  सब्जियां खरीद रही थी । उस खरीददारी के दौरान वह लोगों को बताती है कि अच्छी चीज और सस्ती चीज में फर्क होता है और सर्फ की खरीददारी में ही समझदारी है. . .

ललिता जी के सर्फ को टक्कर देने के लिए निरमा ने एक बहुत अच्छा विज्ञापन लगाया था जिसमें एक ट्यून और एक गाना था  एक छोटी बच्ची सुंदर सा फ्रॉक पहने हुए  डांस करती थी और एक ट्यून बजती थी . . . " दूध सी सफेदी  . . . .कपड़ों में लाए. . . रंगीन कपड़े भी  . . . खिल खिल जाए  . . . .सबकी पसंद निरमा. . . . वाशिंग पाउडर निरमा।

आपको एक और विज्ञापन की याद दिलाता हूं जो आप शायद भूल गए होंगे। यह बजाज बल्ब का था  . . . एक बूढ़ा आदमी कहता है " . .   जब मैं छोटा बच्चा था . . . . बड़ी शरारत करता था. . . . मेरी चोरी पकड़ी जाती  . . .जब रोशन होता बजाज. . ." यह विज्ञापन भी बहुत पॉपुलर हुआ था।

 एक और विज्ञापन काफी पॉपुलर हुआ था। यह शम्मी कपूर और अशोक कुमार का था। यह तो पूरा याद है:

पत्नी: सुनिए लड़के के माँ-बाप आए हैं
अशोककुमार: अरे! आईये, आईये!
शम्मी कपूर: बारात ठीक आठ बजे पहुँच जाएगी, पर हम आपसे एक बात कहना तो भूल ही गए!
(अशोक कुमार के चेहरे पर घबराहट)
शम्मी कपूर:  घबराईये नहीं, हमें कुछ नहीं चाहिए! हम तो बस इतना चाहते हैं कि आप बारातियों का स्वागत… पान पराग से कीजिए!
अशोक कुमार: ओहो, पान पराग! हमें क्या मालूम कि आप भी पान पराग के शौकीन हैं!… ये लीजिए पान पराग!

उस जमाने में हम सभी विज्ञापन देखते थे। कोई विज्ञापन छोड़ते नहीं थे। और अब ऐसा जमाना आ गया है कि विज्ञापनों से चिढ़ हो गई है और विज्ञापन आते ही चैनल चेंज कर देते हैं।

 किसी ने सही ही कहा है अति सर्वत्र वर्जित है यानी Excess of anything is bad. अब तो TV में प्रोग्राम से ज्यादा विज्ञापन आते हैं और ऐसा लगता है कि हम वहां  सिर्फ विज्ञापन देखने के लिये बैठे है।

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Sunday, 17 November 2019

गंज

गंजिंग

गूगल सर्च कीजिए  सिर्फ "गंजिंग" लिखकर तो सामने सबसे ऊपर लखनऊ के हजरतगंज का  जिक्र आ जाता है। सिर्फ नाम ही काफी है!

एक लंबे अरसे से लखनऊ का हजरतगंज काफी प्रसिद्ध रहा है पर समय के साथ गंज वह ना रहा जो पहले था। तब लखनऊ में कारें बहुत कम थी । गंज की सड़क पर शाम को पैदल चलने वालों  का ही राज होता था।  बीच में से एक्की दुक्की कार धीरे धीरे निकल जाती थी।  अब तो लखनऊ में मच्छरों से ज्यादा कारें हो गई हैं।  गंज तो अब भी है पर अब गंजिंग नहीं हो पाती है सही माने में। जी हां गंज अब बदल गया है।

दुकाने भी बदलती रही हैं। कहते हैं कि जहां पर गांधी आश्रम है आजकल, पहले वहाँ एक कॉफी हाउस हुआ करता था । यह भी सुना है की जीपीओ की शानदार इमारत कभी Ring Theatre के नाम से जानी जाती थी । यहां सिर्फ अंग्रेज लोगों का आना होता था। "Indians not allowed" का बोर्ड लगा होता था। तब जीपीओ वहां हुआ करता था जहां आजकल जनपथ मार्केट है । यह भी सुना है कि जहां पर मेफेयर सिनेमा बिल्डिन्ग है वहां पहले घास का मैदान था जहां शाम को लोग बैठकर करारी मूंगफली खाना करते थे। खैर यह तो बहुत पुरानी बात है।

हमारे जमाने में भी कई मशहूर दुकानें थी जो अब गायब हो गई हैं  । जीपीओ के तरफ वाले कोने पर एक benbows नाम का रेस्टोरेंट हुआ करता था। छोटा सा था, कोने में । वहां की चाय बहुत बढ़िया होती थी। सरदार जी का रेस्त्रां था । दुबले पतले चुस्त सरदार जी। हमेशा सफेद कपड़ों, सफेद दाढ़ी, सफेद पगड़ी में । उनके यहां के coconut cookies बहुत ही स्वादिष्ट थे और धड़ल्ले से बिकते थे । अब वहां पर छंगामल की दुकान आ गई है कपड़ा वालों की। 

हजरतगंज के दूसरे छोर पर हलवासिया के शुरू में पेट्रोल पंप के पास रॉयल कैफे हुआ करता था जो बाद में कपूर्स होटल बिल्डिंग में आ गया। लवर्स लेन तब बहुत लंबी हुआ करती थी । अब तो बिल्डिंग टूट जाने से  कुछ नहीं रह गई है। पूरे लवर्स लेन में मलिक की दूकान के पॉपकॉर्न की खुशबू छाई रहती थी। तब पौपकोर्न नया नया चला था और शायद मलिक की दुकान में पौपकोर्न की पहली मशीन लगी थी।

जहां अब बर्मा बेकरी है वहां पर पहले पुराना यूनिवर्सल बुक डिपो होता था जो बाद में आपसी विवाद की वजह से बंद हो गया और वर्षों तक  बंद पड़ा रहा। BN Rama chemist  की शानदार दुकान भी पहले कई हिस्सों मै बँट गई। एक ही हॉल में कई भाइयों की केमिस्ट, जनरल मर्चेंट वगैरह । और फिर बंद हो गई। वहां उसके बाद कपड़ों की एक बड़ी दुकान खुल गई।

 1960s में  लालबाग में मकबरा कोलोनी की तरफ की गली में एक बहुत छोटा सा रेस्त्रां  हुआ करता था शर्मा चाट हाउस के नाम का। बहुत कम लोगों को पता होगा उसका आजकल । अब वहां कोई रेस्त्रां  नहीं है। उस छोटे से शर्मा रेस्त्रां  में बैठने की जगह मिलना शाम को मुश्किल होता था। चार आने का एक प्लेट दही बड़ा। चार आने के एक  प्लेट दही चटनी के बताशे और चार आने की एक प्लेट आलू की टिक्की। बहुत ही स्वादिष्ट चाट थी उसकी । उसी  मकबरा कॉलोनी में हलवासिया के तरफ की एक गली में मिस्टर सीएल पेपर का मकान हुआ करता था जहां पर पेपर साहब सुबह बैठकर मरीजों के नाखूनों का इंस्पेक्शन करके लोगों की बीमारियां बताते थे और जड़ी बूटियां देते थे। चमत्कारी "डाक्टर" थे पेप्पर साहब।

कॉफी हाउस जो आजकल नरही की तरफ है वह भी अब वैसा नहीं है जैसा पहले था । पहले काफी खुला हुआ था । अंदर हॉल में बैठने की हरे रंग की बेंत की आराम कुर्सियां होती थी। और सफेद ड्रेस, हरी बेल्ट वाले वेटर्स होते थे जिनमें सबसे ज्यादा popular waiter था करीम।  वहां चार आने का एक crisp दोसा और चार आने की एक कप बढ़िया गर्म कॉफी मिलती थी। और मजे की बात यह है कि आप एक कप कॉफी का ऑर्डर देकर दिनभर पंखे के नीचे बैठे रह सकते थे। कोई आपसे कुछ नहीं कहता था कि आप क्यों बैठे हैं।

उस जमाने में रेडीमेड कपड़े ज्यादा popular नहीं थे और दर्जियों का बोलबाला था । हजरतगंज में सबसे मशहूर टेलर्स रामलाल हुआ करते थे जो benbows के सामने वाली बिल्डिन्ग में था। हलवासिया के मकबरा फाटक के दाहिने तरफ भी एक बढ़िया टेलर की दुकान थी। हजरतगंज के बीचोबीच पहले दो सिनेमा हॉल हुआ करते थे - प्रिंस और फिल्मीस्तान। बाद में प्रिंस बंद हो गया और वहां पर शॉपिंग मॉल बन गया।

फिर कई साल तक हजरतगंज में metro rail का काम चलता रहा और सड़क की दुर्दशा हो गई थी। फिर दो अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशन बने ।

अब फिर गंज की सड़को में भीड़ आ रही है पर सिर्फ traffic की - gunjing की नहीं।

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Saturday, 11 May 2019

Rare visitor

http://gnjoshi.blogspot.com/2019/02/here-we-have-rare-vistor-to-park-in.html

Thursday, 7 March 2019

Bicycle once upon a time

The earliest bicycles had pedals attached to their front wheel just as we have in children's.tricycle these days. These bicycles had a massive front wheel and a tiny rear wheel.They were not safe and the rider was always at a safety risk  due to his height off the ground. They were difficult to mount and were only ridden by enthusiasts during the 1870s .

The chain driven  bicycles appeared first in London in  1885  (designer JKStarley).

They had similar wheels like the bicycles of today. Pedals were now attached via chain to the rear wheel. The overall height of this bicycle was substantially reduced and they became easier to mount and safe to use

By the 1890s, the funny old bicycle with huge front wheel became  part of history.

During the British rule in India up to the time of independence these bicycles where imported from Britain and were very popular . Even well to do office goers too were seen riding a bike to office or their club. The roads very very safe in those days because very few people had a car.


We have more cars than mosquitoes in Delhi now and the result is that Delhi has become one of the most polluted Cities of the world. Other major cities of India are also on road to become very polluted because of mind blowing number of cars. 

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Sunday, 24 February 2019

birds are becoming a rare sight

Here we have a rare vistor to a park in Flint, Wales.This Comorant was most obliging, allowing it to be photographed several times. 
We rarely see this bird,which is a supreme fish catcher.Only in the the winter months do they visit !

Birds are becoming rare and to an extent this is attributed to internet radiations. The electromagnetic radiation is reportedly  affect8ng the birds (possibly human beings also) 

Health issues are going to rise because of 5 G radiation now. And 6 G will then escalate the matter further. It is said that because of electro magnetic waves birds are losing their natural tendency to find direction which is nature gifted to them. 

Wednesday, 13 February 2019

Yahudi Manuhin

Some persons are born great. One such boy was Yahudi Manuhin. He started showing great mastery over violin at the age of four. At the age of thirteen he became a legend. Read this report in the Berliner Zeitung, 12 April 1929.

"There steps a fat little blond boy on the podium, and wins at once all hearts as in an irresistably ludicrous way, like a penguin, he alternately places one foot down, then the other. But wait: you will stop laughing when he puts his bow to the violin to play Bach's violin concerto in E major no.2."
 (in the Berliner Zeitung, 12 April 1929, quoted in translation from German )

In 1953, Life published photos of him in various esoteric yoga positions. That is a story connected with India.On a visit to his osteopath Menuhin spotted a book about yoga in the waiting room and was intrigued by the subject. He was in India a year later, in 1952 as a guest of Pandit Jawaharlal Nehru, India’s first Prime Minister, when he mentioned the book and was introduced to BKS Iyengar. Their first meeting was intended to be brief but turned into a three and a half hour session. Menuhin described  the trouble he was having sleeping and his feeling of constant fatigue to Iyengar who put him in Savasana and had him dozing away in a few minutes. The violinist felt the physical  benefits of yoga from that first meeting and the close friendship between the two men developed over decades lasting until Menuhin’s death in 1999.

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Tuesday, 15 January 2019

The Radio

Once upon a time there was The radio ! We had a tesla1952 model set.

In the fifties and sixties we listened to Voice Of America at short wave16 meter band, the BBC London at 19 meter band and All India Radio in all the meter bands.  There were hit  parades from all over the world, Quiz programmes,  Binaca geet mala and radio skits. RADIO Ceylon (now Sri Lanka) was a rage in Asia. Ameen Sayani was a Superstar  -- of Binaca Geet Mala.It was a real world where friends gathered around radio set to listen to cricket commentaries, celebrate the top of the hit parade songs over steaming hot cups of coffee and tea and hot spicy aloo (Potato) Pakoda.It was not the virtual world of faceless friends of today's smartphone social networking.

Sometime later, in early 60s Transistor radio became popular and we bought a BUSH transistor set.


Then came TV. Radio lost popularity. Doordarshan became a craze and TV news readers became super stars. There were so many of them. All very graceful and proficient.


Smartphone seems to have  now replaced everything - radio, calculators, tape recorders, cameras and, may, be even the TV. And an overload of commercials is now taking away people from TV sets.

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